तन मन जन: महामारी से भी बड़ी बीमारी है लॉकडाउन से उपजी गरीबी

कोरोनाकाल में सामूहिक तौर पर भारत के आम लोगों की स्थिति इसी मरणासन्न मरीज की तरह हो गई है जिसे अपनी जिन्दगी भी बचानी है। सवाल अस्तित्व का है। संकट विकट है।

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शोपीस बन गए उज्‍ज्‍वला के सिलिंडर, लॉकडाउन में 31 लाख महिलाओं को नहीं मिला पैसा

सरकार कह रही है कि इनमें से 31 लाख महिलाओं को खाते में समस्या के कारण सरकारी मदद नहीं मिल सकी. सवाल ये है कि खाते ​की दिक्कत कोरोना काल में ही सामने कैसे आयी? क्योंकि इसके पहले उनके खातों में सब्सिडी की राशि तो पहुंचायी गयी थी.

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देश की जनता को नाचने वाला मोर बना दिया गया है…

उनको नहीं पता कि चीनी सेना ने लेह में जमीन पर कब्ज़ा किया है. उनको सर्जिकल स्ट्राइक याद है. उनको दिखाया जा रहा है कि एक दाढ़ी वाला संत किस तरह से मोरनी को दाना खिलाता है और मोर उस ख़ुशी में उसके सामने पंख उठाकर नाचने लगता है.

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बात बोलेगी: महापलायन की ‘चांदसी’ तक़रीरों के बीच फिर से खाली होते गाँव

लॉकडाउन की लंबी अवधि को पार करते हुए, अनलॉक की भी एक लंबी अवधि पूरी करने के बाद, आज सच्चाई ये है कि गाँव लौटे 100 में से 95 लोग शहरों और महानगरों की ओर लौट चुके हैं। उन्हें कोई मलाल नहीं है कि शहरों और महानगरों ने कैसी बेरुखी दिखलायी।

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फेक न्यूज़: जिसे लोगों ने सच समझ लिया और आग लग गयी…

हाल ही में यूएई सरकार ने कोरोना को लेकर फेक न्यूज़ फैलाने वाले लोगों पर शिकंजा कसते हुए आदेश दिया कि अगर कोई ऐसी भड़काऊ खबर फैलाता है, तो उसको 4 लाख का जुर्माना भरना होगा। वहीं कई अन्य देशों में जुर्माने के साथ कुछ साल की सजा भी निर्धारित की गयी है।

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सिक्किम: लॉकडाउन ने दो-तिहाई परिवारों की मासिक आय को आधे से भी कम कर दिया

हमारे नमूने में प्रति व्यक्ति 24 हजार रुपये से अधिक की मासिक आय वाले केवल दो परिवार हैं, लेकिन 40 फीसदी से ज्यादा (150 में से 62) उत्तरदाताओं ने बताया है कि घोषणा के दो महीने बाद भी लॉकडाउन के दौरान उन्हें मुफ्त राशन नहीं मिला है। केवल 7 उत्तरदाताओं ने बताया है कि उन्हें अपने जन-धन खाते में धन प्राप्त हुआ है।

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ओडिशा के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र कटक में लोग शहरी रोजगार गारंटी की मांग क्यों कर रहे हैं?

विभिन्न आय वर्गों के लिए लॉकडाउन से पहले मासिक प्रतिव्यक्ति आय और लॉकडाउन के दौरान मासिक प्रतिव्यक्ति आय के अनुपात को यदि हम देखें, तो हम पाते हैं कि यह अनुपात शीर्ष 20 फीसदी परिवारों के लिए महज 35 फीसदी है जबकि सबसे नीचे के 20 फीसदी परिवारों के लिए यह 85 फेससदी तक जाता है

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मजदूर ही देश की धुरी बनेंगे और नया रास्ता दिखाएंगे

सरकार की ओर से आने वाले समय में लोगों के रोज़गार, स्वास्थ्य, शिक्षा को लेकर कोई स्पष्टता दिखायी नहीं दे रही है

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