क्या महामारी की आड़ में भारत के ‘कम जनतंत्र’ की ओर उन्मुख होने के रास्ते को सुगम किया जा रहा है?

क्या एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने में उनकी कथित भूमिका को लेकर तथा उनके हाशियाकरण को लेकर कभी हुक्मरानों को या उनसे संबंधित तंजीमों को कभी जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा? क्या वह अपने इन कारनामों को लेकर कभी जनता से माफी मांगेंगे?

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नागरिकों को ही ‘विपक्ष’ का विपक्षी बनाया जा रहा है!

सरकार ने अब अपने किसान संगठन भी खड़े कर लिए हैं। मतलब कुछ किसान अब दूसरे किसानों से अलग होंगे ! जैसे कि इस समय देश में अलग-अलग नागरिक तैयार किए जा रहे हैं। धर्म को परास्त करने के लिए धर्म और नागरिकों को परास्त करने के लिए नागरिकों का उपयोग किया जाता है।

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नयी संसद का भूमिपूजन: आधुनिक लोकतंत्र और संगठित धर्म के बीच आवाजाही का सवाल

प्रधानमंत्री बारंबार संसद भवन को लोकतंत्र के मंदिर की संज्ञा देते रहे हैं किंतु मंदिर की भूमिका धर्म के विमर्श तक ही सीमित रहनी चाहिए। नए संसद भवन को तो स्वतंत्रता, समानता, न्याय और तर्क के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।

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दक्षिणावर्त: लोकतंत्र अगर “टू मच” है तो उसका अर्थ कहां है?

सहस्राब्दि‍ के दूसरे दशक के शुरुआती वर्षों में मुद्दा आधारित विमर्श और आंदोलन को मध्‍यवर्ग का उत्‍सव बनाने का काम अन्ना हजारे-केजरीवाल की युति ने किया था, जब दिल्‍ली का खाया पीया अघाया सर्विस क्‍लास भ्रष्‍टाचार का वीकेंड विरोध आइसक्रीम खाते हुए करता था।

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धर्मांतरण विधेयक: पितृसत्ता के इस्लामिक मर्ज़ के खिलाफ़ पितृसत्ता का हिंदुत्ववादी पहरा

कुरान के नियम केवल यह बताते हैं कि कोई धार्मिक-नैतिक सिद्धांत पैगंबर मोहम्मद साहब के जीवनकाल में सातवीं शताब्दी के अरब की तत्कालीन परिस्थितियों में किस प्रकार क्रियान्वित किया गया था। आज जब परिस्थितियां और संदर्भ पूरी तरह बदल चुके हैं तब उस समय बनाए गए नियम कानून उस मूल सिद्धांत को अभिव्यक्त नहीं कर सकते जिस पर ये आधारित हैं।

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आर्टिकल 19: क्या आप जानते हैं कि भारत ने ‘लोकतंत्र’ के रूप में अपनी स्थिति लगभग खो दी है?

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में मीडिया, नागरिक समाज और विपक्ष के लिए लगातार कम होती जा रही गुंजाइश के कारण भारत लोकतंत्र का दर्जा खोने की कगार पर है। रिपोर्ट की प्रस्तावना में ही लिखा है कि भारत ने लगातार गिरावट का रास्ता जारी रखा है।

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“मोदी जी, जेपी के विचारों से आप कितनी दूर चले गए हैं, कृपया इस पर विचार करें”!

अगर महात्मा गाँधी भारत को 1947 में मिली स्वतंत्रता के वास्तुकार थे, जो इमरजेंसी के कारण 25/26 जून, 1975 को बुझ सी गयी, वो जेपी थे जिन्होंने उसे 1977 में पराजित कर हमें हमारी दूसरी स्वतंत्रता दिलाई. उनकी प्रशंसा में भारत की जन ने उन्हें ‘लोकनायक’ एवं ‘दूसरा महात्मा’ कह कर पुकारा. क्या आपको वो जेपी याद है, श्रीमान मोदी?

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एक शासक को काम करने के लिए आखिर कितने वर्ष चाहिए?

यह स्थिति केवल बिहार में नहीं है, लगभग पूरी दुनिया में है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को अभी और काम करना है। रूस में पुतिन दशकों से बने हैं और अभी हटना नहीं चाहते। चीन में शी जिनपिंग ने आजीवन गद्दी पर बने रहने का अधिकार एक ही बार में हासिल कर लिया है। ये सब थोड़े से उदाहरण हैं।

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अदालत का फैसला अगर ‘न्याय’ से चूक जाए, तो आदमी क्या करे? कहां जाए?

जिस तरह भारतीय किसान की उम्मीद मानसून पर होती है हर साल, ठीक उसी तरह एक आम नागरिक की उम्मीद अदालत और देश की न्याय व्यवस्था से होती है। मानसून पर इन्सान का वश नहीं है, किन्तु अदालतें इन्सान यानी न्यायाधीशों के सहारे चलती हैं।

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लोकतंत्र की अंतिम क्रिया अभी बाकी है!

हम सभी एक सामूहिक, राष्ट्रव्यापी मदहोशी के शिकार हो गए थे. किस चीज़ का नशा कर रहे थे हम? हम तक एनसीबी का परवाना क्यों नहीं पहुंचा? सिर्फ बॉलीवुड के लोगों को ही क्यों बुलाया जा रहा है? कानून की नज़र में हम सभी बराबर हैं कि नहीं?

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