बिखर गया संतोषी का परिवार, पांच साल पीछे चली गई लीलावती! लॉकडाउन की बरसी पर…

यह ऐसा समय था कि गांव के लोग किसी की भी मदद नहीं करते थे जबकि करोना से पहले गाँव में ऐसा नहीं होता था। लोग एक दूसरे की मदद बडे़ ही सरलता से करते थे, लेकिन यह करोना तो हम मजदूरों की स्थिति को एक दम से झकझोर दिया। हम गरीब मजदूर इस करोना की मार खाकर कम से कम पाँच साल पीछे हो गये।

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तन मन जन: लोगों को दुनिया भर में अंधा बना रही है गरीबी

यूनाइटेड नेशन्स यूनिवर्सिटी वर्ल्‍ड इन्स्टीच्यूट की रिपोर्ट बताती है कि कोविड-19 महामारी की वजह से वैश्विक स्तर पर रोजाना गरीबों की कमाई में 50 करोड़ डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ। यदि दैनिक न्यूनतम आय को 1.90 डॉलर का आधार मानें और उसमें 20 फीसद की भी गिरावट आए तो दुनिया में 39.5 करोड़ गरीब और बढ़ जाएंगे।

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गरीबों को गरीबी की जवाबदेही से मुक्त कर के विमर्शकार क्या अपना अपराधबोध कम करते हैं?

अगर हम बनर्जी महोदय की बातें मान लेते हैं, तो हमें मानना होगा कि गरीबों का स्वभाव ही गरीबी के लिए जिम्मेदार है। तो क्या गरीबी एक चारित्रिक दुर्गुण है? यह एक नया विचार है जिस पर सब लोग सहमत नहीं हो सकते!

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कम मजदूरी और स्वास्थ्य जोखिमों के बीच झूलते बीड़ी श्रमिक

बीड़ी बनाने का काम आमतौर पर पिछड़े क्षेत्रों के गरीब परिवार करते हैं. यानि जहां स्थाई रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसे मामले में लगभग हर राज्य के पिछड़े जिले शामिल हैं. बीड़ी बनाने का काम करने वालों में महिलाओं की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है. सही मायनों में कहें तो इस उद्योग की नींव ही महिला मजदूर हैं.

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तन मन जन: महामारी से भी बड़ी बीमारी है लॉकडाउन से उपजी गरीबी

कोरोनाकाल में सामूहिक तौर पर भारत के आम लोगों की स्थिति इसी मरणासन्न मरीज की तरह हो गई है जिसे अपनी जिन्दगी भी बचानी है। सवाल अस्तित्व का है। संकट विकट है।

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तन मन जन: साल दर साल विकास लक्ष्यों का शतरंजी खेल और खोखले वादे

विश्व स्वास्थ्य संगठन का वादा था- सन् 2000 तक सबको स्वास्थ्य, लेकिन स्थिति नहीं बदली। फिर सहस्राब्दि (मिलेनियम) विकास लक्ष्य 2015 तय हुआ। वह भी हवा-हवाई हो गया। अब टिकाऊ (सस्टेनेबल) विकास लक्ष्य 2030 तय हुआ है। समझा जा सकता है कि “जब रात है ऐसी मतवाली फिर सुबह का आलम क्या होगा”।

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