जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक

ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?

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क्‍या आपको ख़बर है कि गरीबों के हक़ के लिए चार माह से एक सत्‍याग्रह चल रहा है?

अफ़सोस इस बात का है कि 5 जून से शुरू हुए इस सत्‍याग्रह में सौ से ज्‍यादा लोग गांधीजी के भारत की वापसी की भावना लिए उपवास पर बैठ चुके हैं लेकिन मीडिया से लेकर दूसरे मंचों पर कहीं कोई चर्चा नहीं है।

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