हरियाणा : महिला सुरक्षा के ढांचे की कमियों पर सखी मंडल के अनुभव


भारत में महिला सुरक्षा को लेकर नीतिगत ढांचा पिछले एक दशक में काफी विस्तृत हुआ है। कानूनी प्रावधानों से लेकर संस्थागत व्यवस्थाओं—जैसे वन-स्टॉप सेंटर, हेल्पलाइन और संरक्षण तंत्र—तक, राज्य ने कई स्तरों पर हस्तक्षेप किए हैं। फिर भी, जमीनी अनुभव एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। सहायता की आवश्यकता और सहायता तक वास्तविक पहुंच के बीच एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। यह अंतर विशेष रूप से उन महिलाओं के मामलों में अधिक गहरा होता है, जो पहले से ही सामाजिक और भौगोलिक रूप से हाशिए पर हैं।

सखी मंडल के साथ कार्य करते हुए, हरियाणा के विभिन्न जिलों में यह बार-बार सामने आया है कि समस्या संसाधनों या योजनाओं की अनुपस्थिति से अधिक, प्रक्रियाओं की असंगति और क्रियान्वयन की अनिश्चितता से जुड़ी है। किसी भी नीति की प्रभावशीलता उसके डिजाइन से कम, और उसके क्रियान्वयन की संरचना से अधिक निर्धारित होती है। वर्तमान व्यवस्था में तीन स्तरों पर चुनौतियां स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।

पहला, संस्थागत समन्वय (institutional coordination) का अभाव। पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग, और अन्य सहायता तंत्र अक्सर समानांतर रूप से कार्य करते हैं, लेकिन उनके बीच स्पष्ट कार्य-विभाजन और समन्वय तंत्र विकसित नहीं हो पाता। दूसरा, प्रतिक्रिया की असंगति (inconsistency)। समान प्रकृति के मामलों में अलग-अलग स्तरों पर भिन्न प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं, जो काफी हद तक व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर होती हैं। तीसरा, प्रक्रियात्मक प्राथमिकताएं (procedural priorities)। कई बार औपचारिकताओं—जैसे दस्तावेज़, आवेदन या क्षेत्राधिकार—को तत्काल सुरक्षा और सहायता से ऊपर रखा जाता है। हरियाणा में अंतरराज्यीय विवाह की महिलाओं के मामलों में ये चुनौतियां और अधिक स्पष्ट हो जाती हैं।

ये महिलाएं अक्सर स्थानीय सामाजिक नेटवर्क से बाहर होती हैं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं से अपरिचित होती हैं, और कई मामलों में उनके पास पहचान या निवास से जुड़े आवश्यक दस्तावेज़ भी नहीं होते। इस स्थिति में, यदि सहायता प्रणाली स्पष्ट, सुसंगत और त्वरित न हो, तो वे प्रारंभिक स्तर पर ही प्रक्रिया से बाहर हो जाती हैं।

इस संदर्भ में यह समझना महत्वपूर्ण है कि इन महिलाओं के लिए राज्य ही प्राथमिक—और कई बार एकमात्र—सुरक्षा तंत्र होता है। इसी पृष्ठभूमि में “प्रथम उत्तरदाता प्रोटोकॉल (Standard Operating Procedure – SOP)” का महत्व सामने आता है। SOP का उद्देश्य नई व्यवस्था बनाना नहीं है, बल्कि मौजूदा व्यवस्था को मानकीकृत (standardised) करना है। यह स्पष्ट करता है कि किसी मामले में प्रारंभिक स्तर पर कौन से कदम अनिवार्य रूप से उठाए जाने चाहिए, और किस क्रम में।

इसका प्रभाव दो स्तरों पर देखा जा सकता है। पहला, यह व्यक्तिगत विवेक पर निर्भरता को कम करता है, जिससे प्रतिक्रिया अधिक सुसंगत और पूर्वानुमेय बनती है। दूसरा, यह जवाबदेही की स्पष्ट रेखाएं निर्धारित करता है, जिससे विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय बेहतर हो सकता है। हालांकि, केवल SOP तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए तीन बुनियादी तत्व आवश्यक हैं:

  •  प्रशिक्षण: संबंधित अधिकारियों को न केवल प्रक्रिया, बल्कि उसके उद्देश्य की भी समझ होनी चाहिए
  • निगरानी और मूल्यांकन: नियमित रूप से यह आकलन किया जाए कि SOP का पालन किस हद तक हो रहा है
  • फीडबैक तंत्र: जमीनी अनुभवों के आधार पर प्रक्रिया में सुधार की गुंजाइश बनी रहे।

महिला सुरक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए अब फोकस नई योजनाओं के निर्माण से हटकर, मौजूदा व्यवस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने पर होना चाहिए। अंतरराज्यीय विवाह की महिलाओं के अनुभव यह संकेत देते हैं कि नीति और व्यवहार के बीच की दूरी ही सबसे बड़ी चुनौती है। इस दूरी को कम करने के लिए, प्रक्रियाओं का स्पष्ट होना, प्रतिक्रिया का सुसंगत होना और जवाबदेही का सुनिश्चित होना। तीनों समान रूप से आवश्यक हैं। यहीं से किसी भी सुरक्षा तंत्र की वास्तविक विश्वसनीयता तय होती है।


राजबाला, प्रोग्राम लीड, सखी मंडल, (एम्पावर पीपल)

About जनपथ

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है जिसे 2006 में शुरू किया गया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका। जनपथ को मौजूदा पता दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद कुछ समानधर्मा लेखकों और पत्रकारों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो बरसों पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए अखबारों में स्पेस कम हो रही है। ऐसी सूरत में जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो। शर्त बस एक हैः जो भी छपे, वह जन-हित में हो। व्यापक जन-सरोकारों से प्रेरित हो। व्यावसायिक लालसा से मुक्त हो क्योंकि जनपथ विशुद्ध अव्यावसायिक मंच है और कहीं किसी भी रूप में किसी संस्थान के तौर पर पंजीकृत नहीं है।

View all posts by जनपथ →