भारतीय आधुनिकता, स्वधर्म और लोक-संस्कृति के एक राजनीतिक मुहावरे की तलाश

इस कड़वे सच को स्वीकार करना होगा कि पिछले 25-30 साल की हार, खासतौर से राम जन्मभूमि के आंदोलन के बाद की हार, सिर्फ चुनाव की हार नहीं है, सत्ता की हार नहीं है, बल्कि संस्कृति की हार है। हम अपनी सांस्कृतिक राजनीति की कमजोरियों की वजह से हारे हैं।

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कथा कलकत्ता: एक बौद्धिक समाज के अवसान के सात दशक की आंखों देखी स्मृतियां

जिस कलकत्ते का मैंने जिक्र किया वह तो विलुप्त हो गया। अब तो बस दो-चार नामलेवा लेखक-कवि रह गए हैं जो जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। कविता के क्षेत्र में युवा पीढ़ी की संख्या इतनी है कि आप गिन नहीं सकते जबकि इनकी कविता में सबकुछ होता है पर कविता नहीं होती। कहानी लेखन का भी वही हाल है। संस्थाओं और मंचों पर कब्ज़ा ऐसे लोगों का है जो अपने प्रिय और प्रियाओं को मंच देते हैं। गंभीर लिखने वालों को दूर रखते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनको मंच दिया तो इनकी विद्वता की कलई न खुल जाए।

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