जातिगत भेदभाव का शिकार जेलों में पिसते दलित और पिछड़े वर्ग के कैदी

जिन मामलों में गिरफ्तारी किये बिना छानबीन पूरी हो सकती हो वहां आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों में भी यही हिदायत दी गयी थी।

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किसान अन्दोलन का एक साल: प्राप्तियों का मूल्यांकन

संयुक्त किसान मोर्चा एक बड़ी ताकत के रूप में उभरा है जिसका राजनीतिक दल अभी मूल्यांकन नहीं कर पा रहे हैं। किसान अन्दोलन ने जहां एक ओर जनता को उनकी ताकत का अहसास करवा दिया है तो दूसरी ओर सत्‍ता की जवाबदेही को भी सुनिश्चित कर दिया है।

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नये श्रम कानूनों के खिलाफ मजदूरों की आवाज क्या सरकार के कान में पड़ रही है?

हरियाणा श्रम मसौदा 2021 जो कायदे से अक्टूबर 2021 में लागू होना चाहिए था पर कुछ माह रुक कर उसे पूरे राज्य में लागू कर दिया जाएगा। सरकार ने मसौदा पेश करते हुए कहा कि इससे मजदूरों के हितों की रक्षा होगी, वे ज्यादा कमाई कर सकेंगे, उनका रोजगार सुरक्षित होगा। कुल मिलाकर वही झुनझुने बजाए जा रहे हैं जो कृषि कानून लाते समय बजाए गए थे। दिक्कत ये है कि जब से मसौदे की बारीकियां श्रमिकों के कानों में पड़नी शुरू हुई हैं तब से बस विरोध हो रहा है।

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मूल्य आधारित पत्रकारिता की पांच दशक से बह रही ‘बयार’ में ठिठका एक अपार दुख

पता नहीं बयार कार्यालय की भौतिक रूप से टिमटिमाती रोशनी से उपजता पवित्र, आत्मीय और आत्मिक उजियारा अब हमारा पथ प्रदर्शन करेगा या नहीं। शोक संतप्त सुभाष भैया अपने जीर्ण शरीर और विदीर्ण हृदय के साथ “बयार” की यात्रा को अनवरत रख पाएंगे या नहीं।

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किसान आंदोलन गवाह है कि गांधीजी की अहिंसा ही इस देश में सबसे कारगर और उपयोगी रास्ता है!

जब हम लोग गांधी के रास्ते पर ही चल सकते हैं तो हमें इस बात को खुलकर स्वीकार करना चाहिए। जब हम जान रहे हैं कि गोली चला कर या बम फेंककर अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुआ जा सकता, सिर्फ शहीद हुआ जा सकता है, तो फिर हमें यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी का रास्ता बाकी के लोगों के रास्ते से ज्यादा कारगर और उपयोगी था।

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बीते एक साल में 91 फीसद बढ़ गयी गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की तादाद, बिहार और गुजरात अव्वल

कुपोषण पर ताजा सरकारी आंकड़े दिखा रहे हैं कि भारत में कुपोषण का संकट और गहरा गया है। इन आंकड़ों के मुताबिक भारत में इस समय 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से आधे से ज्यादा यानी कि 17.7 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे सबसे ज्यादा महाराष्ट्र, बिहार और गुजरात में हैं।

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क्या देश का लोकतंत्र राजनैतिक दलों के हाथों में सुरक्षित है?

? क्या हमारे शासक इतने कमजोर हैं कि कोई व्यक्ति कानून और संविधान को चुनौती देता हुआ कभी विधानसभा, कभी मीडिया के दफ्तरों और कभी सड़कों पर आतंक बरपाता फिरे और हम अपनी वाचिक कुशलता से ही काम चला लें। क्या ये मामले सिर्फ निंदा या कड़ी भत्सर्ना से ही बंद हो सकते हैं।

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त्रिपुरा: सोशल मीडिया के दौर में सांप्रदायिकता के नये प्रयोग

त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने उनाकोटी एवं सिपाहीजाला जिलों में हुई हिंसा पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य द्वारा उठाये गए निवारक उपायों की जानकारी चाही है और राज्य सरकार से पूछा है कि सांप्रदायिक उन्माद भड़काने की साजिश को असफल बनाने के लिए सरकार की क्या कार्य योजना है?

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किसानों और खेतिहर मजदूरों की खुदकुशी: पंजाब की जमीनी हकीकत बनाम सरकारी आँकड़े

हर दिन 2500 किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। अब तीन नये कृषि कानूनों के चलते बड़े किसान भी खेती से बाहर हो जाएंगे। इस तरह किसानों को खेती से अलगाव में डालने की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और कॉरपोरेट सेक्‍टर का रास्‍ता आसान हो जाएगा।

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ऐलानाबाद : किसान आंदोलन के प्रति जनता में कायम विरोधाभासों का संकेत है भाजपा का प्रदर्शन

किसान अन्दोलन के कारण अनुकूल परिस्थितियों में अभय चौटाला की जीत अपेक्षित थी, लेकिन भाजपा प्रत्याशी गोविन्द कांडा को जितने मत प्राप्त हुए उनसे साफ होता है कि किसान बहुल क्षेत्र में भाजपा की पैठ कितनी गहरी हो चुकी है और कृषि कानूनों के प्रति जनता कितने विरोधाभासों में है।

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