About Us

जनपथ के बारे में

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है। दिल्ली स्थित पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव ने इसे 2006 में शुरू किया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका।

दस साल के परिचालन में इस पर आखिरी प्रकाशित पोस्ट नवम्बर 2016 में “नोटबंदी के खिलाफ़ जनता का गीत” थी जिसे पत्रकार पीयूष बबेले ने लिखा था और यहां प्रकाशित होने के बाद यह गीत काफी चर्चित हुआ था।

यह यूआरएल दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद मित्रों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो आज से चौदह साल पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि मीडिया में स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए स्पेस कम हो रही है। तब से लेकर अब तक अंतर आया है तो संकट की तीव्रता में।

चौदह साल पहले अख़बारों में जगह ख़त्म हो रही थी, तब ब्लॉग आए। अब स्थिति यह है कि डिजिटल स्पेस अपने अस्तित्व के एक दशक में ही घुटनों पर बैठ चुका है। पेज व्यू, ट्रैफिक और रेवेन्यू के दबाव में डिजिटल मीडिया अच्छे कंटेंट से समझौता कर चुका है। कह सकते हैं कि अखबारों को भ्रष्ट होने में पचास साल लगे, टीवी को बीस साल, डिजिटल को दस साल और सोशल मीडिया को पांच साल।

ब्रेकिंग न्यूज़ और फेक न्यूज़ के ताबड़तोड़ हमले में विचार कहीं किनारे टांग दिए गए हैं। वीडियो की अंधी दौड़ में शब्द गायब हो चुके हैं। जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो।

शर्त बस एक हैः जो छपे, वह जनहित में हो। व्यापक जन सरोकारों से प्रेरित हो।

जनपथ के दस साल के आरकाइव्स (Blog) वेबसाइट पर मौजूद हैं। उनमें से कुछ चुनिंदा सामग्री Editor’s Choice और Lounge में उपलब्ध है। Open Space खुला मंच है। Voices तमाम जनसंगठनों, आंदोलनों, पहलों और जनमंचों की आवाज़ को जगह देने के लिए एक खंड है।

जनपथ को उन मित्रों ने अपने सहयोग से खड़ा किया है जो इस दौर में एक साझा मंच की अहमियत को समझते हैं। जनपथ के पास न तो संसाधन हैं, न दफ्तर और न ही काम करने वाले हाथ। जनपथ की कुल पूंजी लिखने-पढ़ने और सोचने-समझने वाले लोग हैं। यह उन्हीं के द्वारा, उन्हीं के लिए और उन्हीं की वेबसाइट है।

जनपथ के संपादक के बारे में

अभिषेक श्रीवास्तव जनपथ के संपादक और संचालक हैं। इन्होंने अखबार, पत्रिकाओं से लेकर टीवी, वेब और एजेंसी जैसे हर संचार माध्यम में लगभग हर किस्म का पत्रकारीय काम किया है। शुरुआती आठ साल करीब दो दर्जन मीडिया की दुकानों में छिटपुट नौकरियां करने के बाद पिछले करीब दस साल से स्वतंत्र पत्रकारिता और अनुवाद कर रहे हैं। एक पुस्तक भी लिखी है “देसगांव”, जिसमें शामिल कुछ रपटें जनपथ के आरकाइव्स (Blog) में पढ़ी जा सकती हैं।