बात बोलेगी: मुखिया ‘मुख’ सों चाहिए…

अगर यह तोहमत है तब ‘किसने किस पर’ लगायी का सवाल खड़ा हो जाता। और कह भी कौन रहा है? जिसमें छप्पन छेद हैं? मतलब कोई ऐसा व्यक्ति जो हमेशा से सेलेक्टिव रहा हो वह किसी और पर यह तोहमत कैसे लगा सकता है कि कोई सेलेक्टिव क्यों है? इसलिए यह मुखिया होने की चुनौती है।

Read More

तन मन जन: अवसाद में डूबता देश और परेशान आम जन

कोरोना संक्रमण ने न केवल मानसिक रोगों से ग्रस्त लोगों की हालात खस्ता कर दी है बल्कि नये मानसिक रोगियों को भी कतार में खड़ा कर दिया है। कोरोना काल में जिन मानसिक रोगों में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई है उनमें ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी), डिप्रेशन (अवसाद), चिड़चिड़ापन, तनाव, भूलने की बीमारी आदि महत्वपूर्ण हैं।

Read More

छान घोंट के: बहुजन नायक कांशीराम का दलित आंदोलन अभी जिंदा है!

जब कांशीराम को समझ आया कि दलित आंदोलन बिना राजनीतिक जमीन के नहीं पनप सकता, तो उन्होंने 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। कांशीराम ने पाली भाषा के शब्द ‘बहुजन’ का इस्तेमाल कर सभी अल्पसंख्यकों को अपने साथ एक बैनर तले लाने की कोशिश की।

Read More

बात बोलेगी: एक सौ चालीस करोड़ की सामूहिक नियति के आर-पार एक ‘थार’

क्या लगता है कि थार में केवल देश के गृह राज्यमंत्री का बेटा बैठा था जो उसे चला रहा था? या यह महज एक आकस्मिक घटना थी? या यह एक एक्सीडेंट था? या इस घटना को अंजाम देते वक़्त और उसके बाद के कार्य-कारणों का आकलन नहीं किया गया था? सब कुछ किया गया था। ध्यान से देखें तो थार उस जन्मकुंडली के रूप में बदलती हुई दिखलायी देगी जो हमारी नियति को गढ़ने के लिए बनायी गयी है।

Read More

हर्फ़-ओ-हिकायत: सौ साल में गाँधी के आदर्शों का अंतर और उनके नये बंदर

आज जब युवाओं का एक तबका मुगल, अंग्रेजी या वामपंथी इतिहास-लेखन का विरोध करते हुए गांधीजी के लिए अपशब्दों का प्रयोग करता है तो उन्हें एक सवाल खुद से करना चाहिए कि बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, वल्लभभाई पटेल और राजेन्द्र प्रसाद जैसी शख्सियतों ने उस दौर में क्यों गांधी को अपना नेता चुना?

Read More

बात बोलेगी: खतरे में पड़ा देश, खतरों के खिलाड़ी और बचे हुए हम!

देश निरंतर खतरे की तरफ तेज़ कदमों से बढ़ा जा रहा है। लगता है देश जो है वो सुसाइडल यानी आत्महंता हो चुका है जो किसी भी तरह मरने पर आमादा है। जैसे कुएं के पाट पर खड़ा हो- अब कूदा कि तब कूदा। और तैरना उसे आता नहीं है, जिसका ज्ञान उसे छोड़कर बाकी सबको है। इसलिए सब उसे कूदने से रोक रहे हैं। डर लग रहा है देखकर कि कहीं कुछ लापरवाही न हो जाए। हाथों से छिटककर देश कहीं सचमुच कुएं में समाधि न लगा ले।

Read More

हर्फ़-ओ-हिकायत: पंजाब के नये मुख्यमंत्री क्या इतिहास को चुनौती दे रहे हैं?

पूरे देश में सबसे ज्यादा दलितों की आबादी पंजाब में ही है लेकिन विडंबना देखिए इन डेरों की वजह से बीएसपी या कोई और दलित पार्टी यहां कभी खड़ी नहीं हो सकी। दलित सिर्फ डेरा प्रमुख के आदेश पर वोट डालते रहे।

Read More

तन मन जन: भारत में जनस्वास्थ्य और बच्चों की मौत

इसमें कोई शक नहीं कि विगत तीन दशकों में शिशु और मातृ मृत्यु दर में अपेक्षाकृत कमी आयी है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता अब भी उतनी नहीं सुधर पायी है जितना दावा किया गया है। यह बात ध्यान देने की है कि नवजात शिशुओं के जीवन का पहला एक महीना माँ और बच्चे दोनों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसलिए देश की सेहत के लिए यह जरूरी है कि मातृ व शिशु स्वास्थ्य पर ईमानदारी से जिम्मेवारी तय कर ध्यान दिया जाए।

Read More

बात बोलेगी: पालतू गर्वानुभूतियों के बीच खड़ी हिंदी की गाय

आप हिन्दी बरतते हैं क्योंकि आपको आसान लगता है। आप हिन्दी पढ़ते हैं, लिखते हैं, समझते हैं तो इसलिए क्योंकि उस भाषा में आप खुद को सहज पाते हैं और इसलिए भी कि वो आपके काम की ज़रूरत है और इसलिए भी कि क्योंकि उसमें आपको काम करने को कहा गया है। तब दुनिया में ऐसी कौन सी भाषा है जो इन तीनों में परिस्थितियों में ही बरती न जाती हो?

Read More

हर्फ़-ओ-हिकायत: हिन्दी दिवस पर सितारा-ए-हिन्द राजा शिवप्रसाद की याद

शिवप्रसाद बाबू सामाजिक तौर पर बहिष्कृत किए जाते रहे क्योंकि वे अंग्रेजों के पक्षधर थे। यहां तक कि उनके शिष्य़ भारतेन्दु हरिश्चंद्र का गुट भी उन्हें सरकारी मुलाजिम कहकर खारिज करता रहा।

Read More