नालंदा से कोलकाता वाया जर्मनी: किताबों से डरने वाली राजनीति जारी है

पुस्तकें किसी एक विचारधारा की प्रतिनिधि नहीं होतीं। उनमें सत्ता के पक्ष में लिखे गए ग्रंथ भी होते हैं और सत्ता की आलोचना करने वाले दस्तावेज भी; धार्मिक दर्शन भी होता है और नास्तिक चिंतन भी; राष्ट्र के गौरव का आख्यान भी होता है और उसके इतिहास की असुविधाजनक पड़ताल भी। पुस्तक का मूल स्वभाव ही यह है कि वह एक से अधिक दृष्टियों के लिए जगह बनाती है। इसीलिए स्वतंत्र विचार से भयभीत राजनीति को उन पुस्तकों से विशेष परेशानी होती है जो उसके बनाए नैरेटिव के बाहर खड़ी होकर सवाल करती हैं।

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पुलिस और नागरिक : सत्ता बनाम स्वतंत्रता का द्वंद्व

जब पुलिस नागरिक को नियंत्रित करने को अपना प्राथमिक दायित्व समझती है और नागरिक पुलिस को अपने अधिकारों के लिए बाधा मानने लगता है, तब दोनों के बीच कानून का संबंध कमजोर होकर शक्ति का संबंध बन जाता है। पुलिस कहती है – हमारे पास शक्ति है। नागरिक कहता है- मेरे पास अधिकार है। लोकतंत्र का प्रश्न है- अंततः किसकी चलेगी? इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए-कानून की।

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एक मई: दुनिया भर के धन्नासेठ आज भी जिस दिन से डरते हैं!

अमेरिका में कमजोर पडऩे के बावजूद, दुनिया के हर देश के करोड़ों मजदूर मई दिवस को एक ऐसे दिन के तौर पर मनाते हैं जब वे मजदूर वर्ग के रूप में अपनी मांगों को उठाते हैं।

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साधो देखो जग बौराना…

हमारा अवचेतन मन हमारे विश्वास पर कार्य करता है, तर्क पर नहीं। इसलिए आप किसी भी बाबा, पाखंडी गुरु या साधक के पास चले जाएं, किसी भी मंदिर, गुरूद्वारे, मज़ार पर चले जाएं, यह निश्चित मान लीजिए आपका इनके पास जाना ही आपके अवचेतन मन को प्रभावित करता है।

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नेल्सन मंडेला के बगैर दुनिया: नौवीं बरसी पर एक स्मृति

नेल्सन मंडेला आधुनिक जगत में एक विलक्षण राजनेता रहे हैं। दक्षिणी अफ्रीका गणराज्य के जीवन में उन्होंने जो राजनीतिक भूमिका अदा की, उस तक ही उनका महत्त्व सीमित नहीं है।वह विशेष नैतिक सिद्धांतों को मानते थे। उन्होंने नस्लों और सामाजिक वर्गों के बीच संबंधों में नैतिकता को फिर से उसका स्थान दिलाया।

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डॉ. रामविलास शर्मा और भारत का इतिहास

इतिहास की समस्याओं से जूझना मानो उनकी पहली प्रतिज्ञा हो। वे भारतीय इतिहास की हर समस्या का निदान खोजने में जुटे रहे। उन्होंने जब यह कहा कि आर्य भारत के मूल निवासी हैं, तब इसका विरोध हुआ था। उन्होंने कहा कि आर्य पश्चिम एशिया या किसी दूसरे स्थान से भारत में नहीं आए हैं, बल्कि वे भारत से पश्चिम एशिया की ओर गए हैं। वे लिखते हैं – ‘‘दूसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व बड़े-बड़े जन अभियानों की सहस्त्राब्दी है।‘’

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पुस्तक संस्कृति का ह्रास

आज लेखक अपने पैसों से पुस्तकें छपवा कर स्वप्रचार कर रहे हैं। यह एक दयनीय स्थिति है। इस स्थिति में साहित्य के नाम पर लेखन, सृजन आत्मभिव्यक्ति भर ही है।

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प्रेमचंद की स्मृति में: कहानी क्या होती है?

कहानी की और भी परिभाषाएँ उद्धृत की जा सकती हैं पर किसी भी साहित्यिक विधा को वैज्ञानिक परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता क्योंकि साहित्य में विज्ञान की सुनिश्चितता नहीं होती। इसलिए उसकी जो भी परिभाषा दी जाएगी वह अधूरी होगी।

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मराठी साहित्य में दलित अस्मिता के प्रकाश-स्तंभ

जब बाबूराव बागुल की आत्मकथा सबसे पहले उनकी मातृभाषा मराठी में प्रकाशित हुई थी तो उसने मराठी साहित्य और समाज को झकझोर दिया था। भारतीय समाज में जाति पर आधारित दमन और अपमान की साहसभरी कथा कहने कहने वाली यह पुस्तक अब एक क्लासिक मानी जाती है और दलित साहित्य में मील का पत्थर।

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नागार्जुन की कविता का भावलोक

जो लोग राजनीति और साहित्य में सुविधा के सहारे जीते हैं वे दुविधा की भाषा बोलते हैं। नागार्जुन की दृष्टि में कोई दुविधा नहीं है। यही कारण है कि खतरनाक सच साफ बोलने का वे खतरा उठाते हैं।

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