बिहार: एक पुल के इंतज़ार में 42 साल से यहां ढलती जा रही हैं पीढ़ियां

मुजफ्फरपुर और दरभंगा जिले की सीमा पर नेशनल हाइवे 57 से महज डेढ़ किलोमीटर दक्षिण की दिशा में बसा यह गांव अपने ही नागरिकों के प्रति सत्ता, सियासत और प्रशासनिक उपेक्षा का जीता-जागता एक मिसाल है। यह गांव इस बात का सबूत और गवाह है कि आखिर कैसे नेता, जनप्रतिनिधि और अधिकारी उसी जनता से अपना मुंह मोड़ लेते हैं जिसकी सेवा करने का संकल्प लेकर वे अपने पद और गोपनीयता की शपथ लेते हैं।

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राग दरबारी: गोबरपट्टी के राजनीतिक टिप्पणीकार बिहार में ‘विकास की जाति’ को क्यों नहीं देखते?

किसका विकास हो रहा है मतलब किस जाति का विकास हो रहा है या फिर कह लीजिए कि विकास की जाति क्या है, इसे समझने का सबसे आसान तरीका यह जानना है कि किसके शासनकाल में किस जाति-समुदाय के लोगों की प्रतिमा लगायी जाती है; किसके नाम पर संस्थानों के नाम रखे जाते हैं; और किसके नाम पर सड़क का नामकरण हो रहा है।

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तिर्यक आसन: विकास की रेसिपी और अपनी बीट से पौधे उगाने का अस्तित्‍ववादी हुनर

कभी रुपये की कीमत गिरने से प्रधानमंत्री अपनी गरिमा खोते थे, अब नहीं खोते। कभी जनता और विपक्ष पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि की आग से झुलस जाते थे, अब नहीं झुलसते। पेट्रोल की धीमी आँच पर पक रही विकास की रेसिपी में अखिल भारतीय मंत्रिमंडल के खानसामों द्वारा प्रतिदिन डाले जाने वाले धर्म के चटपटे मसालों ने कीमतों को पचाना सिखा दिया है।

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आर्टिकल 19: आकाश में दो उल्का पिंड टकराए और सब धुआँ धुआँ हो गया…

कानपुर में जो उस दिन हुआ और जो इस दिन हुआ, यह ब्रह्मांड में घटित ऐसी ही मामूली घटनाओं की तरह है। व्यवस्था के उल्का पिंडों के टकराव की तरह। इसमें जनता के हिस्से में केवल राख होना आया था। लेकिन उसे ये नहीं पता था कि एक दिन सब धुआं-धुआं हो जाएगा।

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राग दरबारी: विकास के वैकल्पिक मॉडल पर भारत में चर्चा क्यों ठप है?

हमारे देश के अधिसंख्य ‘बुद्धिजीवी’ इसी मोड में हैं कि उन्हें आज भी यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि मोदी जी के नेतृत्व में ही कोरोना से जंग जीती जा सकती है!

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