नया चुनाव, पुराना नशा: कितनी कारगर होगी भाजपा की ‘नशामुक्त पंजाब यात्रा’?

18–30 सितंबर 2026 तक चलने वाली भाजपा की यात्रा की कुल दूरी लगभग चार हजार किलोमीटर है जो सभी 117 विधानसभा सीटों से होकर गुजरेगी। चार समानांतर यात्राएं पठानकोट, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का और तलवंडी साबो से शुरू हुई हैं। समापन जालंधर में होगा जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संबोधन की योजना बताई गई है।  

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पंजाब: बहुकोणीय मुकाबले में अपना संगठन ही कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती?

सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी मिलने के बाद कांग्रेस की संगठनात्मक दिशा को लेकर उत्सुकता तो बढ़ी है, लेकिन उसका कोई स्पष्ट राजनीतिक संदेश अभी तक व्यापक स्तर पर धरातल पर उतरता दिखाई नहीं देता। हाईकमान के निर्णय को पार्टी के विभिन्न गुटों ने अपेक्षाकृत सकारात्मक ढंग से स्वीकार किया है।

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पंजाब: एक सजायाफ्ता मुजरिम के भरोसे हो रहे चुनाव में डेरे का रुझान किधर?

राजनीतिक तौर पर डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत सिंह राम रहीम की परोल के कई मायने हो सकते हैं। कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने अभी से पंजाब में कांग्रेस की कोई लहर बनने की संभावनाओं को हाशिये पर डाल दिया है। डेरा का झुकाव कांग्रेस के तरफ होना मुमकिन नहीं लगता । शिरोमणि अकाली दल (बादल) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कोई समर्थन अब अपनी साख के सवाल पर गुरमीत सिंह से ले नहीं पाएगा। भाजपा अकेले पंजाब में इतनी सीट जीतने की स्थिति में फ़िलहाल दिखाई दे नहीं रही है कि वो सरकार बना सके। आम आदमी पार्टी के प्रति असंतोष इस क्षेत्र में बहुत बढ़ा हुआ है।

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हरियाणा कांग्रेस: प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी की लड़ाई में निगम चुनाव खटाई में!

कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व एक तरफ सत्ता से सीधा टकरा रहा है तो प्रदेश में नेतृत्व अपने राजनीतिक वर्चस्व को बनाने में लगा हुआ है जिसके कारण कांग्रेस का एक दशक से अपना आधार प्रदेश में सिमटता जा रहा है। 

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नरम हिन्दुत्व या ‘सेकुलर’ दलों की लड्डू पॉलिटिक्स?

तिरुपति मंदिर में तैयार हो रहे लड्डुओं में मिलावट पर गुजरात की प्रयोगशाला की जुलाई की एक रिपोर्ट के चुनिंदा अंश हरियाणा आदि राज्यों में हो रहे चुनावों के ऐन पहले सार्वजनिक करने की बेचैनी इस बात की तरफ साफ इशारा कर रही थी कि मामला इतना आसान नहीं है

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क्या हरियाणा में परिवर्तन की नई संभावना होंगी कुमारी शैलजा?

कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के सन्देश को प्रदेश में 90 विधानसभा तक पहुँचाने के उद्देश्य से शुरू की गई इस यात्रा में जिस तरह लोग कड़ाके की ठंड में बाहर आए हैं और देर रात तक सड़कों पर दिखाई दिए, ऐसी उम्मीद शायद एसआरके गुट को भी न रही होगी।

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गुजरात चुनाव सत्ता को कांग्रेस द्वारा दिया गया ‘वाकओवर’ था! कुछ जरूरी बिन्दु

गुजरात चुनाव का कांग्रेस के लिए एक स्पष्ट सन्देश यही है कि वह मास पॉलिटिक्स के अपने सांगठनिक राजनैतिक तंत्र पर पुनः विचार करे। अन्यथा उसकी जगह आप पार्टी लेने को तैयार है।

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आज़ाद भारत में दलित सशक्तिकरण के तीसरे चरण की शुरुआत

भाजपा सरकार द्वारा उन्हें कमजोर करने के इन षड्यंत्रों से दलित वर्ग में बेचैनी है। भाजपा के लिए भी अब इन्हें रोक पाना चुनौती बनती जा रही है। ऐसे में कांग्रेस खड़गे के चेहरे और राहुल और प्रियंका गांधी के दलितों के पक्ष में खड़े रहने वाले नेता की छवि के मिश्रण से हिंदी बेल्ट में इन्हें फिर से अपने साथ ला सकती है।

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चुनावी पॉलिटिक्स की असाध्य वीणा को यात्रा से साधने की एक कोशिश

भविष्य राहुल गांधी का ही मगर इसके लिए राहुल गांधी को एक लकीर खींचनी पड़ेगी। यह लकीर तब तक नहीं खींच सकते जब तक कांग्रेस के वेटरन चाटुकारों की सरपरस्ती से राहुल खुद को निकाल कर अपनी एक अलग इमेज नहीं बना लेते। यह भारत जोड़ो यात्रा दरअसल राहुल की इमेज बनाने की कवायद ही है।

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क्या ‘परिवार’ की कांग्रेस ही राहुल गांधी के सपनों की नयी कांग्रेस है?

अध्यक्ष पद की उम्मीदवारी को लेकर मचे घमासान से बात साफ हो गयी थी कि ‘परिवार’ पार्टी संगठन पर अपनी पकड़ को ढीली नहीं पड़ने देना चाहता है। अस्सी-वर्षीय मल्लिकार्जुन खड़गे की एंट्री के बाद चीजों को लेकर ज्‍यादा स्पष्टता आ गयी है कि 17 अक्टूबर को मुक़ाबला परिवार के प्रति ‘वफादारी’ और विद्रोहियों द्वारा की जा रही पार्टी के ‘सामूहिक नेतृत्व’ की माँग के बीच होना है। सभी मानकर चल रहे हैं कि जीत अंत में ‘वफादारों’ की ही होती है।

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