जातिवार जनगणना की मांग पर UP-बिहार में बहुजन समाज का प्रदर्शन

बिहार-यूपी के कई एक संगठनों और बुद्धिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आज के दिन को राष्ट्रीय ओबीसी दिवस घोषित करते हुए जातिवार जनगणना सहित अन्य मांगों पर सड़क पर उतरने का आह्वान किया था.प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस से भागलपुर तक अच्छी तादाद में बहुजन समाज और प्रगतिशील नागरिक सड़क पर उतरे और विरोध मार्च,प्रदर्शन व सभाओं का आयोजन किया.अन्य सामाजिक-राजनीतिक संगठन भी विभिन्न जगहों पर सड़क पर आए.

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राष्ट्रीय OBC दिवस: जातिवार जनगणना के सवाल पर यूपी-बिहार के बहुजन संगठनों का आह्वान

बिहार-यूपी के कई संगठनों और बुद्धिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 7 अगस्त को राष्ट्रीय ओबीसी दिवस (नेशनल ओबीसी दिवस) घोषित किया है और ओबीसी पहचान और बहुजन एकजुटता को बुलंद करने की दिशा में बढ़ने के साथ ओबीसी-एससी-एसटी समाज व सामाजिक न्याय पसंद नागरिकों से सड़क पर आकर जनगणना-2021 में जातिवार जनगणना कराने की मांग पर हुंकार भरने का आह्वान किया है. यह जानकारी सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के रिंकु यादव और रामानंद पासवान ने दी है.

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राग दरबारी: मुसलमान ही नहीं, कई जातियों को बीजेपी ने अछूत बना दिया है

सवाल यह नहीं है कि लोकतांत्रिक पद्धति में मुसलमानों की हैसियत खत्म हो गयी है या नहीं हो पायी है। सवाल यह है कि मुसलमानों की हैसियत कितनी रह गयी है? और इसका जवाब यह है कि मुसलमानों की हैसियत पिछले सात वर्षों में बिहार व उत्तर प्रदेश के यादवों, हरियाणा के जाटों, महाराष्ट्र के महारों और उत्तर प्रदेश के जाटवों से थोड़ी ज्यादा ही बुरी है।

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राग दरबारी: उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती फैक्टर

बीजेपी के लिए परिस्थिति अगर विपरीत हुई और जो जाति या समुदाय भाजपा या सपा से सहज महसूस नहीं कर पा रहा है, अगर उसका छोटा सा तबका भी बसपा की तरफ शिफ्ट कर जाता है तो उत्तर प्रदेश के मुसलमान बीजेपी को हराने वाले उम्मीदवार को वोट देने से नहीं हिचकेंगे क्योंकि वह ऐसा समुदाय है जिसका एकमात्र लक्ष्य हर हाल में भाजपा को हराना होता है!

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शूद्र, बहुजन, दलित: OBC की सही पहचान के लिए एक सही शब्द की तलाश पर बहस

। हमारे भारतीय समाज में केवल आर्थिक उत्पीड़न ही नहीं होता बल्कि जातिगत उत्पीड़न के साथ शोषण कई गुना बढ़ जाता है। यही सवाल बाबा साहेब अम्बेडकर को भी जीवनपर्यंत परेशान करते रहे। उन्होंने अपने समय के सवालों से जूझते हुए भविष्य के संघर्षों के लिए जो बात कही है वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

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