पंचतत्व: आप बिजली से पानी पीजिए, बिजली आपका पानी पिएगी!

सीएसई ने कुल कोयला आधारित बिजली उत्पादन क्षमता के 154 गीगावाट से अधिक का सर्वेक्षण किया है और पाया कि मीठे पानी पर आधारित लगभग 50 प्रतिशत संयंत्र अनुपालन नहीं कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर प्लांट सरकारी कंपनियों के हैं।

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पंचतत्व: शोर मचाना बंद कीजिए, अन्य जीवों का अस्तित्व खतरे में है!

वैज्ञानिक पत्रिका साइंस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इंसानों के कारण समुद्र में ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है और प्राकृतिक आवाजें गुम होती जा रही हैं, जिसका असर छोटी झींगा से लेकर व्हेल तक की जिंदगी पर पड़ रहा है।

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पंचतत्व: इस धरती पर मनुष्य के अलावा दूसरे प्राणी भी हैं, उनकी आज़ादी के बारे में कब सोचेंगे हम?

अब वक्त आ गया है कि आपको तय करना होगा कि आपके घर में जलती बिजली चाहिए या सोन चिरैया! शीर्ष अदालत ने सोन चिरैया के पक्ष में खड़ा होना ठीक समझा है और राजस्थान के जैसलमेर की सौर ऊर्जा परियोजनाओं को अपने बिजली के तार जमीन के नीचे बिछाने के आदेश दिए हैं।

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पंचतत्व: बाढ़ से डरिए मत, इसी बहाने नदी में कुछ तो साफ पानी बहे…

यमुना जहां अभी बह रही है, यह उसी का रास्ता है। उफान मारते पानी को देखकर हम डर इसलिए रहे हैं क्योंकि हमने अवैध रूप से उसके पेटे में अपना घर बसा लिया है।

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पंचतत्व: रासायनिक उर्वरकों में फंसी तितली रानी की जान

मिट्टी और पौधों के जरिये नाइट्रोजन के तितलियों में पहुंचने का यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ बासेल ने किया है। यह अध्ययन स्विट्जरलैंड में किया गया है, लेकिन शोध साफ तौर पर नाइट्रोजन जमाव से तितलियों की विविधता में आने वाली कमी की तरफ इशारा करता है।

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पंचतत्व: बांधो न नाव इस ठाँव बंधु…

सिर्फ नोएडा की बात करें तो यहां पर ऑक्सीजन शून्य है। एक छदाम ऑक्सीजन नहीं बचता वहां। यूपीपीसीबी के आंकड़े कहते हैं कि ‘यमुना बगैर घुली ऑक्सीजन के नोएडा में घुसती और उच्च स्तर के प्रदूषण के साथ शहर से बाहर निकल जाती है।‘

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पंचतत्व: देखन में कॉटन लगे, घाव करे गंभीर!

आखिर कान साफ करने के लिए इस्तेमाल होने वाले इस छुटकी-सी डंडी और उस पर चिपकी छटांक भर रुई से समंदर कैसे गंदा होता होगा?

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पंचतत्व: वन्यजीव और इंसानों का संघर्ष जैसा ‘कड़वी हवा’ में है, उसके मुकाबले ‘शेरनी’ झालमुड़ी है!

शेरनी ने एक अच्छे विषय के साथ वही कर दिया है जैसा पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर हमारे अफसरान कर गुजरते हैं। मानव-जीव संघर्ष की गहराई को उकेरने के लिए हमें बेशक ‘कड़वी हवा’ जैसी फिल्म का रुख करना चाहिए, जो कई परतों में समस्या को उघाड़ती है।

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पंचतत्व: भरालू में इतना कुछ भर गया कि उसकी धारा को ही निगल गया!

आप उत्तर भारत के हैं या कभी गुवाहाटी नहीं गये हैं तो आपको इस नदी का नाम भी पता नहीं होगा। गुवाहाटी के भी अधिकतर लोग इसको भूल गये हैं।

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पंचतत्व: साल के दस महीने समंदर तक पहुँचने से महरूम हो गयी है सिंधु

सिंधु नदी पाकिस्तान में जाकर समंदर में गिरने से पहले भारत, अफगानिस्तान और चीन से होकर बहती है। इस इलाके में, खासतौर पर पाकिस्तान में सिंधु नदी के पानी पर इतनी बडी आबादी के लिए पेयजल और खेतों की सिंचाई का दबाव इतना है कि साल भर में 10 महीने यह नदी समंदर तक नहीं पहुंच पाती है।

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