कार्ल मार्क्स के मुताबिक, कोई भी महान सामाजिक बदलाव बिना महिलाओं के उत्थान और भागीदारी के असंभव है। डॉ. बी. आर. आम्बेडकर ने भी इसी धारणा को अपने शब्दों में इस तरह व्यक्त किया था कि किसी भी समाज की विकास की अवस्था जानने के लिए उस समाज में महिलाओं की स्थिति देखनी चाहिए।
भारत में महिला आंदोलन आज़ादी के आंदोलन के साथ जुड़कर ही बड़ा हुआ। आज़ादी की लड़ाई में महिलाएँ अग्रिम दस्तों में शामिल रहीं। वे सशस्त्र विद्रोहों की भी हिस्सेदार बनीं और अहिंसक आंदोलनों की भी। इस लिहाज से 4 जून 2026 को भारतीय महिला फ़ेडरेशन (एनएफ़आईडब्ल्यू) का 72 वाँ स्थापना दिवस केवल एक संस्था या संगठन का ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय महिला आंदोलन के लिए एक महत्त्वपूर्ण परिघटना थी। यह एक मौक़ा था अपने संघर्षों और अपनी उपलब्धियों को याद करने का और उनका जश्न मनाने का, और साथ ही अभी तक जिन सवालों को हल नहीं किया जा सका, जो आने वाली चुनौतियाँ हैं, उनके लिए अपनी कमर कसने का भी। एनएफ़आईडब्ल्यू के 72वें स्थापना दिवस पर 4 जून 2026 को दिल्ली के राजेन्द्र भवन में लगभग आधे दिन तक चले केन्द्रीय इकाई के कार्यक्रम में शरीक होने का अवसर मुझे मिला और यह बहुत उम्मीद जगाने वाला तसलीबख्श अनुभव रहा।

कुल-मिलाकर सम्मेलन अच्छा रहा। उसकी रिपोर्ट मैं आगे देता हूँ लेकिन यह लेख मैं उस सम्मेलन की रिपोर्ट लिखने के बहाने एक अज़ीम शख्सियत से पाठकों को परिचित करवाने के लिए भी लिख रहा हूँ। पिछले दिनों हमने इप्टा की इंदौर टीम की तरफ़ से एक नाटक खेला – आज़ादी के तराने। यह महाराष्ट्र के चिमूर, उत्तर प्रदेश के बलिया और बंगाल के मिदनापुर में 1942 में घटित क्रांतिकारी घटनाओं पर आधारित था। उस नाटक को लिखते-लिखते इतिहास में दिलचस्पी बढ़ गई, और यह बात भी मन में बार-बार आती त्यही कि न केवल हमें सही इतिहास कभी जानने को ही नहीं मिला, बल्कि अब तो इंसानियत के इतिहास को बार-बार खुरच-खुरच कर मिटाने की साजिशें हो रही हैं। तो ऐसे मैं इस सम्मेलन के बहाने मैं एक ऐसी शख्सियत को दर्ज करना चाहता हूँ जो अपने वक़्त में बहुत लोकप्रिय थीं, बहादुरी की मिसाल थीं और सच में वामपंथी जीवन का सार थीं। उनके दौर के अन्य लोगों, जिनमें होमी दाजी, पेरिन दाजी आदि पर मैं लिख चुका हूँ। आज यह लेख एक और ऐसी ही शख्सियत पर लिख रहा हूँ जो कम से कम 20-25 वर्ष से अपने लिखे जाने की रह देख रहा था।
तो भारतीय महिला फ़ेडरेशन के 4 जून 2026 के कार्यक्रम का आग़ाज़ अपने विशिष्ट बेतकल्लुफ़ अंदाज़ में फ़ेडरेशन की राष्ट्रीय महासचिव निशा सिद्धू ने सबके स्वागत के साथ किया। निशा ने यह भी याद किया कि 4 जून ही कॉमरेड इंदु मेहता का भी जन्मदिन होता है जिनका योगदान आजादी के संघर्ष में भी रहा, और बाद में अविभाजित मध्य प्रदेश में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक शिक्षण विभाग में और एनएफआईडब्ल्यू के साथ-साथ अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो) और भारत-सोवियत मैत्री संघ (इस्कफ़) के साथ भी उन्होंने काम किया। मेरे लिए कॉमरेड इंदु मेहता का ज़िक़्र बहुत खास था। यह अतिशयोक्ति नहीं कि ग़ैर राजनीतिक जनांदोलनों से वामपंथी विचार की ओर मेरा झुकाव होने में कॉमरेड इंदु मेहता के जीवन को जानने की भी एक अहम भूमिका थी।
