नालंदा से कोलकाता वाया जर्मनी: किताबों से डरने वाली राजनीति जारी है

पुस्तकें किसी एक विचारधारा की प्रतिनिधि नहीं होतीं। उनमें सत्ता के पक्ष में लिखे गए ग्रंथ भी होते हैं और सत्ता की आलोचना करने वाले दस्तावेज भी; धार्मिक दर्शन भी होता है और नास्तिक चिंतन भी; राष्ट्र के गौरव का आख्यान भी होता है और उसके इतिहास की असुविधाजनक पड़ताल भी। पुस्तक का मूल स्वभाव ही यह है कि वह एक से अधिक दृष्टियों के लिए जगह बनाती है। इसीलिए स्वतंत्र विचार से भयभीत राजनीति को उन पुस्तकों से विशेष परेशानी होती है जो उसके बनाए नैरेटिव के बाहर खड़ी होकर सवाल करती हैं।

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पुलिस और नागरिक : सत्ता बनाम स्वतंत्रता का द्वंद्व

जब पुलिस नागरिक को नियंत्रित करने को अपना प्राथमिक दायित्व समझती है और नागरिक पुलिस को अपने अधिकारों के लिए बाधा मानने लगता है, तब दोनों के बीच कानून का संबंध कमजोर होकर शक्ति का संबंध बन जाता है। पुलिस कहती है – हमारे पास शक्ति है। नागरिक कहता है- मेरे पास अधिकार है। लोकतंत्र का प्रश्न है- अंततः किसकी चलेगी? इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए-कानून की।

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नया चुनाव, पुराना नशा: कितनी कारगर होगी भाजपा की ‘नशामुक्त पंजाब यात्रा’?

18–30 सितंबर 2026 तक चलने वाली भाजपा की यात्रा की कुल दूरी लगभग चार हजार किलोमीटर है जो सभी 117 विधानसभा सीटों से होकर गुजरेगी। चार समानांतर यात्राएं पठानकोट, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का और तलवंडी साबो से शुरू हुई हैं। समापन जालंधर में होगा जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संबोधन की योजना बताई गई है।  

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पंजाब: बहुकोणीय मुकाबले में अपना संगठन ही कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती?

सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी मिलने के बाद कांग्रेस की संगठनात्मक दिशा को लेकर उत्सुकता तो बढ़ी है, लेकिन उसका कोई स्पष्ट राजनीतिक संदेश अभी तक व्यापक स्तर पर धरातल पर उतरता दिखाई नहीं देता। हाईकमान के निर्णय को पार्टी के विभिन्न गुटों ने अपेक्षाकृत सकारात्मक ढंग से स्वीकार किया है।

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महिला उत्पीड़न: इतिहास, वर्ग और उत्पादन संबंधों की रोशनी में

बिहार में एक लड़की और उसके पुरुष मित्र के साथ हुई यौनिक हिंसा तथा दिल्ली के आस्‍था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना, दोनों मामले उस सामाजिक वास्तविकता की ओर संकेत करते हैं जिसमें लड़कियों की आवाजाही, दोस्ती और यौनिकता पर निगरानी को सामान्य बनाया जाता है।

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छात्रसंघ चुनाव 2026 : क्या GenZ का जनादेश बदल पाएगा DU की सियासत?

सत्ता की हर एक धुरी पर आज भाजपा का कब्जा है। ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय का आम छात्र इस चुनाव के माध्यम से इस पूरे तंत्र से तीखे सवाल पूछ रहा है, उसकी पूरी जवाबदेही तय करवाना चाहता है और यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि इन तमाम ज्वलंत मुद्दों के बीच आखिरकार छात्र अपना अंतिम भरोसा किस पर जताते हैं।

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पंजाब: एक सजायाफ्ता मुजरिम के भरोसे हो रहे चुनाव में डेरे का रुझान किधर?

राजनीतिक तौर पर डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत सिंह राम रहीम की परोल के कई मायने हो सकते हैं। कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने अभी से पंजाब में कांग्रेस की कोई लहर बनने की संभावनाओं को हाशिये पर डाल दिया है। डेरा का झुकाव कांग्रेस के तरफ होना मुमकिन नहीं लगता । शिरोमणि अकाली दल (बादल) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कोई समर्थन अब अपनी साख के सवाल पर गुरमीत सिंह से ले नहीं पाएगा। भाजपा अकेले पंजाब में इतनी सीट जीतने की स्थिति में फ़िलहाल दिखाई दे नहीं रही है कि वो सरकार बना सके। आम आदमी पार्टी के प्रति असंतोष इस क्षेत्र में बहुत बढ़ा हुआ है।

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हरियाणा: उपभोक्ता आयोग बनाम सरकार का विवाद पहुंचा सर्वोच्च न्यायालय

हरियाणा में यह विवाद आयोग की प्रशासनिक स्वायत्तता बनाम राज्य सरकार के हस्तक्षेप को लेकर है। न्यायमूर्ति टी.पी.एस. मान का कहना है कि सरकार उनके वैधानिक अधिकारों में दखल दे रही है, जबकि इस मामले की वैधता पर अंतिम निर्णय उच्च न्यायालय द्वारा किया जाना बाकी है। पूर्व न्यायाधीश  (सेवानिवृत्त) टी.पी.एस. मान और हरियाणा सरकार के बीच विवाद का मुख्य कारण हरियाणा राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के प्रशासनिक अधिकारों को लेकर है।

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आप जंतर-मंतर जाएं या नहीं, पर दो गलत सवाल की जगह एक सही सवाल पूछें!

सोनम वांगचुक और युवा साथियों का सत्याग्रह केवल एक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का सवाल नहीं है। यह शिक्षा, बेरोजगारी, लोकतंत्र और जवाबदेही के गहरे संकट का आईना है। ऐसे समय में असली सवाल यह नहीं कि कौन जंतर-मंतर पहुँचा, बल्कि यह है कि सरकार अब तक चुप क्यों है।

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मध्य प्रदेश: वनाधिकार कानून में महिलाओं के साथ जारी ‘ऐतिहासिक अन्याय’ का प्रश्न

यदि भूमि पर वास्तविक नियंत्रण पुरुषों के हाथ में है, यदि महिलाएँ निर्णय प्रक्रिया से बाहर हैं, यदि सामुदायिक अधिकारों में उनकी भूमिका सीमित है—तो यह कहना कठिन होगा कि ऐतिहासिक अन्याय पूरी तरह समाप्त हो गया है। बल्कि कई बार ऐसा लगता है कि वह नए प्रशासनिक और सामाजिक रूपों में जारी है।

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