गरीबी सिर्फ आर्थिक नहीं, सोशल जस्टिस का भी मसला है!

अगर सीधे कहा जाए तो यही कि ग़रीबी एक ऐसा जाल है जो खुद को ही दोबारा रिप्रोड्यूस करता रहता है। कहना बस यही है कि इकोनॉमिक डेवलपमेंट या GDP का बढ़ना ही ग़रीबी को ख़त्म नहीं कर सकता।

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UP : सरकारी स्कूलों का विलय कहीं शिक्षा का विसर्जन ना साबित हो जाए!

यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, यह हमारे बच्चों की नियति से जुड़ा निर्णय है। जिस दिन गाँव के बच्चे शिक्षा से वंचित रह गए, उस दिन शहर की दीवारें भी नहीं बचेंगी। शिक्षा सबका हक है, न कि केवल उस बच्चे का जो कॉन्वेंट स्कूल जाता है।

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चालीस प्रतिशत महिला प्रत्याशी का फैसला यदि ‘राजनीति’ है, तो यही अच्छी और खालिस राजनीति है!

जिस प्रदेश में आज तक कमोबेश श्मशान-कब्रिस्तान, धर्म और जाति जैसे जहरीले मुद्दों पर चुनाव लड़ा गया वहां इस तरह की क़वायद एक बड़ी उम्मीद लेकर आती दिख रही है। ऐसा नहीं है कि इस फैसले से सब अच्छा हो गया है, लेकिन यह फैसला एक बुनियादी गैर-बराबरी को पाटने की तरफ बढ़ाया गया उम्मीद भरा कदम है जिसका चतुर्दिक स्वागत होना चाहिए।

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नित वेश बदलती महामारी और टीकाकरण की चुनौती: बिहार के कुछ ज़मीनी अनुभव

कोरोना बीमारी के साथ ही साथ सरकारों को ‘अफवाह की महामारी’ से भी लड़ना पड़ेगा। संचार के सशक्त होते माध्यमों से नागरिक आवाज़ों को जरूर बल मिला, लेकिन उसके साथ ही दबे पाँव उन समस्याओं का भी आगमन हुआ है जिनसे हम सब लड़ रहे हैं।

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लंगुराही और पंचरुखिया: यहां के लोग नहीं जानते उनका मुख्यमंत्री कौन है!

रास्ते में हमें टाटा नमक और चिप्स के खाली पैकेट कहीं कहीं जरूर पड़े मिले जिसे देखकर मन में यही बात घूमने लगी कि इसे कॉरपोरेट का दम कहें या सरकार की नाकामी कि आज़ादी के इतने साल बाद भी जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली नहीं पहुंच पायी, बिजली नहीं पहुंच पायी, वहां जाने के रास्ते में चिप्स के पैकेट और नमक के पैकेट जरूर पहुंच गये।

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