ऑक्सीटॉसिन की अतृप्त प्यास और उफनते राष्ट्रवाद का वैश्विक जज़्बात

दुनिया भर के नेता अपनी जनता को विश्वास दिलाने में लगे हैं कि वे दुश्मन की सारी जमीन जीत लाएंगे और अपनी एक इंच जमीन भी नहीं देंगे। जनता जानती है कि जब युद्ध होते हैं, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, सड़क, पानी के लिए जो पैसा लगना चाहिए था वह युद्ध में खर्च होता है, मगर जनता दिल के हाथों मजबूर है।

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आदर्शों का लोप: राष्‍ट्रीय आंदोलन के दौरान भारत के भविष्‍य की परिकल्‍पना: संदर्भ नेहरू और गांधी

एक औद्योगीकृत देश के रूप में भारत के संवैधानिक उभार व विकास की अंग्रणी राष्‍ट्रवादियों द्वारा सराहना को गांधीजी पूर्णत: खारिज करते थे। उनका उद्घोष था कि ”बिना अंग्रेज़ों के अंग्रेज़ी शासन” की कोई जगह ही नहीं थी।

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