जब सरकार खुद समस्या बन जाए तो समाधान क्या हो?

“सरकार हमारी समस्याओं का समाधान नहीं है, सरकार ही समस्या है”- अमेरिका के राष्ट्रपति रहे रॉनल्ड रीगन के इस प्रसिद्ध कथन से राजनीतिशास्त्र के छात्र भलीभाँति परिचित होंगे। रीगन से …

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टंकी पर चढ़ी लखनऊ की शिखा पाल बनाम पहाड़ पर चढ़ी बेरोजगारी

भारत की बेरोजगारी अथवा अर्द्धबेरोजगारी की समस्या का हल यह है कि रोजगार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जाए। अमीर-गरीब के अंतर को कम करना पड़ेगा। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारा एक पूंजीपति मुकेश अंबानी तो दुनिया के दस सबसे अमीर लोगों में शामिल हो जाए और आधी आबादी इतनी गरीबी में जीने को मजबूर हो कि अपने बच्चों का कुपोषण भी दूर न कर सके।

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यूपी मांगे रोजगार: लखनऊ में हजारों छात्र-युवा भरेंगे हुंकार ताकि चुनावी मुद्दा बन सके रोजगार!

मोर्चे का मुख्य उद्देश्य आगामी चुनावों से पहले रोज़गार को एक मुख्य राजनीतिक सवाल बनाना तथा रोज़गार के लिए लड़ रहे सभी संगठनों और लोगों को एक मंच पर लाकर सरकार पर बड़ा दबाव बनाना है। इस मोर्चे की ओर से एक प्रदेशव्यापी अभियान की शुरुआत भी अगस्त में हो चुकी है। इस अभियान को नाम दिया गया है ‘यूपी मांगे रोज़गार’।

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सुंदरबन से धीरे-धीरे गायब क्यों हो रहे हैं छात्र?

यहां के गांवों में स्कूली शिक्षा के सामने बाधाओं का अंबार लगा हुआ है। बार-बार आते तूफ़ान, बढ़ता खारापन, जो खेती और मछली पकड़ने को नुकसान पहुंचाता है, और लॉकडाउन- सभी ने छात्रों के स्कूल छोड़ने की दर, कम उम्र में शादियां और छात्रों के बीच रोज़गार की तलाश को बढ़ा दिया है

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आरक्षण अर्थात घर में नहीं है खाने को, अम्मा चली…

सरकार क्योंकि विश्व बैंक-अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के ढांचागत समायोजन कार्यक्रम के क्रियान्‍वयन या उनसे कर्ज़ लेने पर लादी गयी शर्तों के अनुपालन में लगी हुई है जिसके तहत सरकारी क्षेत्र के आकार और उसके रोज़गार में कटौती की जाती है इसलिए उसने यह जानते हुए भी कि इस सरकारी क्षेत्र में रोज़गार पाने के अवसर ही नहीं बचे या बचने हैं, सबको खुश करने के लिए नौकरी का निमंत्रण पत्र बांटना शुरू कर दिया। वर्तमान में अन्य पिछड़ा वर्ग को खुश करने के लिए किया जाने वाला संशोधन इसी तरह का चुनावी प्रयास है।

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इंदौर का एक चोर और उन लहरों का शोर, जिनका ‘पीक’ शायद कभी न आए!

जिन लहरों से हम अब मुख़ातिब होने वाले हैं उनका ‘पीक’ कभी भी शायद इसलिए नहीं आएगा कि वह नागरिक को नागरिक के ख़िलाफ़ खड़ा करने वाली साबित हो सकती है। जो नागरिक अभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा है वही महामारी का संकट ख़त्म हो जाने के बाद अपने आपको उन नागरिकों से लड़ता हुआ पा सकता है जिनके पास खोने के लिए अपने जिस्म के अलावा कुछ नहीं बचा है।

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बीते 15 साल में दफ़न तीन डिसमिल ज़मीन का एजेंडा क्या ज़िंदा कर पाएगा बिहार का नया नेतृत्व?

यहां लंबे समय से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि 1950 के बाद यहां कोई लैंड सर्वे नहीं हुआ। कुछ जानकार यह भी बताते हैं कि अगर व्यापक जांच पड़ताल की जाए तो पूरा बिहार बहुत बड़े ज़मीन घोटाले का गढ़ साबित होगा।

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बिहार: बनमनखी चीनी मिल के भव्य खंडहरों में छुपी है रोज़गार के चुनावी वादों की कड़वाहट

विडम्‍बना है कि जिस राज्‍य में कुछ दशक पहले तक सिर्फ चीनी से कई लाख लोगों को रोजगार मिलता था, आज वही रोजगार चुनावी वायदों और घोषणाओं में ढूंढा जा रहा है।

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भारत में बेरोजगारी के दैत्य का आकार और सरकार

उदारीकरण के बाद के चरण में उत्पादन वृद्धि का रिश्ता रोजगार वृद्धि के साथ तेजी से इसलिए खत्म होता गया है क्योंकि मशीनीकरण की वजह से उत्पादन जहां प्रति नियोजित श्रमिक बढ़ता गया, वहीँ इस किस्म के औद्योगीकरण के तहत संगठित उद्योग में श्रमिकों को खपाने के लिए सृजित किये गये कुल रोजगार की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र के गरीबों की आजीविका अधिक मात्रा में नष्ट होती गयी है।

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अंधेरे गड्ढे में जिंदा रहने का गर्वबोध है हिंदी, हिंदू और हिंदुस्‍तान

ऑटोमेशन के ज़माने में आपकी ज़रूरत मजूर के रूप में भी खत्म हो गयी है। ऐसे में मनोज बाजपेयी से एक गाना गवा दिया गया कि ‘बम्बई में का बा।’ ये सोच रहे हैं कि इन जबरन बनाये गये मजूरों का शहरों से मोहभंग हो जाये और ऑटोमेशन को लागू करने के लिए कोई जोर जबरदस्ती, मजूरों से संघर्ष की स्थिति, न बन सके।

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