नालंदा से कोलकाता वाया जर्मनी: किताबों से डरने वाली राजनीति जारी है

पुस्तकें किसी एक विचारधारा की प्रतिनिधि नहीं होतीं। उनमें सत्ता के पक्ष में लिखे गए ग्रंथ भी होते हैं और सत्ता की आलोचना करने वाले दस्तावेज भी; धार्मिक दर्शन भी होता है और नास्तिक चिंतन भी; राष्ट्र के गौरव का आख्यान भी होता है और उसके इतिहास की असुविधाजनक पड़ताल भी। पुस्तक का मूल स्वभाव ही यह है कि वह एक से अधिक दृष्टियों के लिए जगह बनाती है। इसीलिए स्वतंत्र विचार से भयभीत राजनीति को उन पुस्तकों से विशेष परेशानी होती है जो उसके बनाए नैरेटिव के बाहर खड़ी होकर सवाल करती हैं।

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बंगाल का अकाल और ख़्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म ‘धरती के लाल’: IPTA की शृंखला

बिजन भट्टाचार्य का नाटक ‘नबान्न’ देखने के लिए जब अब्बास साहब 1943 गए तो वहां उन्होंने अकाल की वजह से पलायन करके कलकत्ता आए भीख माँगते किसानों और भूख की वजह से कचरे के ढेर से खाना तलाशते बच्चों, सड़कों पर गरीबों की लाशों तथा उसके बरक्स शानदार होटलों में चलते अमीरों के उत्सवों और जश्नों को देखा जिससे विचलित होकर और इसी विषय पर बने नाटक ‘नबान्न’, ‘अंतिम अभिलाषा’ और कृष्ण चन्दर की कहानी ‘अन्नदाता’ से प्रेरित होकर ‘धरती के लाल’ फिल्म बनाने की योजना बनायी।

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