बिजॉय दिबोश: अदावतें थीं तग़ाफ़ुल था रंजिशें थीं बहुत, बिछड़ने वाले में सब कुछ था बेवफ़ाई न थी…

इस ग़ज़ल को सबसे पहले संभवतः आबिदा परवीन ने ही गया था जो कि नसीर के मोहल्ले में रहती थीं और उनके नसीर से अच्छे ताल्लुकात थे। लेकिन यह ग़ज़ल लोगों, खास कर पाकिस्तानी अवाम की ज़बान पर तब चढ़ी जब यह मशहूर पाकिस्तानी टीवी ड्रामा हमसफ़र का टाइटल साउंड ट्रैक बना।

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टंकी पर चढ़ी लखनऊ की शिखा पाल बनाम पहाड़ पर चढ़ी बेरोजगारी

भारत की बेरोजगारी अथवा अर्द्धबेरोजगारी की समस्या का हल यह है कि रोजगार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जाए। अमीर-गरीब के अंतर को कम करना पड़ेगा। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारा एक पूंजीपति मुकेश अंबानी तो दुनिया के दस सबसे अमीर लोगों में शामिल हो जाए और आधी आबादी इतनी गरीबी में जीने को मजबूर हो कि अपने बच्चों का कुपोषण भी दूर न कर सके।

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गुणवत्तापरक शिक्षा तथा मानवाधिकार का सवाल और हमारी जिम्मेदारी

जिन मानवाधिकारों की कल्पना विश्व समुदाय द्वारा की गयी है उसका मूल आधार ही गुणवत्तापरक शिक्षा है और इसके अभाव में एक सशक्त स्वतंत्र जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में गिरावट आती है जिसका प्रभाव कालान्तर में राष्ट्रीय स्तर पर परिलक्षित होता है। गुणवत्तापरक शिक्षा के अभाव का सबसे ज़्यादा असर गरीबी में जीवनयापन करने वाले लोगों पर ही पड़ रहा है जो सीधे सीधे उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

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आइडेंटिटी और विकृत माडर्निटी से उपजे संकट के तीन ताज़ा उदाहरण

एक समाज के तौर पर या उसके प्रातिनिधिक सैंपल के तौर पर लालू के परिवार से ताकतवर, धनी और सामाजिक तौर पर सशक्त परिवार से बड़ा उदाहरण क्या होगा, प्रियंका वाड्रा से सशक्त व्यक्ति कौन होगा, लेकिन ये दोनों भी जब बढ़कर चुनाव करते हैं तो हिंदुत्व को गाली देने के तमाम आयामों के बावजूद मिसेज वाड्रा फिर से उसी हिंदुत्व की शरण जाती हैं, यहां तक कि ये भी कहती हैं कि वह 17 वर्ष की अवस्था से व्रत रख रही हैं और उन्हें किसी योगी आदित्यनाथ के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं। तेजस्वी यादव जब प्रेम-विवाह करते हैं तो एक उदाहरण तो पेश करते हैं युवाओं के सामने, अंतर्धार्मिक विवाह कर,लेकिन फिर ढाक के तीन पात। वह रेचल को न केवल हिंदू बनाते हैं, बल्कि यादव ही बनाते हैं।

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गोवा: चौपट धंधा, सूने पड़े बीच और ओमिक्रॉन के साये में चुनावी पर्यटकों के सियासी करतब

खूबसूरत समुद्री किनारोंवाला गोवा सभी को लुभाता है लेकिन कोरोना की कसक के बीच खराब आर्थिक हालात से लोग हैरान हैं। धंधा चौपट है, फिर भी चुनाव तो होना ही है, सो दुष्कर हालात में भी गोवा अपनी राजनीति के नये प्रतिमान गढ़ने की तरफ बढ़ रहा है।

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मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के अचानक उमड़े आदिवासी प्रेम के पीछे क्या मामला है?

मनावर से कांग्रेस विधायक और जसय के संस्थापक हीरालाल अलावा के अनुसार राज्य सरकार ने औपचारिकता के नाते जनप्रतिनिधियों से पेसा नियम पर सुझाव और आपत्तियां बुलायी तो थीं मगर उन्हें शामिल नहीं किया गया। भाजपा के आदिवासियों पर अचानक उमड़े प्रेम को वे राजनीति से प्रेरित बतलाते हैं।

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संविधान दिवस की गूंज और लोकतंत्र को कमजोर करने के सुनियोजित प्रयास

संवैधानिक प्रजातंत्रों पर संकट विश्वव्यापी है- ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, पोलैंड, हंगरी, तुर्की और इजराइल इसके उदाहरण हैं, लेकिन इन देशों की तरह हमारे देश में न तो आपातकाल लगा है न ही सेना सड़कों पर गश्त कर रही है, न ही नागरिक अधिकारों को निलंबित रखा गया है बावजूद इसके हमारे संवैधानिक प्रजातंत्र पर संकट है।

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संविधान पर चल रहे विमर्श के निहितार्थ

क्या संविधान से हमें कुछ हासिल नहीं हुआ? जब हमारे साथ स्वतंत्र हुए देशों में लोकतंत्र असफल एवं अल्पस्थायी सिद्ध हुआ और हमारे लोकतंत्र ने सात दशकों की सफल यात्रा पूरी कर ली है तो इस कामयाबी के पीछे हमारे संविधान के उदार एवं समावेशी स्वरूप की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।

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हर जनसंहार दास्तान-ए-लापता है! भोपाल गैस कांड की याद में एक कविता, एक शिल्प

2-3 दिसंबर, 1984 को घटित इस जघन्य कांड के पचीसवें वर्ष प्रकाश चन्द्रायन ने ‘राष्ट्रीय स्मृतिलोप’ शीर्षक से लंबी कविता रची और गोपाल नायडू ने एक मूर्तिशिल्प ‘भोपाल गैस काण्ड’ शीर्षक से रचा था। कविता 2017 में जारी हुई।

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जातिगत भेदभाव का शिकार जेलों में पिसते दलित और पिछड़े वर्ग के कैदी

जिन मामलों में गिरफ्तारी किये बिना छानबीन पूरी हो सकती हो वहां आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों में भी यही हिदायत दी गयी थी।

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