भोपाल के गांधी भवन में मई दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित ‘वैश्विक वित्तीय और आर्थिक संकट तथा उभरते विकल्प’ विषय पर परिचर्चा में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ब्रेटनवुड एग्रीमेंट के आधार पर चल रही दुनिया की डॉलर केन्द्रित अर्थव्यवस्था को फ़िलीस्तीन और ईरान पर इजराइल और अमेरिका के हमलों से जोड़ते हुए अर्थशास्त्री जया मेहता ने कहा कि ईरान को नेस्तनाबूद कर देने के उनके दावों के विपरीत ईरान ने जिस बहादुरी से हमलों का जवाब देते हुए खाड़ी के देशों के अमेरिकी सैन्य अड्डों को लगातार निशाना बनाया है और साथ-साथ चीन से तेल व्यापार में यूआन को स्वीकृति देकर डॉलर में वैश्विक व्यापार करने की मजबूरी का स्थायी और गरिमामय विकल्प तलाशने की ब्रिक्स की कोशिशों को मजबूत किया है, उससे अमेरिकी वित्तीय साम्राज्यवाद को बड़ा झटका लगना तय है।
उन्होंने कहा कि अमेरिकी हमलों और धमकियों का मुँहतोड़ जवाब देकर ईरान ने तीसरी दुनिया या दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों को अपनी संप्रभुता पर नव-साम्राज्यवादी हमलों को समझने और उनका मुक़ाबला कर सकने की हिम्मत जगाई है, जिसके लिए हम सबको ईरान को सलाम करना चाहिए और उसके समर्थन में पुरज़ोर तरीक़े से खड़े होना चाहिए। एक तरफ़ अमेरिका अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का मखौल उड़ाते हुए ईरान के वैज्ञानिकों और स्कूली बच्चों का क़त्लेआम करता है, तो दूसरी तरफ़ ईरान के पास परमाणु हथियार होने का हौआ खड़ा करता है, जबकि वास्तव में 1951 में तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करने वाले ईरान के तत्कालीन प्रधान मंत्री मोहम्मद मोसादेह का 1953 में तख़्तापलट करने के बाद अपने पिट्ठू रज़ा शाह पहलवी को मजबूत करने के लिए अमेरिका ने ही ईरान को परमाणु संपन्न बनाया था। ईरान की सोची-समझी रणनीति के कारण पश्चिम एशिया के देश यह समझ गये हैं कि अमेरिका उनकी सुरक्षा करने में सक्षम नहीं है, इसलिए अब समूची तीसरी दुनिया से अमेरिकी सैन्य अड्डों के विरोध की संभावना जग गई है, जिससे पूरी दुनिया का नक़्शा बदल सकता है।

जया ने अमेरिका और यूरोप के अमीर देशों के फ़ायदे के लिए बनाये गए वित्तीय साम्राज्यवाद के इतिहास का ख़ुलासा करते हुए बताया कि व्यापार में साझीदार दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों को लूटकर अपना घर भरने की नीयत से बनाई गई यह वैश्विक अर्थव्यवस्था लगातार संकट में आई है, और हर बार उससे उबरने के ऐसे ही तात्कालिक उपाय किये गए, जिससे ग़रीब देश और ग़रीब हुए। उन्होंने कहा कि 1971 के बाद से डॉलर और वित्तीय पूँजी को स्वर्ण के ठोस आधार से मुक्त करके सट्टा बाज़ार का अंग बना देने के बाद जो वित्त का बुलबुला बना, वो 2008 में फूटा, और दुबारा कभी भी फूट सकता है। इसलिए इसका एक स्थायी और बेहतर विकल्प खड़ा करना ज़रूरी है, जिसके लिए चीन और रूस सहित ब्रिक्स द्वारा लगातार कोशिशें की जा रही हैं, और ईरान के सफल प्रतिरोध के बाद अमेरिका समर्थित वित्तीय साम्राज्यवाद में जो दरारें पड़ती दिख रही हैं, उससे लग रहा है कि वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बनाने में क़ामयाबी अब ज़्यादा दूर नहीं है।
