चालीस प्रतिशत महिला प्रत्याशी का फैसला यदि ‘राजनीति’ है, तो यही अच्छी और खालिस राजनीति है!

जिस प्रदेश में आज तक कमोबेश श्मशान-कब्रिस्तान, धर्म और जाति जैसे जहरीले मुद्दों पर चुनाव लड़ा गया वहां इस तरह की क़वायद एक बड़ी उम्मीद लेकर आती दिख रही है। ऐसा नहीं है कि इस फैसले से सब अच्छा हो गया है, लेकिन यह फैसला एक बुनियादी गैर-बराबरी को पाटने की तरफ बढ़ाया गया उम्मीद भरा कदम है जिसका चतुर्दिक स्वागत होना चाहिए।

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बसपा के ब्राह्मण सम्मेलनों की आलोचना सतही और राजनीति से प्रेरित है

बसपा ब्राह्मणों को अपनी पार्टी से जोड़ रही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह ब्राह्मणों के धर्म और दर्शन को स्वीकार करने जा रही है। वह चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकती, इसलिए कि यह उसके वजूद से जुड़ा हुआ प्रश्न है। अपने वजूद को बचाने के लिए बसपा कोई जोखिम तो ले सकती है लेकिन स्वयं अपने पैर में कुल्हाड़ी मारेगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

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यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टियों की सीटवार चुनावी रणनीति और सपा-बसपा की दिक्कत

सपा-बसपा के पास एक ही काट है- अतिपिछड़ों को व्यापक प्रतिनिधित्व और सीटें देते हुए उनके मान-सम्मान व सुरक्षा हेतु एससी/एसटी एक्ट जैसे प्रावधान और लाभकारी योजनाओं में स्पेशल कम्पोनेंट जैसी विशेष योजनाएं संचालित करने का ऐलान।

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UP: सरकार से ब्राह्मण वोटर की नाराजगी का मुद्दा क्या फर्जी है?

ब्राह्मण वोटर सामान्‍यत: मंदिर निर्माण, हिंदुत्व, अनुच्‍छेद 370 के जम्‍मू-कश्‍मीर से हटाए जाने, तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर काफी उत्साहित नजर आते हैं। कई ऐसे ब्राहमण हैं जो बीजेपी सरकार की बहुत सी नीतियों, महंगाई, बेरोजगारी से काफी नाराज भी हैं, लेकिन वोट के सवाल पर मुद्दा बदल जाता है।

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एक उदार समाजवादी विचारधारा ही भाजपा की काट हो सकती है: अखिलेश यादव

प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव समाजवाद की उदार विचारधारा और अपने पिछले कार्यकाल के ठोस कामों में भरोसा जताते हैं। उनका मानना है कि इस बार का चुनाव 2017 की तरह फर्जी नहीं, असली मुद्दे पर होगा। लखनऊ में तमाम मुद्दों पर उनके साथ वरिष्‍ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी की हुई लंबी बातचीत के महत्‍वपूर्ण अंश।

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यूपी में बाकी जातियों की नाराजगी पर क्यों नहीं सवाल कर रहा है मीडिया?

मीडिया जब जाति पर चर्चा करने ही लगा है तो उसे एक जाति-विशेष के बजाय उत्तर प्रदेश की तमाम जातियों की नाराजगी और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर चर्चा करनी चाहिए।

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उत्तर प्रदेश में विपक्ष क्या संगठित होकर चुनाव को चेहरे से हटा कर मुद्दों पर खड़ा कर पाएगा?

अगला चुनाव बहुत कड़ी प्रतिस्पर्धा होगा जिसमें जीत कम सीटों के फासले से होगी, हालांकि भाजपा की जीत की संभावना प्रबल है लेकिन बिना अथक प्रयास किये यह भी आसान नहीं है।

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राग दरबारी: मुसलमान ही नहीं, कई जातियों को बीजेपी ने अछूत बना दिया है

सवाल यह नहीं है कि लोकतांत्रिक पद्धति में मुसलमानों की हैसियत खत्म हो गयी है या नहीं हो पायी है। सवाल यह है कि मुसलमानों की हैसियत कितनी रह गयी है? और इसका जवाब यह है कि मुसलमानों की हैसियत पिछले सात वर्षों में बिहार व उत्तर प्रदेश के यादवों, हरियाणा के जाटों, महाराष्ट्र के महारों और उत्तर प्रदेश के जाटवों से थोड़ी ज्यादा ही बुरी है।

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आंदोलन के आठ महीने: ट्रैक्टर पर राहुल गांधी, महिलाओं की किसान संसद, ‘मिशन यूपी’ की शुरुआत

मिशन यूपी की शुरुआत के लिए एसकेएम नेता आज लखनऊ जाएंगे। वे वहां आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस को संबोधित करेंगे। ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इस साल की शुरुआत में हुए पंचायत चुनावों में किसान आंदोलन ने अपनी छाप छोड़ी थी और कई जगहों पर भाजपा उम्मीदवारों को दंडित किया गया था और निर्दलीय उम्मीदवारों को सबसे अधिक सीटें मिलीं थीं।

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पश्चिमी यूपी में भाजपा की राह का कांटा बन सकती है रालोद

इस बार मुख्यमंत्री योगी के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश जीतना सबसे कठिन होने वाला हैI राकेश टिकैत द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश खड़े किये किसान आंदोलन की वजह से भाजपा नेताओं का गाँवों में घुसना मुश्किल हो रहा है तो चुनाव प्रचार दूर की कौड़ी लग रही हैI

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