तिर्यक आसन: विकास की रेसिपी और अपनी बीट से पौधे उगाने का अस्तित्‍ववादी हुनर

कभी रुपये की कीमत गिरने से प्रधानमंत्री अपनी गरिमा खोते थे, अब नहीं खोते। कभी जनता और विपक्ष पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि की आग से झुलस जाते थे, अब नहीं झुलसते। पेट्रोल की धीमी आँच पर पक रही विकास की रेसिपी में अखिल भारतीय मंत्रिमंडल के खानसामों द्वारा प्रतिदिन डाले जाने वाले धर्म के चटपटे मसालों ने कीमतों को पचाना सिखा दिया है।

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आर्टिकल 19: आकाश में दो उल्का पिंड टकराए और सब धुआँ धुआँ हो गया…

कानपुर में जो उस दिन हुआ और जो इस दिन हुआ, यह ब्रह्मांड में घटित ऐसी ही मामूली घटनाओं की तरह है। व्यवस्था के उल्का पिंडों के टकराव की तरह। इसमें जनता के हिस्से में केवल राख होना आया था। लेकिन उसे ये नहीं पता था कि एक दिन सब धुआं-धुआं हो जाएगा।

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राग दरबारी: विकास के वैकल्पिक मॉडल पर भारत में चर्चा क्यों ठप है?

हमारे देश के अधिसंख्य ‘बुद्धिजीवी’ इसी मोड में हैं कि उन्हें आज भी यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि मोदी जी के नेतृत्व में ही कोरोना से जंग जीती जा सकती है!

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