मेहता के आधार वक्तव्य के बाद चर्चा को आगे बढ़ाते हुए बादल सरोज ने कहा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत कमज़ोरियों पर टीका-टिप्पणियाँ करने से यह ठोस सच्चाई ओझल हो रही है, कि दूसरे अमेरिकी नेताओं की तरह ट्रंप की भी हर कार्रवाई वित्तीय साम्राज्यवाद को आगे बढ़ाने और द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले की साम्राज्यवाद की निरंकुशता को फिर से बहाल करने की दिशा में है। साम्राज्यवाद मौजूदा धक्के से उबर कर फिर मजबूत होकर नये रूप में सामने आ सकता है। इसलिए अपने-आप उसके ढहने की कल्पना करने के बजाय उसके ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़नी ज़रूरी है। अपने व्यापार को बढ़ाने पर केन्द्रित चीन की कार्रवाइयों पर पूरा भरोसा करने के बजाय भारत के प्रगतिशील लोगों को तीसरी दुनिया को गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अपने गरिमामय इतिहास से प्रेरणा लेकर मौजूदा प्रतिगामी नेतृत्व के बावजूद अपनी पुरानी भूमिका में लौटने का प्रयास करना चाहिए।
राकेश दीवान ने कहा कि साम्राज्यवाद की अपनी एक संस्कृति होती है, जो लोगों के जीने का ढंग बदलकर उन्हें अपने पाले में कर लेती है, ताकि लोग प्रतिकार न कर सकें, हमेशा के लिए गुलाम बने रहें। लंबे समय से साम्राज्यवाद के विरुद्ध सफलतापूर्वक लड़ रहा छोटा-सा देश क्यूबा हमारे लिए मिसाल है, जिसने स्वदेशी तकनीकों को माध्यम बनाकर उसपर जीत हासिल की है। अगर हम भी एक तरह के साम्राज्यवाद से निकलकर दूसरे तरह के साम्राज्यवाद का शिकार होने से बचना चाहते हैं, तो हमें भी क्यूबा की तरह रहन-सहन की साम्राज्यवादी पद्धति को छोड़कर स्वदेशी पद्धतियों को अपनाना चाहिए।
विनीत तिवारी ने कहा कि आज की बदली परिस्थितियों में दक्षिण के देशों की परिभाषा व्यापक हो चुकी है और अब अमेरिकी साम्ज्यवाद के ख़िलाफ़ खड़े हर देश को इस समूह में शामिल मानना चाहिए, जैसे चीन और रूस। साम्राज्यवाद का आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के साथ गठजोड़ आज टूटने के कगार पर है। वैसे तो पहले भी कई बार ऐसी संभावनाएँ बनती रही हैं। लेकिन इस बार वैश्विक व्यापार में डॉलर और स्विफ्ट की घटती भागीदारी इस बात का पुख़्ता सबूत है कि वित्तीय साम्राज्यवाद अब वास्तव में दरक रहा है। वैसे भी, शोषण पर आधारित व्यवस्था एक न एक दिन ख़त्म ज़रूर होती है। किसी भी युद्ध में केवल देश या प्रशिक्षित सैनिक ही शामिल नहीं होते, आम जनता भी शामिल होती है। आम जनता के लिए देशों की संप्रभुता का मतलब आज़ादी से अलग नहीं होता है। साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में जीतने के लिए ज़रूरी है कि नयी पीढ़ियों को वित्तीय उपनिवेशवाद के सांस्कृतिक प्रतिरोध के लिए तैयार किया जाए।
विनीत ने औद्योगिक पूँजी और वित्तीय पूँजी के महत्त्वपूर्ण अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया कि औद्योगिक पूँजी के दौर में मज़दूरों का एक जगह इकट्ठे होकर संगठन बनाना, संघर्ष करना संभव होता है, वित्तीय पूँजी में यह संभव नहीं होता। ब्रिक्स की कोशिशें वित्तीय पूँजी के दौर को ख़त्म करके निर्माण आधारित औद्योगिक पूँजीवाद के दौर को वापस लाना है। भले ही समाजवाद अभी मुमकिन न लगता हो, लेकिन कम से कम साम्राज्यवाद के ढहने के बाद किसी दूसरे रूप में वह वापस न आने पाए, यह कोशिश हमारी ज़रूर रहनी चाहिए।
‘जोशी-अधिकारी इस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़’, ‘हम सब’ और ‘गांधी भवन’ द्वारा आयोजित इस परिचर्चा में श्रोताओं की उपस्थिति उत्साहजनक रही, जिनमें राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, राम प्रकाश त्रिपाठी, पलाश सुरजन, आरती, बालेंदु परसाई, शैलेंद्र शैली, सुधीर सजल, उपासना बेहार, स्मिता सत्यमेव आदि शामिल रहे। नियत वक्ताओं के वक्तव्यों के बाद प्रश्नोत्तर सत्र में अधिकांश श्रोताओं ने अपने विचार रखे और परिचर्चा को व्यापक रूप देकर सार्थक बनाया।
द्वारा
सुधीर सजल
जोशी-अधिकारी इस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़, ‘हम सब’, ‘गांधी भवन’ की ओर से