ग्वालियर, इंदौर और भोपाल के शासकीय डिग्री कॉलेज की प्रिन्सपल रहीं कॉमरेड इंदु मेहता कितनी सख्त और निडर थीं, उनके किस्से पुराने कॉमरेड सुनाते हैं और उनके विद्यार्थी रहे अनेक उम्रदराज लोग भी। नब्बे पार कर चुके भोपाल मेंन रह रहे वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया तो जब भी ज़िक़्र निकले, उनके भोपाल में महारानी लक्ष्मीबाई महाविद्यालय की प्राचार्य रहने के दौरान के अनेक किस्से सुनाते थे। एक क़िस्सा मुझे बहुत अच्छा लगता है – एक बार संजय गांधी को भोपाल आना था। किसी चाटुकार नौकरशाह सेक्रेटरी ने यह आदेश निकाल दिया कि संजय गांधी का स्वागत करने के लिए कॉलेज की लड़कियाँ एयरपोर्ट के नज़दीक सड़क के दोनों तरफ़ फूल लेकर खड़ी रहेंगी। जब यह आदेश मेहता मैडम के हाथ में पहुँचा तो उन्होंने ग़ुस्से में उस काग़ज़ को तोड़-मोड़कर रद्दी की टोकरी में डाल दिया। जब उनके कॉलेज से लड़कियाँ नहीं गईं तो उक्त अफ़सर ने ग़ुस्सा होकर चीफ़ सेक्रेटरी से उनकी शिकायत की। तब शायद ब्रह्म देव शर्मा चीफ़ सेक्रेटरी थे। उन्होंने उक्त अफ़सर को लताड़ लगाई और कहा कि तुमने ऐसा आदेश मेहता मैडम तक भेजने की हिमाकत कैसे की? वह नया अफ़सर सकपकाता सॉरी-सॉरी करता रहा। बाद में जब मेहता मैडम से पूछा कि उन्होंने सरकारी आदेश की क्या सोचकर अवहेलना की तो उन्होंने जवाब दिया – मैं किसी गुंडे के स्वागत में अपने कॉलेज की लड़कियों को हरगिज नहीं भेजूँगी।
एक क़िस्सा और वे यह भी सुनाते थे कि एक बार मेहता मैडम के घर चोरी हो गई और वे खुद तो कुछ पहनती नहीं थीं लेकिन घर में रखी एकाध सोने की चेन और कान की छोटी-मोटी बाली वगैरह चोरी हो गईं, तो उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट लिखवायी। फिर वे पुलिस थाने के लगभग रोज़ चक्कर लगाने लगीं कि क्या जाँच-पड़ताल हो रही है। पुलिस वाले भी सब मेहता मैडम को जानते थे तो उन्होंने कुछ दिन बाद उनके सामने जब्त किये गए जेवरों को एक पूरा डब्बा खोल दिया कि इसमें से जो आपके जेवर हैं, ले जाइए। समझदार को इशारा काफ़ी था लेकिन मेहता मैडम ने सब देखकर मना कर दिया कि नहीं, इनमें से कोई मेरा नहीं है। पुलिस वालों ने मैडम की ईमानदारी पर अपना सिर पीटा।

एक क़िस्सा तो तब का है जब मैं नईदुनिया में नौकरी करता था और शायद भानु चौबे या निर्मला भुराड़िया के सम्पादन में एक फीचर रविवार को निकलता था। तो एक रोज़, शिक्षक दिवस के दिन या इंदु मेहता के जन्मदिन के दिन लगभग एक-चौथाई अखबार के पेज पर किसी महिला की एक चिट्ठी प्रकाशित हुई जो शायद किसी स्कूल या कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रिन्सपल थीं । उन्होंने लिखा कि मैं जब कॉलेज के पहले या दूसरे साल में थी तभी मेरे घरवाले मेरे लिए किसी रिश्ते पर सहमत हो गए और फिर उन्होंने मेरा कॉलेज जाना भी बंद करवा