बॉलीवुड में किसानों के ऊपर सिनेमा बनाने का जोखिम कौन लेगा?

इस मामले में क्षेत्रीय फिल्मों की स्थिति काफी अच्छी है। खासकर दक्षिण में तमिल, कन्नड़ और तेलुगु फिल्मों में किसानों के ऊपर फिल्में अब भी बन रही हैं। पिछले एक दशक में मराठी सिनेमा में भी इनकी संख्या बढ़ी है।

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छोड़कर मत जाओ बिजूका: तैलचित्रों में उभरते खेती-किसानी के संकट से एक सृजन संवाद

वह सपने संजोते रहता है कि माँ के सुनहरे आँचल में रंग-बिरंगे अंकुर अंकुरित होंगे और वह उस आँचल की छाँव में सुकून से आराम करेगा। इस तरह उसकी दुनिया लह-लहा उठेगी। लेकिन हकीकत तो कुछ और ही है – निरंतर प्रकृति की लूट-खसोट और जलवायु परिवर्तन की मार किसान ही झेल रहा है। साथ ही इसके सत्ता को संचालित करने वाली ताकतों याने कॉर्पोरेट घरानों के कृषि के काले कानूनों से भी।

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प्रधानमंत्री जी! लोकतांत्रिक सरकार की गाड़ी बिना रिवर्स गियर के चलाने की कोशिश मत करिए!

आदरणीय मोदी जी बोले तो अवश्य किंतु उनके लंबे भाषण में प्रधानमंत्री को तलाश पाना कठिन था। कभी वे किसी कॉरपोरेट घराने के कठोर मालिक की तरह नजर आते जो अपने श्रमिकों की हड़ताल से नाराज है; कभी वे सत्ता को साधने में लगे किसी ऐसे राजनेता की भांति दिखाई देते तो कभी वे उग्र दक्षिणपंथ में विश्वास करने वाले आरएसएस के प्रशिक्षित और समर्पित कार्यकर्त्ता के रूप में दिखते।

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सूली पर बिजूका और टोह लेते कव्वे: किसान आंदोलन के नाम बिना शीर्षक का एक इन्स्टालेशन

बिना शीर्षक की यह अद्भुत रचना खेती-किसानी पर कारपोरेटी हमले का दृश्यांकन है जो दर्शकों को दुख और सदमे से गुज़ारते हुए आक्रोश की ओर ले जाती है। इसकी परिकल्पना जन संस्कृति के पैरोकार और अनूठे कला गुरू प्रोफ़ेसर धर्मेंद्र कुमार ने की है।

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