बात बोलेगी: वबा के साथ बहुत कुछ आता है और जाता भी है!

महामारी की पैदाइश से लेकर आज की विभीषिका के इतिहास को जब लिखा जाएगा तो उनका भी नाम यहां आना चाहिए जो इसे लेकर आलोचनात्मक और तार्किक नज़रिये से बात करते आए। तब भी उन्हें संख्या बल के सामने हुज्जत झेलनी पड़ी, लेकिन गत एक सप्ताह के दौरान हम देख रहे हैं कि उन्हें लगभग बेइज्जती नसीब हो रही है।

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पंचतत्व: सतभाया का शेष

कानपुरू में 303 घर बचे हैं और उनमें अफरातफरी का, बेचैनी का आलम बना रहता है. पड़ोस के सतभाया गांव में भी परिस्थिति कमोबेश ऐसी ही है. हर साल समुद्र करीब 80 मीटर आगे बढ़ जाता है.

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दक्षिणावर्त: एक चुनाव मैनेजर और कुछ एलीट पत्रकारों के नक्कारखाने से रिसते दुख

यह बात समझने की है कि एपल का एचआर मैनेजर कभी भी स्टीव जॉब्स नहीं बन सकता है, उसी तरह सोशल मीडिया या चुनाव-प्रबंधन करनेवाला व्यक्ति कभी भी नेता की जगह नहीं ले सकता है और अगर नेता में, उसके कैंपेन में दम नहीं है तो कितना भी अच्छा मैनेजर हो, वह कुछ नहीं बिगाड़ या बना सकता है।

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देशान्तर: Tatmadaw को जेनरेशन Z की चुनौती और म्यांमार में लोकतंत्र की कठिन डगर

एक अस्थिर और अशांत म्यांमार इस क्षेत्र में शांति और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए चिंताजनक है और इसके लिए ज़रूरी है कि दुनिया भर के जनतांत्रिक देश और आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन का साथ दें।

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बात बोलेगी: जो संस्थागत है वही शरणागत है!

शादी-ब्याह या किसी सामुदायिक आयोजन में किसे जाना है, किसे बुलाना है, कितनों को बुलाना है जैसे मसले कभी इन संस्थाओं के अधीन नहीं रहे, लेकिन कोरोना महामारी के बहाने राजकीय संस्थागत प्रभावों से मुक्त इस नितांत अनौपचारिक कहे जाने वाले कार्य-व्यवहार को संस्थागत राजनैतिक ढांचे में ला दिया है।

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दक्षिणावर्त: संघ को अब बता ही देना चाहिए कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ का उसका रोडमैप क्या है!

यह बात कहने में दुःखद कितनी भी लगे, लेकिन संघ के पास लोग नहीं हैं। न तो शीर्ष पर बिठाने लायक, न ही मध्यक्रम के। जितनी भी ऊर्जा है, वह सब प्रारंभिक स्तर पर है, प्रवेश की है और इसीलिए इतनी भगदड़ हो रही है।

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बात बोलेगी: कश्मीर में बैठ के कश्मीर को समझने का अहसास-ए-गुनाह

आखिर को दिल्ली- जिसे देश की राजनैतिक राजधानी का दर्जा प्राप्त है और जिसके वैभव में कश्मीर से कम सभ्यताओं और शासकों के आवागमन का इतिहास दर्ज है- भी ठीक उसी गति को प्राप्त हुई है जिस गति को कश्मीर? क्या वाकई कोई नागरिक प्रतिरोध दिल्‍ली में देखा गया? याद नहीं पड़ता।

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तन मन जन: लाकडाउन का एक साल और निराशा के कगार पर खड़ी 130 करोड़ की आबादी

स्कूल बंद हैं। यातायात बाधित है। व्यापार लगभग ठप है। युवा तनाव में है। लोगों के आपसी रिश्ते दरक रहे हैं। पुलिस और प्रशासन की निरंकुशता ज्यादा देखी जा रही है। लोगों की ऐसी अनेक आशंकाओं को यदि ठीक से सम्बोधित नहीं किया गया तो 130 करोड़ की आबादी में जो निराशा फैलेगी उसका इलाज इतना आसान नहीं होगा।

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दक्षिणावर्त: बड़े लोगों के आपसी हास्य-विनोद और वाम-उदार चिंतकों का भोलापन

यह सरकार शिक्षा के साथ खिलवाड़ के मामले में अब तक की सभी सरकारों से अधिक सक्रिय है, तो यह बहुत राहत की बात है कि अब तक इस सरकार ने कोई नयी यूनिवर्सिटी खोलने की नहीं सोची है, वरना नालंदा के बाद बारी तो तक्षशिला की ही थी।

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बात बोलेगी: जो जीता वही सिकंदर, जो हारा वो जंतर-मंतर!

अगर बाहर यानी सदन के अलावा कहीं भी ठीक यही सुरक्षा, संरक्षण, मर्यादा व सभ्यता नहीं है तो सदन पर भी इसका प्रत्यक्ष प्रभाव होगा। सदन को मिली विशिष्टता उसे सुरक्षा देने में कभी भी चूक जाएगी।

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