गालीबाज व्‍यवस्‍था में गाली-विमर्श: क्या लड़कियां गाली सुनकर गजल गाएं?

पिछले 15 साल से समस्त भारत में ‘आधी आबादी’ आत्मनिर्भर होने के लिए अपनी चारदीवारी को लांघ चुकी है। यह न्यू इंडिया है। बाहर की दुनिया में उसे बस, मेट्रो, ऑटो, चौराहा, चाय-पान की दुकान, स्कूल, कॉलेज आदि में भी मर्दों के द्वारा गालियों को सुनना एक सामान्य बात हो गई है, लेकिन इस देश के सामंती समाज से लेकर बहुसंख्यक अंधभक्त चाहेंगे कि लड़कियां गाली सुनकर ग़ज़ल गाएं?

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जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक

ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?

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आप जंतर-मंतर जाएं या नहीं, पर दो गलत सवाल की जगह एक सही सवाल पूछें!

सोनम वांगचुक और युवा साथियों का सत्याग्रह केवल एक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का सवाल नहीं है। यह शिक्षा, बेरोजगारी, लोकतंत्र और जवाबदेही के गहरे संकट का आईना है। ऐसे समय में असली सवाल यह नहीं कि कौन जंतर-मंतर पहुँचा, बल्कि यह है कि सरकार अब तक चुप क्यों है।

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भारत के नागरिकों, छात्रों-युवाओं से भारत जोड़ो अभियान की अपील

हम देश के सभी विपक्षी दलों, जन आंदोलनों, संगठनों और नागरिकों, विशेषकर छात्रों और युवाओं से अपील करते हैं कि वे इस दिशा में चल रहे सभी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलनों का समर्थन करें तथा 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद भवन मार्च में शामिल हों।

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सुविधा और दृश्यता के एक ईवेंट में नैतिक वैधता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का प्रश्न

राजनीतिक सफलता का अर्थ केवल सही तर्क होना नहीं है। उसका अर्थ सही तर्क को उस भाषा में प्रस्तुत करना भी है जिसे समाज का बड़ा हिस्सा समझ सके। गांधी इसी कला के उस्ताद थे। उन्होंने जटिल राजनीतिक विचारों को अत्यंत सरल प्रतीकों में बदल दिया। यही कारण था कि उनका संदेश देश के सबसे दूरस्थ गाँव तक पहुँच गया।

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