शहर में किसान यानी मिडिल क्लास की नापसंदगी का मौसम

टीवी इनके पसंदीदा हीरो को दिखाता है। कभी टीवी में दाढ़ी अच्छी लगती है तो कभी कपड़ा! बस रोड पर बैठे छात्र, किसान अच्छे नहीं लगते क्योंकि वही लोग तो इनको ऑफिस जाने में, अस्पताल जाने में, मॉल घूमने जाने में तंग करते हैं।

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‘अर्जित’ विचारहीनता और संवेदनहीनता का उत्सव मनाते मध्यवर्ग से आंदोलन कोई उम्मीद क्यों पालें?

वैचारिक दरिद्रता इन्हें विरासत में नहीं मिली है बल्कि इन्होंने इसे बाकायदा ‘अर्जित’ किया है। तभी, जो इनके पिताओं और दादाओं के लिए रोल मॉडल थे वे इनके लिए इतिहास के खलनायक हैं जिन्होंने ‘’70 साल में देश का बंटाधार कर दिया है”।

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बॉर्डर पर किसान आंदोलन और मिडिल क्लास का ‘बॉर्डर’!

ऐसा लगता है मिडिल क्लास ने अपने और आंदोलनों के बीच एक बार्डर बना रखा है- यह जानते हुए भी कि ये आंदोलन जनता के अधिकारों और देश के संवैधानिक मूल्यों को बचाने के लिए देश के मजदूरों और किसानों द्वारा चलाये जा रहे हैं– वो अपने ही द्वारा बनाए हुए बार्डर को लांघना नहीं चाहता।

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बात बोलेगी: लोकतंत्र के ह्रास में बसी है जिनकी आस…

एक बड़ा वर्ग ऐसे ही तैयार हुआ है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था के जो सह-उत्पाद यानी बाय-प्रोडक्ट हैं वे उसी के उपभोक्ता के तौर पर तैयार किये गये हैं

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राग दरबारी: विकास दूबे की कथा में भारतीय सवर्ण मध्यवर्ग के वर्चस्व और पतन का अक्स

दूबे ने सबसे ज्यादा ब्राह्मणों की हत्या की है, लेकिन बहुसंख्य ब्राह्मण समाज को विकास दूबे से कोई परेशानी नहीं हो रही होगी, बल्कि उसमें समाज के मसीहा का अक्स देख रहा होगा!

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पहना मास्क, उतरा नक़ाबः मध्यवर्ग के तीन किस्से और चौथा मजदूर

देखता हूं कि आप गमछा चैलेंज दे रहे हैं। साड़ी चैलेंज दे रहे हैं। क्या कहते हैं वो हैशटैग! 20 साल वाला। फोटो से फेसबुक की दीवार रंग देते हैं। कोई सोहर गाता है, कोई ग़ज़ल आज़माइश कर रहा है। कुत्ता-बिलार कुछ न छूटे, सबके साथ किसिम किसिम का पोज़ मारते हैं।

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