कैसे किया जाए EVM पर भरोसा?

मतदान समाप्त होने के बाद भारतीय निर्वाचन आयोग की एक व्यवस्था यह भी है कि प्रत्येक उम्मीदवार के प्रतिनिधि को फॉर्म 17सी पर यह जानकारी दी जाए कि कितने मत डाले गए ताकि गिनती वाले दिन यह देखा जा सके कि मतगणना में भी उतने ही मत निकलें।

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स्वास्थ्य बजट: कोरोना के भयानक दौर को क्या भूल गई सरकार?

अनेक विशेषज्ञों का आकलन है कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वर्ष 2021-22 का वास्तविक स्वास्थ्य बजट जीडीपी का 0.34 प्रतिशत था जो 2022-23 में 0.06 प्रतिशत की मामूली वृद्धि के बाद 0.40 प्रतिशत हो गया है। विगत वर्ष बजट में स्वास्थ्य की हिस्सेदारी 2.35 प्रतिशत थी जो अब घटकर 2.26 प्रतिशत रह गई है।

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इतिहास में किस रूप में याद की जाएंगी लता मंगेशकर?

दुनिया में आज तक किसी विचारहीन कलाकार ने इतिहास में स्थान नहीं बनाया है, चाहे वह अपने जीवन-काल में कितना भी महान क्यों न लगता रहा हो। लता के गीत भले ही कुछ अरसे तक जीवित रहें, लेकिन एक कलाकार के रूप में लता इतिहास के कूड़ेदान में वैसे ही जाएंगी, जैसे कोई टूटा हुआ सितार जाता है, चाहे उसने अपने अच्छे दिनों में कितने भी सुंदर राग क्यों न निकाले हों।

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आम बजट: गांव और किसान की अनदेखी कर के सरकार ने क्या आंदोलन का बदला लिया है?

इस नीरस और निराशाजनक बजट की प्रशंसा के लिए एक अनूठा और हास्यास्पद तर्क गढ़ा गया- पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के बाद भी सरकार ने आम लोगों को राहत पहुंचाकर उनका दिल जीतने की कोशिश नहीं की, कोई लोकलुभावन घोषणा इस बजट में नहीं की गई।

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गाँधी की हत्या का सिलसिला जारी है…

गाँधीजी के प्रति नफ़रत या घृणा कोई नयी परिघटना नहीं है लेकिन जो नफरत पहले कहीं थोड़ी दबी हुई थी अब वो खुलकर बाहर आ रही है क्योंकि इन नफरती ताकतों के लिए मीडिया अनुकूल वातावरण मुहैया करा रहा है।

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सत्ता-प्राप्ति पर केंद्रित चुनाव बनाम लेबर चौक पर खड़ा लोकतंत्र: कुछ जरूरी सवाल

लेबर चौक पर खड़ा लोकतंत्र का नुमाइंदा क्या चेहरों को देख कर ही इस बार भी मतदान करेगा या कुछ और भी सोच पाने की स्थिति में इन गर्दिशों के दौर में आ चुका है? बार-बार ठगे जाने को कहीं अपनी नियति मान एक दिहाड़ी के एवज में नीतियों को नकार कर अपने भाग्य को कोसता रहेगा या जूझने की ताकत और यकीन को फिर से गिरवी रख देगा?

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परंपरा के नाम पर डिजिटल नफरत के नये ठिकाने

ट्रैड्स सवर्ण हिंदुओं के वर्चस्व की हिमायत करते हैं। इनके अनुसार सवर्ण हिन्दू शुद्ध रक्त वाली श्रेष्ठतम नस्ल हैं। यह अल्पसंख्यकों एवं दलितों को गंदे कॉकरोच एवं दीमक के रूप में कार्टूनों के माध्यम से चित्रित करते हैं। सवर्ण वर्चस्व को त्यागकर जाति भेद मिटाते हुए हिन्दू धर्मावलंबियों की एकता का विचार इन्हें पूर्णतः अस्वीकार्य है।

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बाल विवाह की जड़ें वंचित जातियों की बदहाल जीवन स्थितियों में है, शादी की कानूनी आयुसीमा में नहीं!

आज बाल विवाह का कारण कन्यादान का फल मिलना नहीं है, बल्कि ऐसी जातियां जो प्रवासी मजदूर के रूप में अपनी आजीविका कमाती हैं उनके बीच बेटियों की सुरक्षा एक अहम मुद्दा है।

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हिंदुत्व के खतरे में होने का विश्वास कहां से आया है?

। चूंकि धर्मनिरपेक्ष आधुनिकता के द्वारा उत्पन्न तनाव समाज में शिद्दत से महसूस किया जा रहा है, ज्यादा और ज्यादा हिंदू बुद्धिजीवी यह विश्वास करने लगे हैं कि उनका धर्म और जीवनशैली खतरे में है, वे इसके स्थायित्व, लचीलेपन और अनुकूलनीयता को देखते हुए इस बारे में जितना उन्हें होना चाहिए उससे कम आत्मविश्वासी हैं।

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नीलामी पर चौतरफा चुप्पी क्या इस भरोसे पर टिकी है कि हम हमेशा खरीददार ही होंगे?

सब मौन हैं। केंद्र सरकार की सभी कद्दावर महिला मंत्री चुप हैं। अभी कुछ ही महीने पहले तीन तलाक प्रकरण में स्वयं को मुस्लिम महिलाओं के परम हितैषी के रूप में प्रस्तुत करने वाले बुद्धिजीवी मूकदर्शक बने हुए हैं।

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