UP: गाज़ीपुर में पेट्रोल पम्‍पों को तुगलकी फ़रमान, सीतापुर में किसान आंदोलन मने ‘आपसी विवाद’!

थाना प्रभारियों ने अपने-अपने क्षेत्र के पेट्रोल पम्‍पों को धारा 144 सीआरपीसी के तहत जारी नोटिस में कहा गया है कि वे 26 जनवरी तक किसी भी ट्रैक्‍टर को अथवा कैन या ड्रम में तेल न दें। इस आदेश के उल्‍लंघन पर कार्रवाई की चेतावनी दी गयी है।

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दो महीने से चल रहे किसान आंदोलन को समझने के लिए कुछ ज़रूरी बिन्दु

इस समय इस आंदोलन पर बहुत सारे विश्लेषण आ रहे हैं लेकिन उन्हीं विद्वानों के विश्लेषणों पर ध्यान दें जो पिछले कई दशकों से किसानों के हित की बात कर रहे हैं। कॉरपोरेट घरानों के शुभचिंतक विद्वानों के नजरिये को पढ़ते समय भी इन विश्लेषणों की रोशनी में ही उनकी परख करें।

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गणतंत्र दिवस किसान परेड का रूट तय, ओडिशा के किसान पहुंचे गाजीपुर बॉर्डर

संयुक्त किसान मोर्चा प्रेस नोट60वां दिन, 23 जनवरी 2021 दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारियों के साथ बातचीत में संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने किसान गणतंत्र दिवस …

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आंदोलन का समर्थन करने से पहले अमिताभ को फर्जी किसान बनाने के लिए माफी मांगें अखिलेश: कांग्रेस

अल्पसंख्यक कांग्रेस प्रदेश चेयरमैन शाहनवाज़ आलम ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा किसान आंदोलन के समर्थन में 26 जनवरी को हर ज़िले में ट्रैक्टर रैली निकालने की घोषणा को नौटंकी बताया है।

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आज सरकार के सामने कानून रद्द करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है!

किसानों के बीच अब यह भावना पूरे देश में पनप रही है कि वे जीत की कगार पर हैं। सरकार के साथ अब तक हुई 10 दौर की बातचीत को देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि सरकार लगातार पीछे हट रही है। किसान आगे बढ़ रहे हैं। सरकार का जनाधार सिकुड़ रहा है।

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छोड़कर मत जाओ बिजूका: तैलचित्रों में उभरते खेती-किसानी के संकट से एक सृजन संवाद

वह सपने संजोते रहता है कि माँ के सुनहरे आँचल में रंग-बिरंगे अंकुर अंकुरित होंगे और वह उस आँचल की छाँव में सुकून से आराम करेगा। इस तरह उसकी दुनिया लह-लहा उठेगी। लेकिन हकीकत तो कुछ और ही है – निरंतर प्रकृति की लूट-खसोट और जलवायु परिवर्तन की मार किसान ही झेल रहा है। साथ ही इसके सत्ता को संचालित करने वाली ताकतों याने कॉर्पोरेट घरानों के कृषि के काले कानूनों से भी।

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बात बोलेगी: ‘अपहृत गणराज्‍य’ की मुक्ति की सम्‍भावनाओं का उत्‍तरायण!

बदलाव ऐसे ही होता है। पहले कुछ बदलते हैं, फिर बहुत लोग बदलते हैं। एक लहर दूसरे के लिए जगह बनाती है, उसे पैदा करती है। लहरें अब शांत और ठहर चुके तालाब में हलचल मचा चुकी हैं। हम उन्हें उठते गिरते देख रहे हैं।

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पॉलिटिकली Incorrect: सिंघु बॉर्डर का लगातार उठता मंच और चढ़ता इक़बाल

इस आंदोलन में 26 जनवरी को ‘किसान गणतंत्र दिवस परेड’ एक ऐसा मुकाम साबित हो सकता है जहां से आंदोलन एक नई ऊंचाई हासिल करेगा, बशर्ते यह मोर्चे की रणनीति के अनुसार सम्पन्न हो पाए। तब सिंघु पर लगे इस मंच का इक़बाल कुछ और फुट ऊंचा हो जाएगा।

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किसान आंदोलन में गतिरोध: अड़ियल रवैया किसानों का या सरकार का?

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का आदेश जो भी हो लेकिन किसान संगठनों और सरकार के बीच एक टेबल पर बातचीत तो हो रही है लेकिन कायदे से देखें तो बातचीत में दोनों ओर से सिर्फ अपनी अपनी ही बात कही जा रही रही है। ना सरकार किसानों की बात मान रही और ना ही किसान सरकार की बात मान रहे हैं।

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किसान आंदोलन ने आत्मनिर्भरता की असली लड़ाई का रास्ता खोल दिया है!

क्या सरकार शेयर बाजार में होने वाले लेन-देन पर मात्र 0.5% का टर्नओवर टैक्स लगाकर आत्मनिर्भरता कर नहीं लगा सकती और इसके जरिए 4-5 लाख करोड़ रुपये सालाना नहीं वसूल सकती है? जबकि 1% के आत्मनिर्भरता कर के माध्यम से किसानों की मांग और गरीब भारत को व्यापक खाद्य सुरक्षा प्रदान करने से जुड़ी तमाम लागतों से भी अधिक राजस्व की वसूली हो सकती है।

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