हर्फ़-ओ-हिकायत: पंजाब के नये मुख्यमंत्री क्या इतिहास को चुनौती दे रहे हैं?

पूरे देश में सबसे ज्यादा दलितों की आबादी पंजाब में ही है लेकिन विडंबना देखिए इन डेरों की वजह से बीएसपी या कोई और दलित पार्टी यहां कभी खड़ी नहीं हो सकी। दलित सिर्फ डेरा प्रमुख के आदेश पर वोट डालते रहे।

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राग दरबारी: मुसलमान ही नहीं, कई जातियों को बीजेपी ने अछूत बना दिया है

सवाल यह नहीं है कि लोकतांत्रिक पद्धति में मुसलमानों की हैसियत खत्म हो गयी है या नहीं हो पायी है। सवाल यह है कि मुसलमानों की हैसियत कितनी रह गयी है? और इसका जवाब यह है कि मुसलमानों की हैसियत पिछले सात वर्षों में बिहार व उत्तर प्रदेश के यादवों, हरियाणा के जाटों, महाराष्ट्र के महारों और उत्तर प्रदेश के जाटवों से थोड़ी ज्यादा ही बुरी है।

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शूद्र, बहुजन, दलित: OBC की सही पहचान के लिए एक सही शब्द की तलाश पर बहस

। हमारे भारतीय समाज में केवल आर्थिक उत्पीड़न ही नहीं होता बल्कि जातिगत उत्पीड़न के साथ शोषण कई गुना बढ़ जाता है। यही सवाल बाबा साहेब अम्बेडकर को भी जीवनपर्यंत परेशान करते रहे। उन्होंने अपने समय के सवालों से जूझते हुए भविष्य के संघर्षों के लिए जो बात कही है वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

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एक लड़ाई मुहब्बत की: यलगार परिषद 2021 में अरुंधति रॉय का भाषण

हमें उन फंदों से सावधान रहना होगा, जो हमें सीमित करती हैं, हमें बने-बनाए स्टीरियोटाइप सांचों में घेरती हैं. हममें से कोई भी महज अपनी पहचानों का कुल जोड़ भर नहीं है. हम वह हैं, लेकिन उससे कहीं-कहीं ज्यादा हैं. जहां हम अपने दुश्मनों के खिलाफ कमर कस रहे हैं, वहीं हमें अपने दोस्तों की पहचान करने के काबिल भी होना होगा. हमें अपने साथियों की तलाश करनी ही होगी, क्योंकि हममें से कोई भी इस लड़ाई को अकेले नहीं लड़ सकता.

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उत्तर प्रदेश में मायावती राज और दलित उत्पीड़न

अब यह सामान्य अपेक्षा है कि जिस राज्य में सवर्ण मुख्यमंत्री के स्थान पर कोई दलित मुख्यमंत्री बनेगा वह दलित उत्पीड़न को रोकने के लिए वांछित इच्छाशक्ति दिखायेगा और अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून को प्रभावी ढंग से लागू कराएगा ताकि दलित उत्पीड़न कम हो सके. पर क्या वास्तव में ऐसा होता है?

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हाथरस पर दलित समाज के नेताओं की दबी जुबान चौंकाने वाली है

दलित समाज के लोग दलित राजनेताओं को सामाजिक न्याय की लडाई को बुलंद करने के लिए वोट देते हैं। इस घटना पर दलित समाज से आने वाले नेताओं का मद्धम स्वर निश्चित तौर पर चकित करता है। उन्हें जिस तरह से पीडिता और परिवार को न्याय दिलाने की पैरोकारी करनी चाहिए थी, अभी तक वह दिखाई नहीं दी है।

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गुना प्रकरण: शोषण और दमन का ऐक्शन रीप्ले

जैसा कि इस तरह के अधिकांश मामलों में होता है सरकार बड़े धीरज और शांति से इस बात की प्रतीक्षा कर रही है कि मीडिया कोई नई सुर्खी ढूंढ ले और बयानबाजी कर रहे विरोधी दल इस मामले से अधिकतम राजनीतिक लाभ लेने के बाद अधिक सनसनीखेज और टिकाऊ मुद्दा तलाश लें

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गुना: राष्ट्रवाद की छाती पर बज रहा जातिवादी बर्बरता का एक शोकगीत

ये कहानी है इस चमचमाते हुए देश में गांव के एक गरीब की। मरते हुए किसान की। सताए गए दलित की। बिलखते हुए बच्चों की।

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जौनपुर: मुसलमानों द्वारा हरिजन बस्‍ती में आग लगाने की पुलिसिया कहानी झूठी – लोक मोर्चा

लोकमोर्चा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भदेठी जाकर मामले की जांच की, आगजनी का मामला संदिग्ध, बेगुनाहों को फंसाया गयालोकमोर्चा और सोशलिस्ट पार्टी ने जारी किया संयुक्त बयान भदेठी मामले की हाईकोर्ट …

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