स्कूली शिक्षा की प्रगति को आईना दिखाती है नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट

सार्वजनिक शिक्षा में संसाधनों की वृद्धि करना जरूरी है, साथ ही केंद्र, राज्यों और स्थानीय निकायों के बीच सामंजस्यपूर्ण, योजनाबद्ध तरीके से नीतियों, योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन व परिचालन करना पड़ेगा। शिक्षकों की कमियों को दूर करते हुए शिक्षण अधिगम गुणवत्ता को सुधारने के लिए कार्य करना होगा।

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मैं… बेसिक शिक्षा हूँ…!

प्रत्येक विद्यालय में पूर्णकालिक प्रधानाध्यापक है और न ही प्रत्येक कक्षा के लिए शिक्षक ही है। बेशर्मी देखिए, बात जब छात्र-शिक्षक अनुपात की होती है तो अनुपात के सही होने का ढिंढोरा पीटा जाता है, वो भी सदन में। विद्यालयों में नियुक्त शिक्षामित्रों और अनुदेशकों को जब वेतन और सुविधा देने की बात आती है तो ये संविदाकर्मी और अनट्रेंड कर्मी की श्रेणी में आते हैं लेकिन बात जब अपनी जवाबदेही की आती है तो सदन में वही शिक्षामित्र और अनुदेशक छात्र-शिक्षक अनुपात सही करने के हथियार भी बना लिए जाते हैं। कोई भी शिक्षक भर्ती प्रक्रिया न तो ससमय प्रारंभ होती है न ही संपन्न। दो से चार वर्ष के समयान्तराल पर भी नहीं।

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