चीन और नेपाल के संकट से लेकर विकास दूबे तक सब कुछ अतिराष्ट्रवाद और बदले की भावना की उपज

अब जब नेपाल चीन के ज्यादा करीब चला गया है हम उसे समझा रहे हैं कि भारत और नेपाल की साझा संस्कृति है। यह काम पहले ही कर लिया गया होता तो यह नौबत नहीं आती कि हमें लगभग चुनौती देते हुए नेपाल ने अपना नक्शा परिवर्तित करके लिपुलेख, लिम्पियाधुरा व कालापानी का वह हिस्सा अपने में मिला लिया जो भारत अपना मानता आया है। क्या अब हम नेपाल से युद्ध करेंगे? क्या युद्ध ही इन समस्याओं का हल है?

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डिक्टा-फिक्टा: युद्धोन्मादी विचारधारा अमेरिकी लॉबीस्टों का काम आसान कर रही है

भद्रकुमार जैसा वरिष्ठ और अनुभवी कूटनीतिक जब यह कहता है कि डोवाल की कोशिशों को नाक़ामयाब बनाने और उसे ग़लत साबित करने की रिपोर्टों और विश्लेषणों के पीछे दिल्ली में मौजूद ताक़तवर अमेरिकी लॉबी है, तो हमें गंभीरता से इसे सुनना-समझना चाहिए.

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अमेरिका की भारत प्रशांत रणनीति का हिस्सा बनने से सरकार को बचना चाहिए: अखिलेंद्र प्रताप सिंह

भारत को अपनी विदेश नीति में बदलाव करना चाहिए और अमेरिका के भारत प्रशांत सैन्य रणनीति से अलग करना चाहिए। भारत राष्ट्र राज्य निर्माण के अभी भी प्रक्रिया में है। उसे लोकतंत्र को कुंजी मानते हुए नागरिकों में नागरिकता बोध पैदा करना चाहिए, सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास करते हुए सीमा विवाद के मुकम्मल निस्तारण के लिए काम करना चाहिए चाहे वह चीन, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका या भूटान हो.

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भारत-चीन सीमा विवाद पर गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी पंडित सुन्दरलाल का यशस्वी लेख

पं. सुन्दरलाल महान देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी हैं तथा गांधीवादी के रूप में विख्यात हैं। ब्रिटिश शासन के जमाने में उन्होंने हलचल मचा देने वाली एक किताब लिखी थी ‘भारत में अंग्रेजीराज’, जिसे ब्रिटिश सरकार ने तुरंत जब्त कर लिया था। 1951 ई. में वे चीन जाने वाले भारतीय शिष्टमंडल के नेता थे। वहां से लौटकर उन्होंने चीन के संबंध में ‘आज का चीन’ प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।

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आर्टिकल 19: बहिष्कार चाइना का माल है!

जुमला गढ़ा जा रहा है कि चाइनीज माल का बहिष्कार करना है। किया जा भी सकता है, लेकिन क्या भारत के लोग इसके लिए तैयार हैं? या और परिष्कृत तरीके से पूछा जाए तो क्या तैयार होंगे?

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युद्ध छेड़ने की हद तक भले न जाए चीन, लेकिन उससे खतरा पाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा है

यह सच है कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि चीन की सैनिक ताकत हमसे कहीं ज्यादा है

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