तन मन जन: अवसाद में डूबता देश और परेशान आम जन

कोरोना संक्रमण ने न केवल मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों की हालात खस्ता कर दी है बल्कि नये मानसिक रोगियों को भी कतार में खड़ा कर दिया है। कोरोना काल में जिन मानसिक रोगों में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई है उनमें ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी), डिप्रेशन (अवसाद), चिड़चिड़ापन, तनाव, भूलने की बीमारी आदि महत्वपूर्ण हैं।

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तन मन जन: भारत में जनस्वास्थ्य और बच्चों की मौत

इसमें कोई शक नहीं कि विगत तीन दशकों में शिशु और मातृ मृत्यु दर में अपेक्षाकृत कमी आयी है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता अब भी उतनी नहीं सुधर पायी है जितना दावा किया गया है। यह बात ध्यान देने की है कि नवजात शिशुओं के जीवन का पहला एक महीना माँ और बच्चे दोनों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसलिए देश की सेहत के लिए यह जरूरी है कि मातृ व शिशु स्वास्थ्य पर ईमानदारी से जिम्मेवारी तय कर ध्यान दिया जाए।

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तन मन जन: कोरोनाकाल में आम लोगों की जान बचाती होमियोपैथी एवं आयुष पद्धतियां

भारत जैसे गरीब व विकासशील देश में सस्ती, सुलभ एवं सरल वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति की मान्यता को लेकर सरकार व अधिकारियों आदि के नकारात्मक रवैये के पीछे मैं उनके एलोपैथिक माइन्डसेट को जिम्मेवार मानता हूं। मेरा अनुभव तो ऐसा भी है कि सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में एक बड़े अधिकारी जिनकी पत्नी और बेटा स्वयं होमियोपैथ हैं, वे भी होमियोपैथी को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते। कारण होमियोपैथी के प्रति एलोपैथी का पूर्वाग्रह ही लगता है।

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तन मन जन: निजीकरण की विफलता के बाद क्या हम क्यूबा के स्वास्थ्य मॉडल से सबक लेंगे?

क्यूबा के इस बहुचर्चित स्वास्थ्य मॉडल के बहाने मैं देश के नागरिकों से अपील करना चाहता हूं कि वे संविधान में वर्णित अपने मौलिक नागरिक अधिकारों के तहत सरकार को मुफ्त गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के लिए बाध्य करें।

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तन मन जन: कोरोना ने प्राइवेट बनाम सरकारी व्यवस्था का अंतर तो समझा दिया है, पर आगे?

स्वास्थ्य और उपचार का सवाल जीवन से जुड़ा है और यह हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। स्वास्थ्य सेवाओं को निजीकरण के जाल से बाहर निकाले बगैर आप स्वस्थ मानवीय जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। अभी भी वक्त है। जागिए और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की गारन्टी के लिए आवाज बुलंद कीजिए।

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तन मन जन: पब्लिक हेल्थ और जनसंख्या नियंत्रण की विभाजक राजनीति

चुनाव से पहले भारत में जहां भी आबादी नियंत्रण की बात उठती है तो साफ तौर पर समझा जा सकता है कि उनकी चिंता के पीछे जनसंख्या से ज्यादा धर्म, नस्लवाद, जेनोफोबिया या कट्टरता है। उनकी नजर में केवल कोई एक सम्प्रदाय है जिसकी आबादी को नियंत्रित करने की जरूरत है।

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तन मन जन: कोरोना की तीसरी लहर के लिए कितना तैयार हैं हम?

सवाल है कि इस महामारी से जूझते हुए लगभग डेढ़ वर्ष के तजुर्बे के बाद भी क्या हम देश की जनता को यह आश्वासन दे सकते हैं कि हमारी सरकार एवं यहां की चिकित्सा व्यवस्था महामारी से जनता को बचाने एवं निबटने में सक्षम है?

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तन मन जन: महामारी का राजनीतिक अर्थशास्त्र और असमानता का वायरस

जब लॉकडाउन में सभी जगह का उत्पादन बन्द था, पेट्रोल, डीजल की बिक्री भी बाधित थी, दुकानें बन्द थीं, गोदामों में तैयार माल डम्प थे, जीडीपी का ग्राफ नीचे जा रहा था तब इन अरबपतियों की सम्पत्ति दिन दूनी रात चौगुनी कैसे बढ़ रही थी? यह सवाल हर किसी की जिज्ञासा है।

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तन मन जन: रामदेव के दावे और IMA का गुस्सा

इस विवाद की आड़ में सरकार ने जनता को रामदेव एवं आइएमए के सर्कस में व्यस्त कर अपनी विफलता से लोगों को ध्यान बंटा दिया। कुल नतीजा क्या निकला पता नहीं मगर इस नूराकुश्ती ने वर्तमान सरकार के विफल कोरोना संक्रमण नियंत्रण के प्रति उत्पन्न जनाक्रोश को थोड़ा ठंडा कर दिया।

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तन मन जन: जनस्वास्थ्य के अधूरे ढांचे और गाँव गणराज्य की उपेक्षित संकल्पना के सबक

गांव गणराज्य की कल्पना भारत के पूर्व आइएस एवं सिद्धान्तकार डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा ने स्पष्ट रूप से ढाई दशक पहले ही दी थी जिसे सरकारों ने कूड़े में डाल दिया। यदि जनस्वास्थ्य और प्राथमिक शिक्षा का प्रबन्धन और कार्यान्वयन गांव या प्रखण्ड के स्तर पर हो तो देश में कभी भी ऐसी मारामारी और हाहाकार की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी।

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