मानवता के जाज्वल्यमान नक्षत्र: गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर

टैगोर की विलक्षण प्रतिभा से नाटक और नृत्य नाटिकाएं भी अछूती नहीं रहीं। वह बंगला में वास्तविक लघुकथाएं लिखने वाले पहले व्यक्ति थे। अपनी इन लघुकथाओं में उन्होंने पहली बार रोजमर्रा की भाषा का इस्तेमाल किया और इस तरह साहित्य की इस विधा में औपचारिक साधु भाषा का प्रभाव कम हुआ।

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…जब हमारी खामोशी उन आवाजों से भी ज्यादा ताकतवर साबित होगी जिन्हें तुम आज दबा रहे हो!

कम्युनिज्म को नाकाम ठहराने की ये सारी कोशिशें मजदूर वर्ग के जबर्दस्त डर से पैदा होती हैं। दुनिया भर के क्रांतिकारियों ने रूस, चीन, कोरिया, वियतनाम, क्यूबा और तमाम दूसरे देशों में यह दिखा दिया है कि पूंजीवादी राज सुरक्षित नहीं है। मजदूर जीत सकते हैं।

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भारतीय समाज में सर्वव्याप्त जाति व्यवस्था के विरुध्द संघर्ष

उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राय के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका आंबेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज में हलचल मचा गया।

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सारी विपत्तियों का आविर्भाव निरक्षरता से हुआ: ज्योतिबा फुले

उनको विश्वास था कि छोटी जातियों के लोग सामाजिक समानता के लिए अवश्य संघर्ष करेंगे। ज्योतिबा की तरह और भी वयस्क लोग थे लेकिन ज्योतिबा के पास जो साहस और संकल्प था वह और किसी के पास नहीं था। 21 वर्ष की आयु में ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र को एक नये ढंग का नेतृत्व दिया।

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जीवन-प्रवाह में बहता एक घुम्मकड़: राहुल सांकृत्यायन

राहुल सांकृत्यायन के विचार प्रवाह उनसे संबंधित किसी भी राजनैतिक एंव धार्मिक संगठन की सीमा का स्वाभाविक उल्लंघन करते थे। अतएव एक स्तर के बाद राहुल सांकृत्यायन के निजी विचारों को कोई भी संगठन समाहित नहीं कर पाता था।

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विष्णुचंद्र शर्मा: अनुभव पकी आंखें और सृजन का निरंतर उत्साह ही उनके जीवन की प्रेरणा रहा

वह कहते थे कि अपनी शर्तों पर जीवन जीने के कारण मैं दिल्ली में एक गुमनाम साहित्यकार बनकर रह गया क्योंकि मैंने कभी किसी की चापलूसी नहीं की, सिर्फ अपने मन की करता था। वे घुमक्कड़ प्रवृत्ति के थे। उनका जन्म काशी में हुआ और आशियाना राजधानी दिल्ली में बनाया। उन्होंने अपनी शर्तों पर बनारस से दिल्ली तक का सफर तय किया था।

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स्मृति शेष: इतिहास का क्राफ्ट और प्रो. बी.पी. साहू का अवदान

उनका मानना था कि आज के समाज की बनावट और उसकी संस्कृतियां जिसमें उसका खान-पान भी शामिल है, उस पूर्ववर्ती समाज के साथ जुड़़ा हुआ होता है और वह हमारे समय तक आता है। यानी प्रागैतिहास इतिहास का जीवंत पन्ना होता है।

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अपने सपने के लिए एक युवा का संघर्ष और टीआरपीखोर टीवी चैनल

जैसे ही यह वीडियो वायरल हुआ नोएडा के टीवी चैनल उसके पीछे दौड़ पड़े। अपने-अपने स्टूडियो में घण्टों बिठाकर उसका इंटरव्यू करने लगे। कोई उसको स्टूडियो में लाइव दौड़ा रहा है तो कोई उससे बेतुके सवाल-जवाब कर रहा है।

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दिल्ली का जाता बसंत और घोड़ों की कब्रें: दो लघु कथाएं

दिल्ली का जाता बसंत आज सुबह “सह विकास” के प्रांगण में बहुत सारे सेमल के फूल जमीन पर बिखरे हुए देखे। घंटी के आकार के फूल अपने सुर्ख-पीले रंग में …

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‘संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे’: साहिर लुधियानवी की याद में

इत्तफ़ाक ही है कि साहिर का जन्म भी 8 मार्च को महिला दिवस के दिन ही हुआ। साहिर की शायरी और गीत सुनकर ऐसा लगता है मानो वो स्त्री मन को इस क़दर समझते थे कि गीत लिखते हुए वो ख़ुद औरत हुए जाते हों। एक सेक्स वर्कर से लेकर माँ से लेकर महबूबा तक उन्होंने हर औरत की दास्तां उनके नज़रिए से बयां की है।

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