प्रशांत किशोर के बॉक्स ऑफिस फॉर्मूले बनाम लोकतंत्र में स्वस्थ-सशक्त विपक्ष का प्रश्न

प्रशांत किशोर का रणनीतिक जादू मार्केटिंग और इवेंट मैनेजमेंट के उन घातक प्रयोगों में छिपा है जो ग्राहक को किसी अनावश्यक, कमतर और औसत प्रोडक्ट को बेहतर मानकर चुनने के लिए मानसिक रूप से तैयार करते हैं। हमने नरेन्द्र मोदी को गुजरात के विवादित मुख्यमंत्री से सर्वशक्तिमान, सर्वगुणसम्पन्न, महाबली मोदी में कायांतरित होते देखा है।

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‘वल्गर’ समाजवाद व आइडेंटिटी पॉलिटिक्स की वैचारिकी की भूलभुलैया और कांग्रेस का भविष्य

सवाल है कि उत्तर प्रदेश में इस चुनाव में कांग्रेस क्या हासिल करना चाहती थी और कैसे हासिल करना चाहती थी। प्रियंका और कांग्रेस इस ‘क्या’ के बिंदु पर क्लियर थी कि उसे उत्तर प्रदेश में निष्क्रिय पड़ी पार्टी को पुनर्जीवित करना है। ‘कैसे’ के बिंदु पर कांग्रेस के पास कोई बुनियादी कार्यक्रम नही था। संगठन मजबूत करना है, यह तो पता था पर कैसे करना है इसको लेकर समझ का अभाव था।

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गोवा: चौपट धंधा, सूने पड़े बीच और ओमिक्रॉन के साये में चुनावी पर्यटकों के सियासी करतब

खूबसूरत समुद्री किनारोंवाला गोवा सभी को लुभाता है लेकिन कोरोना की कसक के बीच खराब आर्थिक हालात से लोग हैरान हैं। धंधा चौपट है, फिर भी चुनाव तो होना ही है, सो दुष्कर हालात में भी गोवा अपनी राजनीति के नये प्रतिमान गढ़ने की तरफ बढ़ रहा है।

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उत्तर प्रदेश में विपक्ष क्या संगठित होकर चुनाव को चेहरे से हटा कर मुद्दों पर खड़ा कर पाएगा?

अगला चुनाव बहुत कड़ी प्रतिस्पर्धा होगा जिसमें जीत कम सीटों के फासले से होगी, हालांकि भाजपा की जीत की संभावना प्रबल है लेकिन बिना अथक प्रयास किये यह भी आसान नहीं है।

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पत्रकार की संदिग्ध मौत का PCI और EGI ने लिया संज्ञान, यूनियनें रोष में, विपक्ष सक्रिय, CBI जांच की मांग

एडिटर्स गिल्‍ड ने पुलिस की इस थ्‍योरी पर सवाल उठाया है कि श्रीवास्‍तव की मोटरसायकिल हैंडपम्‍प में टकराने से हुए हादसे में उनकी मौत हुई। इससे कहीं ज्‍यादा चौंकाने वाली बात ये है कि पत्रकार ने अपनी मौत से पहले पुलिस को पत्र लिखकर अपनी जान को शराब माफिया से खतरा बताया था और अंदेशा जताया था कि उनका पीछा किया जा रहा है।

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क्या UP में कोविड मौतों की वास्तविक संख्या छुपायी गयी? कांग्रेस ने जारी किये चौंकाने वाले आँकड़े!

विशेषज्ञों का मानना है कि पहली लहर के दौरान आंकड़ों को सार्वजनिक न करना दूसरी लहर में इतनी भयावह स्थिति पैदा होने का एक बड़ा कारण था। जागरूकता का साधन बनाने की बजाय सरकार ने आँकड़ों को बाज़ीगरी का माध्यम बना डाला।

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UP: जातिगत गोलबंदियों में बंटे पूर्वाञ्चल के मतदाता के पास भाजपा के अलावा क्या कोई विकल्प है?

पूर्वांचल में अतिपिछड़ी और अति दलित जातियों में लोगों के पास कोई खास कृषि योग्य भूमि नहीं है. इसलिए पूर्वांचल की इन बहुसंख्य जातियों के बीच किसान आन्दोलन का यह सवाल ‘जमींदारों का सरकार से संघर्ष’ बनकर बहुत छोटे स्तर पर कैद हो गया है.

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20 दिन, 443 किलोमीटर: UP में निषादों की नदी अधिकार पदयात्रा जारी है

23 फरवरी को महासचिव प्रियंका गांधी ने बंसवार से पीड़ितों से मिलकर जाने के बाद पीड़ित परिवारों को 10 लाख रुपये की संयुक्त मदद की घोषणा की, साथ ही साथ निषाद समाज के परंपरागत अधिकारों की मांग की। कुछ दिनों बाद प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने 18 पीड़ित परिवारों को आर्थिक मदद करने बंसवार पहुंचे।

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कौशिक बसु के साथ राहुल गांधी की बातचीत में जो अनकहा रह गया, उसे भी समझें

पैंतालीस साल पहले के आपातकाल और आज की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक और बात को लेकर फ़र्क़ किए जाने की ज़रूरत है। वह यह कि इंदिरा गांधी ने स्वयं को सत्ता में बनाए रखने के लिए सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष और जेपी समर्थकों को जेलों में डाल दिया था पर आम नागरिक मोटे तौर पर बचे रहे। शायद यह कारण भी रहा हो कि जनता पार्टी सरकार का प्रयोग विफल होने के बाद जब 1980 में फिर से चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी और भी बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापस आ गईं। इस समय स्थिति उलट है।

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टूटी हुई नैया से अबकी किसको चुनावी नदी पार करवाएंगे यूपी के निषाद?

उत्तर प्रदेश में उनकी जनंसख्या लगभग आठ प्रतिशत बतायी जाती है, हालाँकि जब तक जातीय जनगणना न हो इसे अनुमान ही कहा जा सकता है। फिर भी चुनाव जीतने और हारने के लिए यह संख्या काफी है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की नज़र भी इस वोट बैंक पर है। बँसवार की घटना में कांग्रेस की दिलचस्पी को इस आधार पर देखा जा सकता है।

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