स्मृतिशेष: कवि का कमरा, कवि की दुनिया

तमाम शोरगुल, आत्म-प्रशंसा और प्रचार से दूर रह कर विष्णुजी आजीवन चुपचाप अपने लेखन और सृजन कर्म में लगे रहे। जैसे मुक्तिबोध के जीवनकाल में उनका मूल्यांकन नहीं किया मठाधीशों ने और उनके जाने के बाद उन्हें खूब खोज कर पढ़ा गया, उसी तरह।

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स्मृतिशेष: मुन्ना मारवाड़ी चले गए, काशी अब ‘बाकी’ नहीं है

यह विस्‍थापन सामान्‍य नहीं था। मुन्‍ना मारवाड़ी का पूरा अस्तित्‍व ही विस्‍थापित हो चुका था। मुन्‍नाजी को अब अदालत से भी कोई उम्‍मीद नहीं रह गयी थी। वे बस बोल रहे थे, बिना कुछ खास महसूस किए। मैं उनकी आंखों में देख रहा था, बिना कुछ खास सुने।

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