बाबासाहब के नाम पर स्मारक बना देने से दलितों की हालत सुधर जाएगी?

क्या यह स्मारक वाकई चुनाव से पहले दलितों को लुभाने का कोई चारा है या फिर भाजपा सरकार में दलितों की स्थिति सुधरी है? दलितों के खिलाफ होने वाले जुल्म तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।

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छान घोंट के: अमन के लिए भूख-कुपोषण के खिलाफ जारी संघर्षों पर मुहर है इस बार का नोबेल

अभिजात्य समाज और उनके समर्थन में खड़ा शासन-प्रशासन भुखमरी और कुपोषण के खिलाफ लड़ने वाले लोगों के खिलाफ लगातार हमले करता है। इसी माहौल में क्राई के साथ मिलकर जनमित्र न्यास 50 गांवों में मुसहरों के बीच व्याप्त कुपोषण को समाप्त करने के लिए सतत काम कर रहा है। ऐसे काम के कुछ सुखद परिणाम भी मिलते हैं तो इसकी कीमत भी कभी-कभार चुकानी पड़ती है।

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छान घोंट के: जवाबदेही मांगने वाली सिविल सोसाइटी की FCRA पर चुप्पी और कार्टेल-संस्कृति

दुनिया के किसी भी देश में परिवर्तनकारी और दीर्घकालीन बदलाव का क्रांतिकारी आन्दोलन केवल विदेशी अंशदान से कभी नहीं खड़ा हुआ है। यह अलग बात है कि जनवादी निर्वात के खात्मे में विदेशी अंशदान का काफी योगदान रहता है।

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छान घोंट के: स्‍वामी अग्निवेश को काशी से आखिरी सलाम

2014 में जब कैलाश सत्यार्थी को नोबेल शांति पुरस्कार मिला, तो स्वामी जी ने बिहार से मुझे फ़ोन कर के करीब दो घंटे लम्बी बात की। मैंने स्वामी जी से कहा कि “आप विस्तारवादी देशो के खिलाफ हैं, इसलिए आपको Right Livelihood award मिला जबकि कैलाश जी को नोबेल।”

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छान घोंट के: रात राम सपने में आए…

यही सब सोचते हुए और राम को याद करते-करते मैं भी पूरे देश की तरह सो गया. तभी अचानक राम-राम कहते हुए राम जी मेरे सपने में आए. बोले, “कैसे हो ‘प्रच्छन बौद्ध’ रघुवंशी? हमें क्यों याद किया?”

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छान घोंट के: लॉकडाउन से बदरंग हुए बनारस में जन पत्रकारिता का एक साहसी दस्तावेज़

लॉकडाउन के दौरान इसी जरूरत और ज़मीनी हकीकत को समझाने वाली वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत की हाल ही में प्रकाशित किताब है “बनारस लॉकडाउन”, जो बताती है कि लॉकडाउन के 75 दिनों की जिंदगी क्या रही।

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छान घोंट के: चितरंजन सिंह का अर्थ है मानवाधिकार में सबसे आखिरी व्यक्ति के साथ खड़े होना

इस संवाद के अंत में उन्होंने दो बातें कहीं थीं. एक, अंतिम आदमी के लिए लड़ने वाले लोगों के अधिकार के लिए लड़ना और उसे किसी भी हालत में अकेला नहीं छोड़ना ही आन्दोलन की मज़बूत बुनियाद को कायम करेगा. दूसरी बात यह थी कि अपनों को मुसीबत में छोड़ना आन्दोलन के साथ गद्दारी है.

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छान घोंट के: मानसिक अवसाद के राजनैतिक मायने और कुछ सहज उपाय

अपने भीतर मित्रों के प्रति मित्रतापूर्ण संघर्ष और शत्रुओं (जो अवसाद को पैदा करने के बुनियादी कारण हैं) के खिलाफ शत्रुतापूर्ण संघर्ष को चलाये रखना सबसे ज़रूरी है

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छान घाेंट के: ग्वांगजू जन-विद्रोह की याद क्यों ललकार रही है आज…

भारत को अपने जन विद्रोहों पर जन स्मारक बनाने और जन स्मृतियों में लाने का काम दक्षिणी कोरिया से सीखना चाहिए

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