ज्ञान की खोज में एक महापंडित और यायावर

ज्ञान की इतनी तीव्र पिपासा और जन-चेतना के प्रति निष्ठा ने राहुलजी के व्यक्तित्व को इतना प्रभा-मंडल दिया कि उसे मापना किसी आलोचक की सामर्थ्य के परे है। इसके अलावा जो सबसे बड़ी विशेषता थी- वह यह थी कि यश और प्रशंसा के ऊँचे शिखर पर पहुँचकर भी वे सहृदय मानव थे।

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लगातार धधक रही है उत्तराखंड के जंगलों में आग, चपेट में 11 जिले, वायुसेना काम पर

नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, हरिद्वार और रुद्रप्रयाग जिले ज्यादा प्रभावित हुए हैं। आग बेकाबू होती गई है, जिससे ग्रामीण दहशत में हैं और कई वन्य जीवों का जीवन संकट में है।

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घृणा और विरोध की एक चीख, जो आज भी सुनाई देती है…

जन्म के समय अपनी पहली चीख़ के बारे में स्वयं गोर्की ने लिखा है- ‘मुझे पूरा यकीन है कि वह घृणा और विरोध की चीख़ रही होगी।’ इस पहली चीख़ की घटना 1868 ई. की 28 मार्च की 2 बजे रात की है लेकिन घृणा और विरोध की यह चीख़ आज इतने वर्ष बाद भी सुनाई दे रही है। यह आज का कड़वा सच है और मैक्सिम गोर्की शब्दों का अर्थ भी है – बेहद कड़वा।

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आज के दौर में भगत सिंह को देखने का संदर्भ और दृष्टि क्या हो?

भगत सिंह का यह आह्वान काफी मूल्यवान है- खासकर ऐसे समय में, जब आज भी क्रान्तिकारी ताकतें दलितों पर होने वाले जातीय व व्यवस्था जनित उत्पीड़न के खिलाफ कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हैं।

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दांडी मार्च के 91 वर्ष: जन आंदोलन से आततायी सत्ताओं को झुकाया जा सकता है

आज की युवा पीढ़ी के दिमाग से इस घटना और इसके महत्व को बताने के लिए 91 साल पहले हुई उस ऐतिहासिक यात्रा के केंद्र पर उन स्मृतियों को सहेजने के लिए एक स्मारक बनाया गया है।

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महिला-मुक्ति और सम्मान का सवाल श्रम की मुक्ति के साथ नत्थी है, इसे नहीं भूलना चाहिए

आजादी के बाद समझौतावादी धारा का समर्थक धनी, पूंजीपति वर्ग सत्ता में आने के बाद निहित वर्ग-स्वार्थ के कारण महिलाओं की मुक्ति की दिशा में ठोस कदम उठाने से हमेशा परहेज करता रहा।

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सौ साल के रेणु: मनुष्य की परतदार यातनाओं का कथा-शिल्पी

वे अमूर्त से सैद्धान्तिक सवालों पर बहस नहीं करते थे। उनके विचारों का स्रोत कहीं बाहर-पुस्तकीय ज्ञान में न था, राजनीतिक हस्तक्षेप में उनका विश्वास बढ़ रहा था। उनके मन में एक आशा पनप रही थी। और जब ऐसा कुछ हुआ, तो रेणु अचानक सक्रिय हो गए।

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बंगाल में राजनीतिक हिंसा की ऐतिहासिक जड़ें और भाजपा का उभार

बंगाल में राजनीतिक हिंसा का एक लंबा व रक्तरंजित इतिहास रहा है। बंगाल की राजनीति का एक खास तरह के उग्र रूप से सदैव वास्ता रहा है। क्रांति और जुनून राज्य के राजनीतिक मानस में शामिल है। स्वतंत्रता आंदोलन, इसके उदाहरणों से भरा पड़ा है।

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डेढ़ सौ साल से चल रहे किसान आंदोलनों की समृद्ध परंपरा में याद रखने योग्य कुछ अहम पड़ाव

भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का अहम योगदान रहा है। कृषक आंदोलनों का इतिहास बहुत पुराना है और विश्व के सभी भागों में अलग-अलग समय पर किसानों ने कृषि नीति में परिवर्तन करने के लिये आंदोलन किये हैं ताकि उनकी दशा सुधर सके।

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कौन वह भारत-भाग्य-विधाता है!

‘गण’ मूलतः वैदिक शब्द था। वहाँ ‘गणपति’ और ‘गणनांगणपति’ ये प्रयोग आए हैं। इस शब्द का सीधा अर्थ समूह था। देवगण, ऋषिगण पितृगण-इन समस्त पदों में यही अर्थ अभिप्रेत है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक गांव एक गण समूह होता था वह अपने कार्यों और उत्तरदायित्वों के प्रति स्वयं उत्तरदायी होता था। उसके ऊपर किसी अन्य का कोई अधिकार नहीं होता था। भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार उस भूभाग के समस्त गण गणपति का चुनाव करते थे जो उन्हें आवश्यकतानुसार सलाह देता था विशेषकर खेती और पशुओं की समृद्धि के लिए।

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