सहजीविता का इतिहास और इतिहास की ऐतिहासिकता: नदी पुत्र की एक सुदीर्घ समीक्षा

अच्छी किताब की एक विशेषता यह है कि वह आप के मस्तिष्क में विचारों की नयी तरंग पैदा कर देती है, आपको नया कुछ सोचने-विचारने को प्रेरित करती है। इस शोध-प्रक्रिया में लेखक ख़ुद निषादों के जीवन में झांकते-झांकते ‘एन्थ्रोपोसीन’ की वैचारिकी में जा पहुँचे, और इस तरह उन्हें अपने आगामी शोध का आधार मिल गया।

Read More

रामत्व की तलाश में नैतिक पतन को अभिशप्त नायक: मिथिला और रूस के लोक से दो छवियाँ

मेहनतकश लोगों एक ऐसा वर्ग जो समाज में वर्गहीन होता है, दुनिया के सभी क्षेत्रों में इनकी स्थिति कमोबेश ऐसी ही रही है। अच्छा जीवन कैसे जिया जाए सोचते-सोचते ये लोग कब नैतिक पतन और नैतिक भ्रष्टाचार के शिकार होते चले जाते हैं इन्हें भी नहीं पता चलता।

Read More

Gun Island : बन्दूकी सौदागर के बहाने श्राप जैसे कुछ सपने और फंतासी की उड़ान

हमारे आज में जो कुछ हो रहा है उसके कारण हमारे अतीत में कहीं मौजूद होते हैं। उन्दे ओरीगो इन्दे सालूस, मतलब आरम्भ से ही आती है मुक्ति। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखक श्री अमिताभ घोष का उपन्यास ‘बन्दूक़ द्वीप’ जो Gun island का हिन्दी अनुवाद है को हम पढ़ें तो निष्कर्ष के रूप में यह दो बातें हमारे सामने आती हैं।

Read More

नदी पुत्र: ऐतिहासिक बदलाव की रोशनी में नदियों और उनकी संतानों की दास्तान

इसके एक ब्लर्ब में शेखर पाठक ने ठीक ही लिखा है कि यह किताब स्रोतों की व्याख्या और शोधविधि के लिहाज से इतिहास लेखन में एक हस्तक्षेप है। इसमें पाठ, मानवविज्ञान और अभिलेखीय सामग्री का मोहक समन्वय है।

Read More

जिंदगी क्या है सफर की बात: एक उद्यमी के चश्मे से समाज की छवियां

लेखक ने समाज की विसंगतियों और इसमें छुपे हुए दमनकारी तत्वों को उसके राजनीतिक निहि‍तार्थों को सामने लाने के लिए पूरी पुस्तक में टिप्पणियों के सहारे काम किया है। महिलाओं के मामले में जिन टिप्पणियों का सहारा लिया गया है वह निहायत ही प्रतिक्रियावादी सोच को सामने लेकर आती हैं। यह इस पुस्तक का सबसे कमजोर पक्ष है।

Read More

बसंत पंचमी पर निराला और उनकी कविता की याद…

निराला की मौलिकता, प्रबल भावोद्वेग, लोकमानस के हृदय पटल पर छा जाने वाली जीवन्त व प्रभावी शैली, अद्भुत वाक्य विन्यास और उनमें अन्तनिहित गूढ़ अर्थ उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करते हैं। बसंत पंचमी और निराला का सम्बन्ध बड़ा अद्भुत रहा और इस दिन हर साहित्यकार उनके सानिध्य की अपेक्षा रखता था। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में निराला की काव्य रचना में यौवन का भावावेग दिखा।

Read More

संक्रमण काल: साहित्य का नया रास्ता

वर्चुअल दुनिया से संबंधित इन कविताओं और अक्कड़-बक्कड़ जैसे पॉडकास्टों व साहित्य और तकनीक के सम्मिश्रण के लिए जारी अनेकानेक कोशिशों से गुजरते हुए आशा बनती है कि पुराने मिजाज का हिंदी साहित्य भी देर-सबेर साहित्य के नए रास्तों को स्वीकार करेगा।

Read More

कंचनजंघा (1962): द्वन्द्व के बादलों में घिरा मन का शिखर

मानव मन और आधुनिक उहापोह के बीच बह रही दलदली धारा को साफ करती यह फिल्म मेरी दृष्टि में बेहद खास है। अपने व्यक्तित्व के ऊपर तथाकथित व्यवहारिकता को चुनना हमारे शहरी जीवन में आम बात है। किरदारों का प्रकृति की खामोश विशेषता से मंत्रमुग्ध हो जाना और अपने हृदय के तट को छू लेना मुझे बेहद खूबसूरत लगा।

Read More

सब संस्कृतियां मेरे सरगम में विभोर हैं…

शमशेर में जहां नित-नूतनता है वहीं निरन्तर बढ़ाव या उठान भी। नित-नित परिष्कृत होती उनकी शैली अपने वैशिष्ट्य के चलते एक जीवित मिथक गढ़ती है। शमशेर स्थूल के आग्रही किन्हीं विशेष परिस्थितियों में अपवादवश भले रहे हों, मूलतः सूक्ष्म संवेगों की छटी हुई अनुभूतियों का खाका उनकी कविताओं में विद्यमान है।

Read More

पत्रकारिता @2021: निरंकुश सत्ताओं के बर्बर उत्पीड़न के बीच अदम्य साहस की गाथाएं

सीपीजे ने 1 दिसंबर 2021 तक ऐसी 19 हत्‍याओं को दर्ज किया है जिसमें पत्रकारों को उनके काम के बदले में मारा गया। इसमें शीर्ष स्‍थान भारत का रहा जहां चार पत्रकार अपने काम के चलते मारे गए। एक और की मौत एक प्रदर्शन कवर करने के दौरान हुई। कुल छह हत्‍याएं भारत में दर्ज की गयीं जिसके बाद पत्रकारिता के लिए चार सबसे खराब देशों में भारत का नाम भी शामिल हो गया।

Read More