दिया। जब कुछ दिनों तक मैं कॉलेज नहीं गई तो एक दिन शाम को मेहता मैडम मेरे घर आ गईं और मेरे मा-बाप को खूब डाँटा और समझाया कि पढ़ाई बीच में छुड़वाकर शादी नहीं करवा सकते आप। मेरे माँ-बाप भी समझ गए और फिर मैंने पढ़ाई पूरी की और पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया। बाद मे मैं लेक्चरर और प्रोफ़ेसर फिर प्रिन्सपल भी बनी। उन्होंने लिखा कि अगर मेहता मैडम न होतीं तो मेरी ज़िंदगी कैसी हुई होती, मै सोच भी नहीं सकती। और कमाल की बात यह कि उस पत्र के बाद अनेक पत्र और भी आये जिनमें मेहता मैडम ने किसी के माँ-बाप को और किसी के पति को समझाया था कि लड़कियों की पढ़ाई रोकें नहीं, उनके आसमाँ पर बंदिश न लगायें। और इस तरह मेहता मैडम यानि हमारी कॉमरेड इंदु मेहता जहाँ गईं, वहाँ ईमानदारी का, महिलाओं के हक़ का तो परचम उठाया ही लेकिन लोगों के दिमागों को साफ़ किया, ज़िंदगियाँ बदलीं। बस्तर से सीपीआई के दो बार सबसे युवा विधायक रहे कॉमरेड मनीष कुंजाम, इप्टा के पुराने कॉमरेड निसार अली, कॉमरेड पवन शर्मा हब भी मिलते हैं, कॉमरेड इंदु मेहता की याद होती कि वे उस वक़्त बस्तर के गाँवों में भी पार्टी क्लास लेने आया करती थीं इंदौर से।
उनके एक और काम के बारे में मोहन निमजे, राकेश दीवान, योगेश दीवान, ईश्वर सिंह दोस्त, छत्तीसगढ़ के पुराने कॉमरेड बताया करते थे कि वे पार्टी की पॉलिटिकल क्लास लेती थीं तब जो पढ़ाती थीं, वह तो मंत्रमुग्ध करने वाला होता ही था, लेकिन वे साथ ही नई दुनिया में पत्र संपादक के नाम लिखा करती थीं जिनकी भूमिका आमतौर पर अखबारों में छपने वाले पत्रों से कहीं बहुत व्यापक होती थी। कुछ 2-3 वर्ष तो उन्होंने लगभग हर सप्ताह या हर दूसरे-चौथे दिन पत्र लिखे । इन पत्रों में वे देश और विदेश के ज्वलंत मुद्दों पर लिखा करती थीं जिनको पढ़कर प्रदेश में दूरदराज़ रहने वाले कॉमरेड यह समझ जाते थे कि किस मुद्दे पर हमें वामपंथी नज़रिये से क्या करन चाहिए और कैसे आगे बढ़ना चाहिए। कुछ कॉमरेडों के पास तो उनके प्रकाशित पत्रों की अख़बारों की कतरनों की फ़ाइलें भी संभालकर रखी हुई थीं। बाद में नईदुनिया बिक गया और जो पुराने अख़बार थे, उन्हें नईदुनिया के पुराने मालिकान ने शहर से दूर एक गोदाम में रखवा दिया। जब हमने सोच कि कॉमरेड इंदु मेहता की नईदुनिया को लिखी हुई चिट्ठियों की किताब निकाली जाए तो उन्हें इकट्ठा करने की कोशिश की। तब कुछ पत्र उसमें ऐसे भी निकले जिसमें कॉमरेड इंदु मेहता ने अख़बार के संपादक की भी खिंचाई की थी। और उस वक़्त संपादक कौन् रहा होगा नईदुनिया का? शायद राजेन्द्र माथुर या राहुल बारपुते। मतलब बेशक कॉमरेड इंदु मेहता की काफ़ी इज़्ज़त थी लेकिन उस वक़्त अख़बार और संपादक भी ऐसे थे कि अपनी आलोचना भी छाप दिया करते थे।
