मध्य प्रदेश बजट: कर्जमुक्ति और लाभकारी मूल्य पर कृषि उत्पादों की खरीद की कोई गारंटी नहीं

डॉ. सुनीलम ने कहा कि दो लाख रूपये के कर्जे की मुक्ति को लेकर कांग्रेस ने जो वादा किया था उसमें जो राशि बकाया थी उसकी माफी का प्रावधान करने की उम्मीद भाजपा सरकार से थी क्योंकि जो किसान पैसा जमा नहीं कर पाए इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। सरकार को अपनी ओर से कर्ज माफी करनी चाहिए थी या कम से कम कर्जा ना भरने पर भी नए कर्जे देने का प्रावधान करना चाहिए था।

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किसानों के लिए यह बजट निराशाजनक है, ऐसा कहना सरकारी कठोरता को कम कर के आंकना होगा

सरकार इस बजट के माध्यम से किसानों को यह संदेश देना चाहती है कि उनके आंदोलन से प्रभावित होकर वह अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करने वाली नहीं है, बल्कि किसानों के लिए पिछले बजटों में जो थोड़े बहुत प्रावधान किए गए थे उन्हें लेकर भी वह कंजूसी बरतने का दुस्साहस अवश्य करने वाली है।

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बजट ने साबित किया किसान-मजदूर सरकार की अंतिम प्राथमिकता: KSS

बजट ने सरकार के किसानों की आय को दुगना करने के दावे की पोल भी खोल दी है। सरकार ने फिर से एक बार झूठ बोला है कि देश में लागत से डेढ़ गुना दाम पर खरीद की जा रही है। जबकि गेहूं और धान भी पूरे देश मे समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदा जा रहा है। 23 कृषि उत्पादों की समर्थन मूल्य पर खरीद की बात बहुत दूर है।

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किसानों को 10 लाख का नोटिस भेजकर योगी सरकार ने संवैधानिक अनुबंध की अवमानना की है: रिहाई मंच

राजीव यादव ने कहा कि प्रदेश के कई जनपदों में किसानों और किसान नेताओं को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 111 और 149 के तहत नोटिस भिजवाए जा रहे हैं. इस प्रकार का नोटिस भेजकर सरकार आंदोलन का समर्थन करने वाले किसानों पर फर्जी मुकदमे लादकर आगामी 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर होने वाली किसान परेड के कार्यक्रम में व्यवधान पैदा करना चाहती है.

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दक्षिणावर्त: आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास…

हमने ऐसा महान देश बनाया है, जहां हरेक वह आदमी वह काम जरूर ‘नहीं’ कर रहा है, जिसके लिए उसे तनख्वाह दी जाती है, जिसकी उससे अपेक्षा है। हां, वह हरेक वह काम जरूर कर रहा है, जो किसी दूसरे के क्षेत्र का है औऱ जिसमें उसकी कोई विशेषज्ञता नहीं है।

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बिजली संशोधन विधेयक 2020: किसानों की तबाही का दस्तावेज

अब विद्युत वितरण क्षेत्र के निजीकरण से किसान, गरीब व आम उपभोक्ताओं को बेतहाशा बिजली मूल्य बृद्धि की मार भी झेलने को मजबूर होना पड़ेगा।

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ज़िंदा हैं प्रेमचंद के ‘हतभागे किसान’: लमही में किसान आंदोलन पर प्रलेस की चर्चा

आलेख वाचन के बाद हुई परिचर्चा में वर्तमान सरकार द्वारा प्रस्तुत कृषि संबंधी कानून की समीक्षा की गई और उसके महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित करते हुए किसानों से उनकी राय जानने का उपक्रम किया गया।

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किसानों के मुद्दे पर संविधान सभा की चुप्पी का नतीजा है कि आज दिल्ली के रास्ते इनके लिए बंद हैं!

संविधान सभा में मजदूरों और किसानों के मुद्दों पर बहुत ही कम बात हुई, विशेषकर उन्हें विधान में समाहित करने के मुद्दे पर। 19 अगस्त 1949 को मद्रास का प्रतिनिधित्व कर रहे सामान्य सदस्य एस. नागप्पा ने प्रांतीय विधान परिषदों में श्रमिक वर्गों के प्रतिनिधियों को शामिल करने की अपील की। इसे मसौदा समिति की तरफ से डॉ. अंबेडकर ने ठुकरा दिया।

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एक सदी से पूंजी के जाले में फंसा किसान क्‍या करे?

इस व्यवस्था के जाल में फंसा हुआ किसान इससे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा है। यदि किसानों को इस व्यवस्था के जाल से बाहर निकलना होगा, तो तय है पूंजीपतियों द्वारा जाति धर्म के बुने हुए जाल को खत्म करते हुए देश की संसद पर अपना हक जमाना होगा। मांगें पेश करने भर से काम नहीं चलेगा क्योंकि जो पूरी व्यवस्था है, वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूंजीपतियों के कब्जे में है।

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अंधेरे गड्ढे में जिंदा रहने का गर्वबोध है हिंदी, हिंदू और हिंदुस्‍तान

ऑटोमेशन के ज़माने में आपकी ज़रूरत मजूर के रूप में भी खत्म हो गयी है। ऐसे में मनोज बाजपेयी से एक गाना गवा दिया गया कि ‘बम्बई में का बा।’ ये सोच रहे हैं कि इन जबरन बनाये गये मजूरों का शहरों से मोहभंग हो जाये और ऑटोमेशन को लागू करने के लिए कोई जोर जबरदस्ती, मजूरों से संघर्ष की स्थिति, न बन सके।

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