जिनवर: गृह युद्ध से जूझते सीरिया में खिलता स्त्रीवादी युटोपिया का एक फूल

सुनने में ये जगह एक फेमिनिस्ट यूटोपिया की तरह लगती है लेकिन पितृसत्ता की धुरी के सहारे चलने वाली इस दुनिया में ऐसी एक जगह है जहाँ एक गाँव उसी सपने को लेकर जी रहा है जिसके ख़्वाब दुनिया भर की ना जाने कितनी औरतों की आँखों में हैं।

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डर लगता है कि मेरा वैचारिक बदलाव आपको पसंद नहीं आएगा: शिक्षक के नाम एक विद्यार्थी का पत्र

मेरी भी इच्छा थी कि यदि मैं लिख दूंगा तो यह बातें आप तक भी पहुंच जायेंगी। सर, मेरी इच्छा रहती है कि मैं आपको अपना लिखा हुआ पढ़कर सुनाऊं और आप कहें कि ”तुम्हारी चिट्ठी सुनने का सुख मिला।”

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फागुन में गाली के रंग अनेक…

जैसे बोली से पता चलता है कि इंसान सभ्य है या असभ्य, पढ़ा-लिखा है अनपढ़। यह वर्गीय विभाजन गाली में भी है। पढ़ा लिखा शुद्ध भाषा में गाली देगा जबकि बिना पढ़ा-लिखा बेचारा ठेठ देशज अंदाज में गाली देता है।

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प्रधानी का चुनाव और चौराहे की चाय

हमारे पड़ोस की ग्रामसभा में पिछली दो बार महिला प्रधान थीं लेकिन चुनाव प्रचार से लेकर सारे काम पति महोदय ने किया और एक साल तक तो अधिकारियों को भी नहीं पता था कि फ़लाँ प्रधान नहीं बल्कि प्रधान पति हैं। और गाँववाले तो आज तक ‘पति’ को प्रधान समझते हैं।

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खुद में अलोकतांत्रिक मीडिया कैसे कर सकता है लोकतंत्र की रक्षा?

‘लोगों के लिए’ होने की पहली शर्त है ‘लोगों के द्वारा’ होना। किसी भी संस्था को अपने स्वरूप में लोकतांत्रिक होने के लिए उसमें हर एक वर्ग, जाति, समुदाय की …

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आज अपने चारों ओर बुने जा रहे झूठ से कैसे लड़ते भगत सिंह?

ब्रिटिश साम्राज्यवाद तो भगत सिंह को न डरा पाया न हरा पाया किन्तु वैज्ञानिकता की बुनियाद पर टिके आधुनिक भारत के निर्माण की भगत सिंह की संकल्पना से एकदम विपरीत एक अतार्किक, अराजक और धर्मांध भारत बनाने कोशिशों का मुकाबला वे किस तरह करते इसकी तो कल्पना ही की जा सकती है।

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करोगे याद तो हर बात याद आएगी… यादों में सागर सरहदी

सागर सरहदी सिनेमा से जुड़े उन विरले लोगों में से हैं, जो घंटों किताबें पढ़ना पसंद करते थे. मुंबई के सराय कोलीबाड़ा इलाके में स्थित उनके घर में दीवारों के समानांतर आलमारियों में किताबें भरी पड़ी हैं. उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे कोई पुरानी लाइब्रेरी के बीच रह रहा हो.

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फूलदेई: फूलों और फूल जैसे बच्चों के नाम पहाड़ों का एक त्योहार

यह पर्व सर्दी का अंत और हल्की-हल्की गर्मी का आगाज़ होता है, जब मौसम अधिक रोमांचित हो जाता है, जिस समय हर पहाड़ों पर नए-नए फूलों-पौधों का जन्म होते दिखता है। बुरांश और बासिंग के पीले, लाल, सफेद फूल और और इन्हीं फूलों की तरह बच्चों के खिले हुए चेहरे…

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दांडी मार्च के 91 वर्ष: जन आंदोलन से आततायी सत्ताओं को झुकाया जा सकता है

आज की युवा पीढ़ी के दिमाग से इस घटना और इसके महत्व को बताने के लिए 91 साल पहले हुई उस ऐतिहासिक यात्रा के केंद्र पर उन स्मृतियों को सहेजने के लिए एक स्मारक बनाया गया है।

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बॉलीवुड में किसानों के ऊपर सिनेमा बनाने का जोखिम कौन लेगा?

इस मामले में क्षेत्रीय फिल्मों की स्थिति काफी अच्छी है। खासकर दक्षिण में तमिल, कन्नड़ और तेलुगु फिल्मों में किसानों के ऊपर फिल्में अब भी बन रही हैं। पिछले एक दशक में मराठी सिनेमा में भी इनकी संख्या बढ़ी है।

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