इंदु मेहता की एक पहचान यह भी थी कि उन्होंने आज़ादी के पहले अँग्रेज़ों से छिपकर एक दिन होलकरों के राजवाड़े पर तिरंगा झण्डा फहरा दिया था। उसी दौर में उनकी दोस्ती होल्कर कॉलेज में उनके सहपाठी आनंद सिंह मेहता से हुई जो केमिस्ट्री से एमएससी कर रहे थे। अपने केमिस्ट्री के ज्ञान का उपयोग उन्होंने बम बनाने में किया। दोनों लोग क्रांतिकारी गतिविधियों में भी संलग्न हो गए। इंदु जी को पुलिस पकड़ने आयी तो पिता को समझाया कि बेटी को हद में रखो। इस पर उनके पिता ने जवाब दिया कि वह बड़ी हो गई है और अच्छा-बुरा समझती है। मैं उसे नहीं रोकूँगा। जो आपको करना है, वो आप कीजिए। बाद में उनकी बेटियों जया और कल्पना के साथ दोस्ती कायम हो जाने पर यह भी पारिवारिक बातें पता चलीं कि जब इंदु मेहता छोटी थीं तो उनके वजीफे के पैसों से घर चला करता था, इसलिए उनकी मजबूरी रहती थी कि हर बार उन्हें अव्वल आना ही रहता था नहीं तो घर के चूल्हे की आग पर बादल घिर आते थे। बचपन में परिवार की ज़िम्मेदारी और बड़े होने पर देश की – ऐसी थीं इंदु जी।
शादी के पहले वे इंदु पाटकर थीं। तो मराठी कुलीन परिवार में पैदा होने के कारण उन्हें बचपन से ही संगीत की शिक्षा भी दी जाती थी। उन्हें सिखाने के लिए जो एक संगीत शिक्षक रखे गए थे, वे बड़े शराबी थे, इसलिए उनका कोई आने का ठिकाना नहीं रहता था। इसीलिए उन्हें पैसे दिहाड़ी के हिसाब से दिए जाते थे। जिस दिन सिखाया, उस दिन का मेहनताना ले लिया। और एक बात जो मैंने जया से सुनी थी, वह यह कि एक बार उनके पड़ोसी ने इंदु पाटकर के पिता से एक रुपया या कुछ पैसे उधार लिए। अब पैसे वापस माँगने में इंदु के पिता को शर्म आये तो वे छोटी-सी इंदु को सिखा -पढ़ाकर भेज दें कि तुम जाकर उनसे पैसे वापस ले आओ। बच्ची इंदु जाए तो उससे भी कहते न बने। उधर पड़ोसी बच्ची को कुछ पकवान या मिठाई पकड़ा दें और प्यार से वापस भेज दें। इंदु को घर आकर पिता की डाँट सुननी पड़ती। एक दिन उसने पिता के खिलाफ बग़ावत कर दी कि आपको मांगना है तो आप माँगो, मैं पैसे वापस नहीं माँगूँगी।
मैं जब कॉमरेड इंदु मेहता से मिला, तब तक उनकी स्मृति पूरी तरह जा चुकी थी। वे किसी को नहीं पहचानती थीं। उसी अवस्था में उनके पति आनंद सिंह मेहता 1999 में गुज़र गए थे, उन्हें कुछ पता नहीं चला। बहरहाल, उस ज़माने में उन्होंने इंदु आनंद सिंह मेहता से अन्तर्जातीय शादी की, और शादी के बाद वे लोग छिपकर अन्य क्रांतिकारियों के साथ कोटा, मेरठ और अन्य ठिकानों पर रहे। क़रीब सन 2000 में, मैं और जया मेरठ का उनका वह घर भी देखने गए थे जहाँ वे रहा करते थे। उस वक़्त उन्हें जानने वाले कुछ लोग मेरठ में जीवित थे। आज़ादी के बाद वे लोग इंदौर वापस आ गए। इंदु मेहता संभवतः आज़ाद हिंदुस्तान में उस वक़्त के मध्य प्रदेश के महिला महाविद्यालय की पहली प्रिन्सपल बनीं और आनंद सिंह मेहता ने नगद में बिरला के कारखाने को अपनी सेवाएं डीन, लेकिन ज़्यादा समय वे वहाँ तिक नहीं सके और वापस इंदौर आ गए। इंदु मेहता भी आज़ाद भारत की सरकार से लड़ती-भिड़ती रहीं इसलिए बतौर सज़ा उनके तबादले भी भोपाल और ग्वालियर होते रहे लेकिन अंततः उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की कार्ड होल्डर बनना तय किया और 1972 में या 1975 में वे सीपीआई की सदस्य बन गईं। उसके पहले तक वे क़रीब 20-25 वर्ष राजनीति विज्ञान की प्रोफ़ेसर रह चुकी थीं, इसलिए