तिर्यक आसन: धर्म और राष्ट्रहित के उचक्के

आवारा भीड़ को कहीं पाकिस्तान का नमक तो नहीं खिलाया जा रहा? बिरयानी बिना नमक के खाई थी? जनता ने पाँच किलो राशन के पैकेट में मिले नमक का कर्ज चुकाया। क्या पाकिस्तान के नमक का कर्ज भी चुकाना होगा?

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क्रिकेट की बदलती रीत या कॉर्पोरेट की पिच पर राष्ट्रवाद की जीत?

पाकिस्तान की जीत पर भारत में पहले भी पटाखे फूटते रहे हैं और जब हम पाते हैं कि दो राष्ट्र का बंटवारा होने के बावजूद एक दूसरे की रिश्तेदारी आज भी दोनों देशों में है और धर्म के नाम पर राजनीति करना, उनको बरगलाना और अपनी सियासी रोटियां सेंकना- यह सब आजादी के बाद से ही लगातार होता आया है तो हमें कोई आश्चर्य नहीं लगता।

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बात बोलेगी: खतरे में पड़ा देश, खतरों के खिलाड़ी और बचे हुए हम!

देश निरंतर खतरे की तरफ तेज़ कदमों से बढ़ा जा रहा है। लगता है देश जो है वो सुसाइडल यानी आत्महंता हो चुका है जो किसी भी तरह मरने पर आमादा है। जैसे कुएं के पाट पर खड़ा हो- अब कूदा कि तब कूदा। और तैरना उसे आता नहीं है, जिसका ज्ञान उसे छोड़कर बाकी सबको है। इसलिए सब उसे कूदने से रोक रहे हैं। डर लग रहा है देखकर कि कहीं कुछ लापरवाही न हो जाए। हाथों से छिटककर देश कहीं सचमुच कुएं में समाधि न लगा ले।

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एक उदार समाजवादी विचारधारा ही भाजपा की काट हो सकती है: अखिलेश यादव

प्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव समाजवाद की उदार विचारधारा और अपने पिछले कार्यकाल के ठोस कामों में भरोसा जताते हैं। उनका मानना है कि इस बार का चुनाव 2017 की तरह फर्जी नहीं, असली मुद्दे पर होगा। लखनऊ में तमाम मुद्दों पर उनके साथ वरिष्‍ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी की हुई लंबी बातचीत के महत्‍वपूर्ण अंश।

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उनकी तुरबत पर नहीं है एक भी दीया, जिनके खूँ से जलते हैं ये चिरागे वतन…

सम्भवतः देश को स्वतंत्रता यदि सशस्त्र क्रांति के द्वारा मिली होती तो भारत का विभाजन नहीं हुआ होता, क्योंकि सत्ता उन हाथों में न आई होती, जिनके कारण देश में अनेक भीषण समस्याएं उत्पन्न हुई हैं। जिन शहीदों के प्रयत्नों व त्याग से हमें स्वतंत्रता मिली, उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। अनेक को स्वतंत्रता के बाद भी गुमनामी का अपमानजनक जीवन जीना पड़ा।

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हर्फ़-ओ-हिकायत: राष्ट्रवाद के भीतर पनपता हिंसक राज्यवाद और अपने अतीत से विमुख समाज

जिन राज्यों के बीच सीमा विवाद या जल विवाद है उनका अस्तित्व ही ज्यादा से ज्यादा पचास वर्षों का है। ऐसे में अगले पचास वर्षों में कौन सा राज्यवाद आकार लेगा ये कहना मुश्किल है, लेकिन इतिहास बता रहा है कि हमारे समाज को अपने अतीत में कोई दिलचस्पी नहीं है या फिर हमने इतिहास लेखन में भारी गलती कर दी है, जो लोगों को प्रेरणा देना तो दूर समझ ही में नहीं आ रहा है।

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भारतीय आधुनिकता, स्वधर्म और लोक-संस्कृति के एक राजनीतिक मुहावरे की तलाश

इस कड़वे सच को स्वीकार करना होगा कि पिछले 25-30 साल की हार, खासतौर से राम जन्मभूमि के आंदोलन के बाद की हार, सिर्फ चुनाव की हार नहीं है, सत्ता की हार नहीं है, बल्कि संस्कृति की हार है। हम अपनी सांस्कृतिक राजनीति की कमजोरियों की वजह से हारे हैं।

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भारत, पूंजीवाद, राष्ट्रवाद, साहित्य और राजनीति पर अरुंधति रॉय से सात सवाल

किसी नदी को आप विषमुक्‍त कैसे करते हैं? मेरे खयाल से, विष खुद-ब-खुद उसमें से निकल जाता है। बस, बहती हुई धारा अपने आप ऐसा कर देती है। हमें उस धारा का हिस्सा बने रहना होगा।

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बढ़ता हुआ एकाधिकार लोकतांत्रिक सुधार नहीं, सत्ता के वर्चस्व को स्थायी बनाने का नुस्खा है!

वी डेम की रिपोर्ट में भारत पिछले वर्ष की तुलना में सात स्थानों की गिरावट के साथ कुल 180 देशों में 97वें स्थान पर है। ‘’ऑटोक्रेटाइजेशन टर्न्स वायरल’’ शीर्षक रिपोर्ट में यह संस्थान भारत को थर्ड वेव ऑफ ऑटोक्रेटाइजेशन के अंतर्गत आने वाले देशों में शामिल करता है।

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दक्षिणावर्त: सहस्रबुद्धि विमर्शों की ‘टोकरी में अनंत’ पाठों से बनता यथार्थ

क्‍या वाकई यह पहली सरकार है जिसने महिलाओं (कम से कम हिंदी साहित्‍य में) का सही में सम्मान किया है? या फिर ऐसा है कि बीते सात दशक के दौरान कृष्‍णा सोबती से लेकर चित्रा मुद्गल वाया अलका सरावगी, मृदुला गर्ग और नासिरा शर्मा (सभी उपन्‍यासकार) हिंदी की कोई कवियत्री अकादमी पुरस्‍कार के लायक हुई ही नहीं?

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