बहुत पहले से तैयार हो रही थी मजदूरों के हित वाले ‘कानून के जंगल’ काटने की ज़मीन!

अपनी संवेदनहीनता के चरम पर जाते हुए कई राज्य सरकारों ने श्रम कानूनों को खत्म करने के अवसर के रूप में इस संकट का इस्तेमाल किया है

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लॉकडाउन गवाही दे रहा है कि व्यवस्था चलाने वाले मजदूरों की जान कितनी सस्ती है

नाकारा सरकार और अमानवीय प्रशासनिक अमले के लिए मजदूर अब भी सिर्फ एक संख्या ही रहेंगे। इसके बाद भी वह उनके लिए कुछ करने वाले नहीं हैं।

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सीमाएँ खोलना, कुछ रेलगाड़ियाँ शुरू करना भी अपर्याप्त और अर्धसफल!

राज्यों के बीच की सीमाएँ खुलने के बावजूद कई श्रमिक, हर दिन सैकड़ों की तादाद में पैदल ही सीमा पार कर रहे हैं।

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महाबंदी, महामारी, मज़दूर और मुग़ालते

ट्रोजन हॉर्स बनाये कौन? बन भी जाये तो हर खेमे में पलटू राम जैसे कई नेता हैं। फिर ये सारा खर्च उठाये कौन? वो भी तब, जब सारे धन का आभूषण पहने हाथी बैठा इठला रहा है।

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दुनिया के मजदूर थके हैं, पस्त हैं, अपनी मुक्ति के बारे में वे नहीं सोच पाएंगे!

मज़दूरों से क्रांति या विरोध की उम्मीद करना. ऐसा कभी इतिहास में नहीं हुआ है. उसके लिए या तो क्रांतिकारी मज़दूर की विशेष पृष्ठभूमि होनी चाहिए या फिर उसे अन्य वर्ग से नेतृत्व मिले.

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कोरोना और पूंजीवाद के दौर में काम और कामगार

भारत में पहली बार मजदूर दिवस पहली मई, 1923 को ‘मद्रास’ में ‘मलयपुरम सिंगरावेलु चेट्टियार’ के नेतृत्व में मनाया गया। एम. सिंगारवेलु ने उसी दिन मजदूर संघ के रूप में ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान’ की स्थापना की। इस दिन भारत में पहली बार ‘लाल झंडा’ भी इस्तेमाल किया गया।

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लॉकडाउन की मार झेल रहे गरीब मजदूरों-छात्रों के समर्थन में भूख हड़ताल

भूख हड़ताल में कुल 90 साथियों ने भागीदारी की। इसमें 44 पछास के छात्र साथी, 20 इंकलाबी मजदूर केंद्र के साथी, 18 प्रगतिशील महिला एकता केंद्र के साथी, 5 क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के साथी और 3 अन्य साथी शामिल हैं।

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राहत कार्य में लगे पत्रकारों पर सर्विलांस, वर्कर्स यूनिटी ने भेजी दिल्ली के CM को शिकायत

वर्कर्स यूनिटी हेल्पलाइन अपना काम जारी रखे हुए है और सरकार के किसी भी दमनात्मक कार्यवाही का क़ानून जवाब दिया जाएगा।

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पहना मास्क, उतरा नक़ाबः मध्यवर्ग के तीन किस्से और चौथा मजदूर

देखता हूं कि आप गमछा चैलेंज दे रहे हैं। साड़ी चैलेंज दे रहे हैं। क्या कहते हैं वो हैशटैग! 20 साल वाला। फोटो से फेसबुक की दीवार रंग देते हैं। कोई सोहर गाता है, कोई ग़ज़ल आज़माइश कर रहा है। कुत्ता-बिलार कुछ न छूटे, सबके साथ किसिम किसिम का पोज़ मारते हैं।

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