बिहार में शराबबंदी का मतलब प्रति मिनट 22 लीटर शराब की बरामदगी है!

आंकड़े बताते हैं कि राज्य में इस साल करीब एक करोड़ लीटर से अधिक अवैध देशी और विदेशी शराब पकड़ी जा चुकी है. मुजफ्फरपुर, वैशाली, गोपालगंज, पटना, पूर्वी चंपारण, रोहतास और सारण वाले इलाकों में शराब की अधिकतम बरामदगी हुई है.

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लंगुराही और पंचरुखिया: यहां के लोग नहीं जानते उनका मुख्यमंत्री कौन है!

रास्ते में हमें टाटा नमक और चिप्स के खाली पैकेट कहीं कहीं जरूर पड़े मिले जिसे देखकर मन में यही बात घूमने लगी कि इसे कॉरपोरेट का दम कहें या सरकार की नाकामी कि आज़ादी के इतने साल बाद भी जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली नहीं पहुंच पायी, बिजली नहीं पहुंच पायी, वहां जाने के रास्ते में चिप्स के पैकेट और नमक के पैकेट जरूर पहुंच गये।

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किसान आंदोलन: बिहार में पप्पू यादव ने खोला मोर्चा, भोपाल में गिरफ्तारियों का दौर शुरू

कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को भोपाल में आज सुबह हिरासत में लिया गया। नीलम पार्क में विभिन्न किसान संगठनों के संयुक्त मंच, संयुक्त किसान मोर्चा के तत्वाधान में किसान सत्याग्रह का आह्वान किया गया था।

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राग दरबारी: खुद को ‘किसान’ कहने वाले 25% से ज्यादा सांसदों की हैसियत क्या कुछ भी नहीं?

किसानों के पास किसी तरह की कोई आर्थिक ताकत नहीं रह गयी है जबकि संसद में सिर्फ 25 (2.73 फीसदी) सांसद ऐसे हैं जो अपने को उद्योगपति कहते हैं, लेकिन इनके हितों को लाभ पहुंचाने के लिए पूरा देश तैयार है।

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हिन्दी पट्टी के किसान आंदोलनों को कैसे निगल गयी मंडल की राजनीति और उदारीकरण

औपनिवेशिक काल और आजादी के बाद के पांच दशकों तक इन दोनों प्रदेशों में किसान आंदोलन जिंदा रहे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों खासकर 1990 के बाद इन प्रदेशों में किसान आंदोलन के कोमा मे चले जाना एक पूरी प्रक्रिया का परिणाम है।

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शपथ ग्रहण तो हो गया, अब नीतीश की ‘ग्रेसफुल विदाई’ तय करेगी सरकार की उम्र

या तो खट्टर और फडणवीस की तरह बिहार में भी तारकिशोर प्रसाद औऱ रेणु देवी को लाया-बढ़ाया जा रहा है या फिर मोदी-शाह द्वय ने सोच लिया है कि बिहार में नीतीश से सीधा वे ही डील करेंगे

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बात बोलेगी: जीत के सौ अभिभावक और हार का अनाथ हो जाना

क्या बिहार के चुनाव में उन मुद्दों का कोई मतलब नहीं था, जिनसे राष्ट्रीय राजनीति की दशा-दिशा बनती बिगड़ती है? इन मुद्दों को उठाने की कीमत कांग्रेस ने न केवल बिहार, बल्कि तमाम राज्यों में चुकायी है, लेकिन प्रादेशिक चुनाव को महज़ स्थानीय तो नहीं बनाया जा सकता है न?

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अंतिम नतीजा चाहे जो हो, यह जनादेश सिर्फ और सिर्फ नीतीश के खिलाफ है!

तेजस्वी अगर इस चुनाव के एकल विजेता हैं, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हार के सर्वाधिक उचित व्यक्तित्व। वैसे तो राजनीति में नैतिकता और शर्म नामक शब्द होते नहीं, लेकिन नीतीश को नतीजे देखते हुए खुद ही अब संन्यास ले लेना चाहिए, केंद्र की राजनीति चाहें तो करते रहें।

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बिहार: एक पुल के इंतज़ार में 42 साल से यहां ढलती जा रही हैं पीढ़ियां

मुजफ्फरपुर और दरभंगा जिले की सीमा पर नेशनल हाइवे 57 से महज डेढ़ किलोमीटर दक्षिण की दिशा में बसा यह गांव अपने ही नागरिकों के प्रति सत्ता, सियासत और प्रशासनिक उपेक्षा का जीता-जागता एक मिसाल है। यह गांव इस बात का सबूत और गवाह है कि आखिर कैसे नेता, जनप्रतिनिधि और अधिकारी उसी जनता से अपना मुंह मोड़ लेते हैं जिसकी सेवा करने का संकल्प लेकर वे अपने पद और गोपनीयता की शपथ लेते हैं।

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पुलिस के हथियारों से मुंगेर में हुआ नरसंहार: घटनाक्रम, संदर्भ व मांगें

बीते 26 अक्टूबर की रात मुंगेरवासियों के लिए दर्द-आंसुओं से भरी एक खौफनाक रात थी, जब दुर्गापूजा के मूर्ति विसर्जन के दौरान दर्जनों लोगों पर पुलिस प्रशासन ने गोलियां चलायीं व बेरहमी से लाठीचार्ज किया। इसमें 18 साल के अनुराग की घटनास्थल पर ही मौत हो गयी।

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