सब संस्कृतियां मेरे सरगम में विभोर हैं…

शमशेर में जहां नित-नूतनता है वहीं निरन्तर बढ़ाव या उठान भी। नित-नित परिष्कृत होती उनकी शैली अपने वैशिष्ट्य के चलते एक जीवित मिथक गढ़ती है। शमशेर स्थूल के आग्रही किन्हीं विशेष परिस्थितियों में अपवादवश भले रहे हों, मूलतः सूक्ष्म संवेगों की छटी हुई अनुभूतियों का खाका उनकी कविताओं में विद्यमान है।

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मिटेंगे अब अपराधों के साये: किसान आंदोलन के अवसान पर दो कविताएं

सांत्वना बहुत लोग गेहूं की रोटी खाते हैं चावल खाते हैं कुछ ज्वार बाजरा मक्का भी खाते हैं दलहन तिलहन सब्जी और फल खाते हैं उनके विभिन्न उत्पाद और व्यंजन …

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बीते एक साल में 91 फीसद बढ़ गयी गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की तादाद, बिहार और गुजरात अव्वल

कुपोषण पर ताजा सरकारी आंकड़े दिखा रहे हैं कि भारत में कुपोषण का संकट और गहरा गया है। इन आंकड़ों के मुताबिक भारत में इस समय 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से आधे से ज्यादा यानी कि 17.7 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे सबसे ज्यादा महाराष्ट्र, बिहार और गुजरात में हैं।

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पक्षियों के जौहरी सालिम अली की कहानी

सालिम अली ने कई पत्रिकाओं के लिए लिखा, मुख्य रूप से जर्नल ऑफ द बॉम्बे नेचुरल हिस्टरी सोसायटी के लिए लगातार लिखा। साथ ही उन्होंने कई लोकप्रिय और शैक्षिक पुस्तकें भी लिखी, जिनमें से कुछ अभी भी प्रकाशित नहीं हुई हैं। इसके लिए अली ने तहमीना को श्रेय दिया है जिसने इनकी अंग्रेजी में सुधार करने के लिए इंग्लैंड में अध्ययन किया था।

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क्या देश का लोकतंत्र राजनैतिक दलों के हाथों में सुरक्षित है?

? क्या हमारे शासक इतने कमजोर हैं कि कोई व्यक्ति कानून और संविधान को चुनौती देता हुआ कभी विधानसभा, कभी मीडिया के दफ्तरों और कभी सड़कों पर आतंक बरपाता फिरे और हम अपनी वाचिक कुशलता से ही काम चला लें। क्या ये मामले सिर्फ निंदा या कड़ी भत्सर्ना से ही बंद हो सकते हैं।

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अक्टूबर क्रांति और लेनिन की प्रासंगिकता

लेनिन की समाजवाद की अवधारणा दीर्घावधि की सोच पर आधारित रही जो वर्तमान की सच्चाइयों के साथ व्यावहारिक तालमेल पर आधारित थी। इसमें किसानों के प्रति संवेदना और तानाशाही शासन तंत्र की खामियों को दूर करना शामिल था।

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लेखक संगठन और आत्मालोचन का सवाल: हिरन पर घास कौन लादेगा?

प्रो. अब्दुल अलीम, जिनका संबंध प्रगतिशील लेखक संघ के पुरोधाओं से है, उन्होंने लेखकों की एक बड़ी मीटिंग में कहा था कि लेखक संगठन बनाना उतना ही कठिन है जितना कि हिरन पर घास लादना, लेकिन हिरन पर घास लादने का कार्य प्रगतिशील लेखक संघ के उत्तराधिकारियों का काम है। इसे कोई दूसरा नहीं कर सकता है।

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खूब पहचान लो असरार हूं मैं, जिन्स-ए-उल्फत का तलबगार हूं मैं…

। दुर्भाग्य यह कि हमारे देश के नक्काद (आलोचक) उन्हें कभी इंकलाब के सांचे में फिट करते तो कभी उर्दू का कीट्स करार दे अपनी ऊर्जा जाया करते रहे। मजाज़ को मजाज़ की नजर से देखने की कोशिश नहीं की गई।

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अडानी के खनन से हसदेव का जंगल बचाने के लिए आदिवासियों की ऐतिहासिक पदयात्रा

ग्रामीणों ने अपनी यात्रा मदनपुर ग्राम से शुरू की और 10 दिनों में 300 किमी से अधिक की दूरी तय करते हुए वे राजधानी रायपुर पहुंच रहे हैं, जहां वे अपनी मांगों को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को सौंपेंगे।

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कौन कर रहा है कोयले की दलाली में हाथ काले?

भारत के कोयला संकट को गहराने में जहां अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की भूमिका रही वहीं देश के भीतर मौजूद कारण भी इसकी वजह रहे जिसने खदानों से लेकर बिजली संयंत्रों तक सप्लाई की लय को गड़बड़ा दिया। कई राज्यों में कोयले की उपलब्धता में कमी आयी है।

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