न्याय की अवधारणा, मानवाधिकार और विलंबित न्याय: संदर्भ BK-16

अदालती फैसलों में पांच-छह साल लगना तो सामान्य-सी बात है, पर यदि बीस-तीस साल में भी निपटारा न हो तो आम लोगों के लिए यह किसी नारकीय त्रासदी से कम नहीं है। वैसे तो न्याय का मौलिक सिद्धांत यह है कि ‘न्याय में विलंब होने का मतलब न्याय को नकारना है’।

Read More

महामारी के बीच सम्पन्न हुए चुनाव, लेकिन चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका पर बात बाकी है!

जिस तरह से मद्रास हाईकोर्ट द्वारा चुनाव आयोग पर की गई तल्ख टिप्पणियों को मीडिया में स्थान मिला है और जनता के एक बड़े वर्ग द्वारा इनका स्वागत किया गया है इससे यह स्पष्ट होता है कि आम जनमानस भी कोविड-19 की दूसरी लहर के प्रसार के लिए चुनाव आयोग के अनुत्तरदायित्वपूर्ण आचरण को उत्तरदायी समझता है।

Read More

क्या न्यायपालिका का काम कार्यपालिका और विधायिका के फैसलों को संरक्षण देना है?

अगर सरकार की मंशा आंदोलन को समाप्त करने अथवा मामले को लंबा खींचकर किसान नेताओं के धैर्य की परीक्षा लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट का उपयोग करने की थी तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की यह मंशा पूरी की है और स्वयं को उपयोग होने दिया है।

Read More

बात बोलेगी: हर शाख पे उल्लू बैठे हैं लेकिन बर्बाद गुलिस्ताँ का सबब तो कोई और हैं…

ये खोज जब तक पूरी नहीं होगी तब तक बेचारे शाख पर बैठे उल्लुओं को ही ‘हर हुए और किए’ का दोषी माना जाएगा। बड़ी चुनौती- शुरू कहाँ से करें? घर से? पड़ोस से? गाँव से? समाज से? प्रांत से या देश से? क्योंकि गुलिस्ताँ का मतलब अब भी काफी व्यापक था।

Read More

सरकार के लिहाज का नया न्‍यायिक शिष्‍टाचार

किसी को तेल लगाना या खुश करना एक जज का काम नहीं है। लिहाज अपने मूल में मौन सम्‍मति की द्योतक है जहां कोई संवैधानिक कुतुबनुमा नदारद होता है। सोचिए, इस लिहाज के पीछे शर्तें क्‍या-क्‍या हो सकती हैं?

Read More

अदालत का फैसला अगर ‘न्याय’ से चूक जाए, तो आदमी क्या करे? कहां जाए?

जिस तरह भारतीय किसान की उम्मीद मानसून पर होती है हर साल, ठीक उसी तरह एक आम नागरिक की उम्मीद अदालत और देश की न्याय व्यवस्था से होती है। मानसून पर इन्सान का वश नहीं है, किन्तु अदालतें इन्सान यानी न्यायाधीशों के सहारे चलती हैं।

Read More

बात बोलेगी: भारतेन्दु की बकरी से बाबरी की मौत तक गहराता न्याय-प्रक्रिया का अंधेरा

‘गिल्ट बाइ एसोसिएशन’ जैसे आज के दौर की एक मुख्य बात हो गयी है। दिल्ली में हुई हिंसा हो या भीमा कोरेगांव की हिंसा, दोनों में न्याय प्रक्रिया उसी प्रविधि का इस्तेमाल कर रही है जो उस राज्य में प्रचलित थी, जिसकी कहानी हमें भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने सुनायी थी।

Read More

राग दरबारी: कितनी छोटी होगी लोकतंत्र में अवमानना की लकीर?

जब राजसत्ता के इशारे पर सारे निर्णय लिए जा रहे हैं तो लिखित कानून और उसे पालन करने वाले संस्थानों की क्या भूमिका रह जाएगी? हमारे संवैधानिक अधिकारों की गारंटी कौन करेगा जो हमें भारतीय कानून के तहत एक नागरिक के तौर पर मिले हुए हैं? उस नागरिक स्वतंत्रता का क्या होगा जिसकी दुहाई बार-बार दी जाती है?

Read More

भारत में आपराधिक अवमानना की प्रासंगिकता: संदर्भ प्रशांत भूषण

आपराधिक अवमानना पर एक कानून की आवश्‍यकता की समीक्षा करने से आगे बढ़कर अवमानना के पैमाने का भी मूल्‍यांकन किये जाने की ज़रूरत है। यदि ऐसा कोई पैमाना वास्‍तव में होना ही चाहिए, तो वो यह हो कि क्‍या सवालिया टिप्‍पणी कोर्ट को उसका काम करने से रोके दे रही है। इसके अतिरिक्‍त, संस्‍थान की कैसी भी आलोचना को रोकने का साधन इसे नहीं बनने देना चाहिए।

Read More