मनु को इतिहास तक सीमित करने का सवाल बनाम मनुस्मृति को ‘सैनिटाइज़’ करने के षडयंत्र

मनु को इतिहास तक सीमित करने का सवाल निश्चित ही व्यापक उत्पीड़ित समुदायों के लिए ही नहीं बल्कि अमन और इन्साफ के हर हिमायती के लिए बेहद जरूरी और मौजूं सवाल लग सकता है, लेकिन जिस तरह यह समाज ‘राजनीतिक बुराइयों से कम और स्वतःदंडित, स्वतःस्वीकृत या स्वतःनिर्मित और टाले जाने योग्य बुराइयों से कहीं अधिक परेशान रहता है उसे देखते हुए इस लक्ष्य की तरफ बढ़ने के लिए हमें कैसे दुर्धर्ष संघर्षों के रास्ते से गुजरना पड़ेगा, इसके लिए आज से तैयारी जरूरी है।

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औपनिवेशिक लूट के साझा अतीत बावजूद अश्वेतों के प्रति हमारा व्यवहार अहंकारपूर्ण क्यों है?

उपनिवेशवाद की विरासत ने दोयम दर्जे के भारतीयों की एक ऐसी राष्ट्रीय पहचान को मजबूती प्रदान की जो आज भी श्वेत रंग को अश्वेत रंग से ऊंचा मानने के जरिये अभिव्यक्त होती है

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‘जूनटीन्थ’ दिवस: आज़ादी और इंसाफ़ के नारों तले दबे हैं नाइंसाफ़ी के कंकाल

1865 में दासता से कथित आज़ादी का ऐलान और आज इतने बरस बाद 2020 में एक बार फिर अश्वेत लोगों का खुलेआम क़त्ल हो रहा है- अश्वेत वर्ग रोज़ ही पूछता होगा कि आखिर वह कैसी आजादी थी।

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गांधी जी दुनिया को भारत का महानतम निर्यात हैं, अब यह अच्छा हो चाहे बुरा: अरुंधति रॉय

हम अमरीका  में चल रहे आंदोलन का समर्थन किस तरह करें और भारत में विरोध कर रहे लोगों के साथ कैसे एकजुटता ज़ाहिर करें? मेरे ख्याल से आपका आशय श्वेत …

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जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या के व्यापक प्रतिरोध की ऐतिहासिक परम्परा और कुछ सबक

अमेरिका के वर्तमान विरोध-प्रदर्शन क़रीब 300 से अधिक शहरों में आयोजित किये गये। ये प्रदर्शन पूरे देश में फैले हैं जो एक प्रकार की अनोखी बात है। अमरीकी इतिहास में …

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आज भी अधूरा है मार्टिन लूथर किंग का सपना

वर्ष 1963 में अगस्त 29 को अमरीका की राजधानी वाशिंगटन में एक बड़ा प्रदर्शन हुआ था। प्रदर्शन का नेतृत्व मार्टिन लूथर किंग जूनियर कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों की मांग थी ‘हमें सम्मान और काम …

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