कमल शुक्ला पर हमले में पत्रकारिता भी घायल हुई है!

कमल शुक्ला पर हमले को लेकर यह सवाल बार-बार पूछा जाता है कि क्या इस घटना को रोका जा सकता था? जवाब मिलता है ‘हां’, रोका जा सकता था! इय हमले की जांच के लिए गठित पत्रकारों की उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि दरअसल यह घटना सोशल मीडिया पर छिड़े महीने भर पुराने एक विवाद का परिणाम थी जिस विवाद में कमल शुक्ला, सतीश यादव, कलेक्टर कांकेर और कमल शुक्ला पर हमला बोलने वाले शामिल थे।

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कोरोना की आड़ में मीडिया को ‘पत्रकारों’ से सैनिटाइज़ करने की साज़िश है इस दौर की छंटनी!

कोरोना महामारी के चढ़ते ग्राफ़ के बीच पत्रकारों की नौकरी जिस गति से जा रही है, वह दिन दूर नहीं जब कोरोना से संक्रमित होने वाले नागरिकों की संख्‍या को …

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विनोद दुआ पर मुकदमे के बहाने ‘संशयवादी पत्रकारिता’ के अंत पर कुछ विचार: रॉबर्ट पैरी

‘संशय’ पत्रकारिता का बुनियादी उसूल है। सवाल करना लाज़िमी है, चाहे सामने कितनी बड़ी हस्ती क्यों न हो, लेकिन जहाँ बदनीयती हो वहाँ ऐसा करना अपराध मान लिया जाता है। …

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पहला पत्रकार कोरोना का शिकार, बाकी की गृहस्थी तबाह कर रहे अख़बार और सरकार

पंकज कुलश्रेष्ठ की मौत कोरोना से होने वाली देश में पहले पत्रकार की मौत है। कोरोना महामारी के चक्कर में जिस तरीके से दूसरी बीमारियों और पुराने रोगों की उपेक्षा की जा रही है, उसके चलते मौतें ज्यादा हो रही हैं।

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पत्रकारिता का साम्राज्यवादी चेहरा: संदर्भ एस.पी. सिंह

सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. पर जितेन्‍द्र कुमार के लिखे आलेख पर बहस अब तक फेसबुक समेत तमाम मंचों पर जारी है। यह लेख अब भी जितेन्‍द्र कुमार के ब्‍लॉग …

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एसपी ”मूर्ख-मूर्खाओं” को ही रखते थे क्योंकि वे सवाल नहीं पूछते! पुण्यतिथि पर एक स्मरण…

भारत में टीवी पत्रकारिता के गॉडफादर माने जाने वाले सुरेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ़ एसपी की आज पुण्यतिथि है. 1997 में उनकी मौत के बाद बीते दो दशक से ज्यादा वक़्त …

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