कोरोना, दिव्यांग और यूनिवर्सल डिज़ाइन का संकट

कोरोना त्रासदी हमें याद दिलाती हैं कि कई लोगों का जीवन हमारे मुकाबले कितना मुश्किल है और एक इंसान के रूप में हमारे क्या कर्तव्य हैं

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भारत और नेपाल की जनता के सुमधुर सम्बंध को बिगाड़ने में किसका हित है?

भारत और नेपाल की सीमा के निर्धारण का निर्णायक आधिकारिक दस्तावेज़ सुगौली सन्धि है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह जमीन नेपाल से ताल्लुकात रखती है

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परंपरागत शिक्षा पद्धति के लिए तकनीक से दोस्ती उसके अस्तित्व का सवाल बन चुकी है

परिवर्तन यदि समाज के लाभ के लिए हो रहा है तो उसे न स्वीकारना, समाज के विकास में बाधक बनना है

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रेडियो रवांडा जैसी भूमिका निभा रहा है भारतीय मीडिया, नतीजे ख़तरनाक हो सकते हैं

गृह मंत्रालय आखिर किस बात का इंतज़ार करता रहा जबकि उसको मालूम था कि हमारे यहां विदेशी नागरिक फंसे हुए हैं।

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मजदूर संकट के इस ऐतिहासिक दौर में केंद्रीय श्रम मंत्री की गुमनामी का सबब क्या है?

हैरानी इस बात की है कि वे ख़बरों से ग़ायब क्यों हैं. वह भी उस वक़्त में जब देशभर में करोड़ो श्रमिक कोरोना से ज़्यादा भूख से तड़प रहे हैं

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द्रोण मानसिकता या अग्रणी शिक्षा संस्थानों में ऑपरेशन एकलव्य?

आखिर और कितने मासूमों की बली चढ़ेगी ताकि यह जाना जा सके कि मुल्क के अग्रणी शिक्षा संस्थानों में जातिगत एवं समुदाय आधारित भेदभाव बदस्तूर जारी है

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एक महामारी और तीन तहों में बंटी ज़िंदगी की अपनी-अपनी बीमारी

जितने भी सुविधा के साधन हमने ईजाद किए हैं इस दौरान वे सभी फेल हो गए हैं। पैसे से लेकर मशीनरी तक।

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