ऐलानाबाद : किसान आंदोलन के प्रति जनता में कायम विरोधाभासों का संकेत है भाजपा का प्रदर्शन

किसान अन्दोलन के कारण अनुकूल परिस्थितियों में अभय चौटाला की जीत अपेक्षित थी, लेकिन भाजपा प्रत्याशी गोविन्द कांडा को जितने मत प्राप्त हुए उनसे साफ होता है कि किसान बहुल क्षेत्र में भाजपा की पैठ कितनी गहरी हो चुकी है और कृषि कानूनों के प्रति जनता कितने विरोधाभासों में है।

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COP26: जलवायु के दुश्मन धरती को बचने देंगे?

हाल ही में एक थिंक टैंक “काउंसिल फार इनर्जी, इन्वायरमेंट एण्ड वाटर” (SEEW) ने मोदी सरकार को अपील की कि वह 2050 मे नेट जीरो स्वीकार नहीं करे। इसे 2070 तक टाल दिया जाये। मोदीजी ने इसे स्वीकार कर लिया और ग्लासगो मे घोषणा कर दी कि भारत 2070 में नेट जीरो जारी करेगा।

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‘न्यू-इंडिया’ का तिलिस्म और गाँधी का ग्राम-स्वराज

राष्ट्र निर्माण के लिए गाँधी ने ग्राम केन्द्रित नीतियों को प्राथमिकताओं देने की बात की थी, लेकिन अतीत में झांकें तो हम देखते हैं उनके आर्थिक-विचारों को सरकारी नीतियों में उतारने की पहल पहले भी ठीक से नहीं की गयी। नेहरू और आंबेडकर ने भी गाँधी के आर्थिक विचारों को पिछड़ा हुआ माना और आजाद भारत के लिए नगर केन्द्रित औद्योगिक विकास का मॉडल तैयार किया। नेहरू ने गाँव को पिछड़े और अंधविश्वास में मगन एक जनसमुदाय के रूप में देखा तो वहीं आंबेडकर ने इसे जातीय दुष्‍चक्र में धंसी दमनकारी इकाई से अधिक कुछ भी नहीं माना।

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कुपोषण से भुखमरी की ओर बढ़ता ‘न्यू इंडिया’!

वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम ने जून 2021 में कहा है कि भारत में कोविड-19 के कारण भूख और गरीबी का संकट भयावह रूप ले रहा है। वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम का सुझाव है कि तात्कालिक खाद्य आवश्यकता की पूर्ति और जीवनयापन के अवसर उपलब्ध कराना दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

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क्रिकेट की बदलती रीत या कॉर्पोरेट की पिच पर राष्ट्रवाद की जीत?

पाकिस्तान की जीत पर भारत में पहले भी पटाखे फूटते रहे हैं और जब हम पाते हैं कि दो राष्ट्र का बंटवारा होने के बावजूद एक दूसरे की रिश्तेदारी आज भी दोनों देशों में है और धर्म के नाम पर राजनीति करना, उनको बरगलाना और अपनी सियासी रोटियां सेंकना- यह सब आजादी के बाद से ही लगातार होता आया है तो हमें कोई आश्चर्य नहीं लगता।

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जाति और रसूख के हिसाब से न्याय और मुआवजे का ‘राम राज्य’!

पहले जिन्हें थाने से न्याय नहीं मिलता था उसे एसपी कार्यालय से उम्मीद होती थी। ब्लॉक से न्याय नहीं मिल पाता था तो तहसील और जिला अधिकारी कार्यालय से उम्मीद रहती थी लेकिन अब पीड़ितों के सामने इस बात का भी संकट है कि ऐसे अधिकारियों के रहते वह न्याय पाने के लिए जाएं तो कहां जाएं?

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विश्व-गुरु बनने के दावों के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों का सैन्यकरण

राजनीतिक संस्थाओं ने संसद में मूल्यों के क्षरण पर तो कोई नियम या कानून नहीं बनाया, लेकिन उसने मान लिया कि शिक्षण संस्थानों में ही मूल्यों और संस्कारों की कमी हो गयी है।

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कश्मीर: हिंसा की राजनीति जितनी ही घातक है हिंसा पर राजनीति

कश्मीर में भारत विरोधी नारे लग रहे हैं और भारत में कश्मीर के खिलाफ नारेबाजी हो रही है। देश में कश्मीरियों को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, इधर कश्मीरी अपने हमवतन लोगों की नीयत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।

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चालीस प्रतिशत महिला प्रत्याशी का फैसला यदि ‘राजनीति’ है, तो यही अच्छी और खालिस राजनीति है!

जिस प्रदेश में आज तक कमोबेश श्मशान-कब्रिस्तान, धर्म और जाति जैसे जहरीले मुद्दों पर चुनाव लड़ा गया वहां इस तरह की क़वायद एक बड़ी उम्मीद लेकर आती दिख रही है। ऐसा नहीं है कि इस फैसले से सब अच्छा हो गया है, लेकिन यह फैसला एक बुनियादी गैर-बराबरी को पाटने की तरफ बढ़ाया गया उम्मीद भरा कदम है जिसका चतुर्दिक स्वागत होना चाहिए।

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पुस्तक अंश: द्विराष्ट्र के सिद्धांत के जनक कौन- जिन्ना या सावरकर?

जब ऐतिहासिक तथ्यों का अध्ययन किया जाता है तब हमें यह ज्ञात होता है कि श्री सावरकर किसी विचारधारा विशेष के जनक अवश्य हो सकते हैं किंतु भारतीय स्वाधीनता संग्राम के किसी उज्ज्वल एवं निर्विवाद सितारे के रूप में उन्हें प्रस्तुत करने के लिए कल्पना, अर्धसत्यों तथा असत्यों का कोई ऐसा कॉकटेल ही बनाया जा सकता है जो नशीला भी होगा और नुकसानदेह भी।

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