उन्हें राजनीति के सवालों के जवाब देना कठिन नहीं था, लेकिन उस वक़्त कम्युनिस्ट पार्टी में सदस्यता आसान नहीं होती थी। बाक़ायदा परीक्षा होती थी, सो उन्होंने नौकरी छोड़ने के बाद छः महीने उस परीक्षा कि तैयारी की, मार्क्सवाद, लेनिनवाद, और तमाम दुनिया का अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक इतिहास पढ़ा, नोट्स बनाये, परीक्षा पास की और तब वे सीपीआई की सदस्य बनीं। कॉमरेड पेरिन दाजी हमेशा कहती थीं कि इंदु बहुत बुद्धिमान और तेज थी। उसे ग़ुस्सा भी जल्दी आता था।
मेरे लिए इंदु मेहता के जीवन को जानना अनेक तरह से प्रेरणा बना। उन पर विस्तार से पूरी किताब ही लिखना चाहिए। अब वे लोग भी कम होते जा रहे हैं जो कभी उनके संपर्क में रहे या नज़दीक रहे। तो भारतीय महिला फ़ेडरेशन की मौजूदा महासचिव निशा ने कॉमरेड इंदु मेहता का ज़िक़्र करके मुझसे इतना सब लिखवा लिया। अभी उन पर और लिखने का मन है। बहरहाल, वापस आते हैं 4 जून 2026 पर।
कार्यक्रम की शुरुआत हुई विभिन्न महिला आंदोलनकारियों और विद्वानों की एक पैनल चर्चा से जिसका विषय था – “राजनीतिक अधिकारों के लिए हमारा संघर्ष: उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ”। इस पैनल की अध्यक्षता का कार्यभार सौंपा गया डॉ. सैयदा हमीद को। एनएफ़आईडब्ल्यू की राष्ट्रीय अध्यक्ष, देश की जानी-मानी अदीब और योजना आयोग तथा राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य रह चुकीं लेखिका, इतिहासकार और सांस्कृतिक आंदोलनकारी डॉ. सैयदा हमीद ने चर्चा की शुरुआत अपने शायराना अंदाज़ में की और फ़ैज़, साहिर और कैफ़ी आज़मी की नज़मों के उन मोतियों को पेश किया जिसमें औरत के हक़ को दुनिया की सलामती के लिए जरूरी शै माना गया है।
पैनल चर्चा में शामिल थीं मानव अधिकारों के विषय पर सक्रिय टाइम्स ऑफ़ इंडिया एवं इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ी रहीं वरिष्ठ पत्रकार पामेला फिलिपोस जो फ़िलहाल दि वायर के संपादन से जुड़ी हुईं हैं, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और लेखक एस. एन. साहू जिन्होंने पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन के विशेष कर्तव्य अधिकारी की भूमिका निभायी है, गाँधीजी और स्वतंत्रता संघर्ष पर पुस्तकें लिखीं हैं और “न्याय व कानून के फ़र्क़” पर कानून के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में पढ़ाया है। शबनम हाशमी देश में विशेषकर महिलाओं, और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला एक प्रमुख नाम है लेकिन साथ ही जिसने हर ऐसे मोर्चे में अपनी मौजूदगी दर्ज की है जो किसी के भी अधिकारों का हनन करता हो चाहे वे आदिवासी हों या दलित। पैनल में अन्य प्रमुख वक्ता थीं कॉमरेड ऐनी राजा जो भारतीय महिला फ़ेडरेशन की पूर्व महासचिव होने के साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मौजूदा राष्ट्रीय सचिव मण्डल सदस्य हैं, जिन्होंने आदिवासियों का विस्थापन हो या शहरी ग़रीबों का, सरकार के ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठायी