‘हमें अर्थव्यवस्था, खुशहाली और आज़ादी में एक संतुलन बनाना पड़ेगा’: कोबाड गाँधी से बातचीत

जब तक हम जीवन में बुनियादी ज़रूरतों को पूरा नहीं करते हैं, तो खुशियां नहीं आ सकती हैं। हमारा लक्ष्य सामाजिक राजनीतिक बदलाव है तो ये तो रहेगा ही, लेकिन हमें व्यक्तिगत मूल्यों की भी बात करनी होगी। ख़ुशियां अमूर्त में नहीं होती हैं। उनका एक भौतिक आधार होता है। एक नया समाज बनाने के लिए और इन विचारों को विकसित करने की ज़रूरत है।

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तिर्यक आसन: परिवार और सामुदायिकता में लगा परजीवी स्टेट का कीड़ा

अपने प्रतिनिधियों की सरकार और अपने आविष्कारों पर जनता की निर्भरता देख स्टेट चिंतामुक्त हो गया है। हमारी चेतना पर वो तमाम पट्टियाँ बाँध चुका है। एक पट्टी खुलती है, तब तक राजनीति और धर्म के प्रतिनिधियों के सहयोग से नई पट्टी बाँध देता है।

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15 अगस्त को नारीवादी पूछें, “क्या हम सच में ‘आज़ाद’ हैं?”

आज दिल्ली सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों, वकीलों, मीडियाकर्मियों आदि के ख़िलाफ़ पूछताछ, गिरफ्तारी, उत्पीड़न द्वारा व्यवस्थित हमले का भी केंद्र बन गया है

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आर्टिकल 19: हम उस बुलडोज़र पर बैठे हैं जो हमारी आज़ादी को कुचलते हुए आगे बढ़ रहा है!

झूठ कहती हैं किताबें कि आज़ादी की लड़ाई में देश का हर तबका शामिल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा के लोग इसी देश के लोग तो थे। गोडसे भी इसी देश में रहता था, लेकिन आरएसएस को तो आज़ादी नहीं चाहिए थी? यह तिरंगा भी नहीं चाहिए था। संविधान भी नहीं चाहिए था। वही संघ देश चला रहा है।

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तिर्यक आसन: आज़ादी की दुकान सज गयी है…

दुकानों पर चौबीस घंटे देशभक्ति फहरा रही है। दसों दिशाओं से हवा चल रही है। देशभक्ति भी दसों दिशाओं में खड़ी है। किसी का सिर हिमालय की चोटी की तरह तना हुआ है। किसी का सिर नीचे बह रही नाली के मुँह में जाने को है।

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