आगरा: दुनिया की बदलती तस्वीर और भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात पर व्याख्यान

डॉ.  जया मेहता ने कहा कि यह डॉलर वाले 220 अरबपति और जी-7 के देश हमारी पहचान नहीं हैं। हमारे लोग ही हमारी पहचान हैं और वे 95 फ़ीसदी ग़रीब हैं। पहले कांग्रेस और अब भाजपा के शासनकाल में जो आर्थिक नीतियाँ देश में अपनायी गईं हैं, उनसे अमीर-ग़रीब की खाई बहुत तेज़ी से चौड़ी हुई है। जितनी ज़्यादा ग़ैर बराबरी हमारे देश में बढ़ती जा रही है, उससे किसी भी समाज में शांति और स्थायित्व हो ही नहीं सकता। 

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सीतामढ़ी: गांव के स्कूल शहर से पीछे क्यों रह जाते हैं?

यह स्थिति केवल संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि ग्रामीण शिक्षा के प्रति लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा का भी संकेत है। यदि गांवों के स्कूलों को शहरों के बराबर लाना है तो केवल भवन निर्माण पर्याप्त नहीं होगा।

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मुजफ्फरपुर: राशन के इंतजार में ठंडे होते चूल्हे और खाद्य सुरक्षा का सवाल

नरौली गांव की महिलाओं का कहना है कि राशन नहीं मिलने पर उन्हें स्थानीय दुकानदारों से उधार पर अनाज लेना पड़ता है। कई बार दुकानदार भी लंबे समय तक उधार देने से मना कर देते हैं

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गरीबी सिर्फ आर्थिक नहीं, सोशल जस्टिस का भी मसला है!

अगर सीधे कहा जाए तो यही कि ग़रीबी एक ऐसा जाल है जो खुद को ही दोबारा रिप्रोड्यूस करता रहता है। कहना बस यही है कि इकोनॉमिक डेवलपमेंट या GDP का बढ़ना ही ग़रीबी को ख़त्म नहीं कर सकता।

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झांसी : मिस कॉल से बदल रही महिलाओं की दुनिया

महिलाओं को केवल 9899 383851 नंबर पर एक मिस-कॉल देनी होती है। कॉल कटते ही कुछ ही क्षणों में दिल्ली स्थित केंद्रीय सर्वर से उनके पास स्वतः कॉल वापस आती है। इस पूरी प्रक्रिया में उपयोगकर्ता का कोई खर्च नहीं होता। कॉल कनेक्ट होने पर उन्हें आवाज़ के माध्यम से निर्देश दिए जाते हैं।

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हरियाणा : महिला सुरक्षा के ढांचे की कमियों पर सखी मंडल के अनुभव

सखी मंडल के साथ कार्य करते हुए, हरियाणा के विभिन्न जिलों में यह बार-बार सामने आया है कि समस्या संसाधनों या योजनाओं की अनुपस्थिति से अधिक, प्रक्रियाओं की असंगति और क्रियान्वयन की अनिश्चितता से जुड़ी है। किसी भी नीति की प्रभावशीलता उसके डिजाइन से कम, और उसके क्रियान्वयन की संरचना से अधिक निर्धारित होती है।

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अजय भवन में विश्वनाथ त्रिपाठी: क्योंकि सौन्दर्य कभी बूढ़ा नहीं होता…

विश्वनाथ जी का ही फोन था। मैंने खुद को उम्मीद करने से रोका। उन्होंने पूछा कि आपको तीन लोग लाने होंगे मुझे कुर्सी पर बिठाकर उतारने के लिए। मैंने कहा हम चार आ जाएँगे। उन्होंने कहा कि मैं एक घंटे से ज़्यादा नहीं बैठ सकूँगा। मैंने कहा अप दस मिनट बाद वापस जाना चाहेंगे तो आपको वापस ले चलेंगे। बोले- ठीक है, आ जाइए। 

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आज के तकनीकी युग में भी किताबों का महत्त्व कम क्यों नहीं हुआ है…

जब व्यक्ति पढ़ता है, तो वह यह सीखता है कि किसी भी बात को आँख मूँदकर स्वीकार करना आवश्यक नहीं है। यही पढ़ने की आदत धीरे-धीरे तर्कवादी दृष्टि को जन्म देती है, जहाँ “क्यों” और “कैसे” जैसे प्रश्न केंद्रीय हो जाते हैं।

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काश! कुत्तों के पास भी अपना वकील होता…

जब कुत्ते अपने पहले अपराध की सज़ा काटकर लौटेंगे तो इस चिप से उनकी ट्रैकिंग होगी कि कहीं ऐसी वैसी हरकत तो नहीं कर रहे। और फिर से किसी को काट तो नहीं रहे। और अगर कुत्तों ने दूसरी बार किसी को काटा तो उनको होगी सीधे उम्रकैद की सज़ा।

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शिक्षा का लोकतान्त्रिक मूल्य और डॉ. भीमराव अम्बेडकर

डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा दिया गया सूत्र ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ इस सूत्र में ही उनके संघर्षपूर्ण जीवन का व उनके शैक्षिक विचारों का सारांश छिपा हुआ है।

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