और सत्ता के प्रहार अपने शरीर पर भी झेले । कश्मीर से लेकर मणिपुर और दक्षिण भारत तक पीड़ित समुदायों और व्यक्तियों के साथ उनके संघर्ष में शामिल होने वाली ऐनी राजा न केवल नरेगा कानून बनवाने के अभियान में प्रमुखता से शामिल रहीं बल्कि महिलाओं के राजनीतिक 33 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे को ज़ोर-शोर से जींद रखने के पीछे भी उनका लगातार प्रयास रहा है, वर्ना तो यह पितृसत्तात्मक राजनीति इस मुद्दे को कब से दबाये बैठी है।
सभी वक्ताओं ने अपने वक्तव्यों में एनएफ़आईडब्ल्यू को इस 72 वर्ष लंबी संघर्षों और उपलब्धियों से भरी लंबी यात्रा के लिए बधाई दी और कहा कि महिलाओं के लिए अधिकार प्राप्ति के संघर्ष का रास्ता अभी बहुत लंबा है। शबनम हाशमी ने कहा कि मौजूदा सांप्रदायिक और पूँजीवादी सरकार के चलते महिलाओं के जो अधिकार किस महिला अ ने संघर्षों से हासिल किये थे, वह भी छीनने की साज़िश की जा रही है। ऐसे में अलग-अलग संगठनों और संस्थाओं को अपनी मत-भिन्नताओं को भुलाकर एक व्यापक और मज़बूत संघर्ष खड़ा करना जरूरी है। इसी तरह उन साथियों की महिला मुद्दों पर समझ बढ़ाना भी ज़रूरी है जो पुरुष हैं और अन्य समान विचार वाले संगठनों में काम करते हैं। महिला संगठनों को भी श्रम कानूनों में हो रहे बदलावों तथा बंद किये जा रहे स्कूलों के खिलाफ़ लड़ाई खड़ी करनी चाहिए क्योंकि इन सभी का असर महिलाओं पर खराब पड़ेगा।
एस. एन. साहू ने नेहरू युग में महिलाओं के सवालों पर बातचीत को याद किया और बताया कि उस वक़्त महिला फ़ेडरेशन की नेत्रियाँ किस बेबाकी से प्रधानमंत्री से अपने विचार साझा करती थीं। यह इतिहास लोगों को जानना जरूरी है। पामेला फ़िलिपोस ने इस बात को एक बहुत सकारात्मक संकेत माना कि एनएफ़आईडब्ल्यू अपने रास्ते पर आगे बढ़ता जा रहा है।
पैनल की अंतिम वक्ता ऐनी राजा ने कहा कि हाल में सरकार ने जो कहर मज़दूर आंदोलन पर बरपाया है, उसका भी सीधा असर महिला मजदूरों और मजदूर परिवारों की महिलाओं पर बहुत बुरा पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि भारतीय महिला फ़ेडरेशन अनेक दशकों से भारतीय राजनीति में महिलाओं के सही प्रतिनिधित्व की माँग को उठाता आ रहा है। भारतीय संसद की अत्यंत प्रमुख वामपंथी संसद कॉमरेड गीता मुखर्जी ने संसद और अन्य राजनीतिक प्रतिनिधित्व वाली संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का विधेयक मूल रूप से ड्राफ्ट किया था और उन्होंने व रेणु चक्रवर्ती ने पितृसत्ता और पुरुष प्रधानता वाले भारतीय समाज में महिलाओं के हक की अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं थीं। यही नहीं, इन नेत्रियों ने विश्व के महिला आंदोलन के साथ जुड़कर अन्य देशों की महिलाओं के और सभी मेहनतकशों के हक़ में भी भरपूर आवाज़ उठायी। ऐनी राजा ने महिलाओं के अधिकारों को मज़दूरों और मेहनतकशों के सम्पूर्ण अधिकारों की लड़ाई के साथ जोड़कर लड़ने और आगे बढ़ाने की बात की। अपने जोशीले भाषण में सभी क्षेत्रों में महिलाओं के संघर्षों को याद करते हुए महिलाओं की एकता, अधिकार और इन्क़लाब ज़िन्दाबाद जैसे नारे बुलंद किये। सभागृह में मौजूद युवा कॉमरेड अपराजिता ने नारों को आगे बढ़ाते हुए सभी उपस्थितों को जोश से भर दिया।
इस वैचारिक सत्र के समापन तक आते-आते दर्शक दीर्घा में सीपीआई महासचिव कॉमरेड डी. राजा, राष्ट्रीय सचिव मण्डल सदस्य कॉमरेड प्रकाश बाबू, कॉमरेड रामकृष्ण पांडा और सीपीआई (एम) की पॉलिट ब्यूरो सदस्य कॉमरेड सुभाषिणी अली और जनवादी महिला समिति की कॉमरेड मैमूना मुल्ला भी आ चुकीं थीं। सभी वक्ताओं तथा अन्य विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में स्थापना दिवस स्मारिका का भी लोकार्पण किया गया। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विशेष रूप से चेन्नई से डॉक्टर शांति, जयपुर से मीनाक्षी और देश के अन्य स्थानों से अलग-अलग महिला नेत्रियाँ आयी हुईं थीं। एनएफ़आईडब्ल्यू की उपाध्यक्ष अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता, वैज्ञानिक डॉ. कोनिनिका रे, इंडो-पैलेस्टिन सॉलिडेरिटी नेटवर्क की डॉ. जॉय्शिया थोरात, पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फ्रेंडशिप फ़ेडरेशन से विजयन और एविटा और इन सबके साथ ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन, इप्टा, प्रगतिशील लेखक संघ, ऑल इंडिया यूथ फ़ेडरेशन आदि संगठनों के प्रतिनिधि एकजुटता में शामिल हुए। महासचिव निशा सिद्धू ने सभी का नाम उल्लेख कर सबका स्वागत किया।
इस सत्र के बाद एक छोटा-सा अवकाश देकर सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुआ। सुप्रिया चोटानी ने फ़ैज़ की नज़्में पेश कीं। मशहूर गायिका रेने सिंह और नाट्य कलाकार लोकेश जैन ने सारंगी, तबला और हारमोनियम पर साज़िंदों के साथ अमीर खुसरो से लेकर ग़ालिब से होते हुए अनेक सूफ़ी और इंक़लाबी तराने पेश किये जिसने दिल्ली और हिंदुस्तान की मिलीजुली संस्कृति की एक खूबसूरत बानगी पेश की। इन पेशेवर कलाकारों द्वारा पेश की गईं नफ़ीस प्रस्तुतियों के बाद बालिगा ट्रस्ट की ओर से जन नाट्य कलाकार राजेन्द्र के निर्देशन में गीता, पूजा, नेहा, अमिता,नाजमीन और सोनिया ने गीत प्रस्तुत किये – “जागो री तुम बहनों,अब जागो री” और “दरिया की कसम, मौजों की कसम ये ताना-बाना बदलेगा” उनकी तैयारी और उनका असर भी उससे कम नहीं था जो पहले के सत्र में मँझे हुए कलाकारों ने पेश किया था। कार्यक्रम का अंत हुआ इप्टा और एनएफ़आईडब्ल्यू, दोनों से जुड़ीं दीप्ति जी के निर्देशन में तैयार किये गए दिल्ली एनसीआर समूह के ग्यारहवीं कक्ष के बच्चों द्वारा युवाओं में फैलती नशे की लत के खिलाफ़ तैयार किये गए एक नाटक से। कम संसाधनों के बावजूद नाटक में बच्चों ने अपनी अभिनय क्षमता की झलक दिखलाने में कामयाबी पाई।
पिछले वर्ष यह कार्यक्रम फ़लस्तीन के लोगों को समर्पित किया गया था। इस बार भी अपने समापन संबोधन में निशा सिद्धू ने युद्ध के खिलाफ़ एनएफ़आईडब्ल्यू की प्रतिबद्धता को दोहराया। समारोह के समापन पर एनएफ़आईडब्ल्यू की राष्ट्रीय सचिव अरुणा सिन्हा ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

