भाषा-चर्चा: तकनीक की ‘अंधाधुन’ गोलीबारी में टूटता हिंदी का संयुक्त परिवार

जिस तरह एकल परिवारों की वजह से चाचा-चाची, मौसा-मौसी, फुआ-फूफा जैसे रिश्ते सिमटते गए और एक ‘अंकल’ और ‘आंटी’ में समा गए, उसी तरह विष, ज़हर, हलाहल आदि का भी समायोजन एक ‘प्वाइज़न’ में हो गया। हम हिंदी वाले अब ‘कज़न ब्रदर’ या ‘कज़न सिस्टर’ का प्रयोग करते हैं।

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विसर्ग के अनैतिक संसर्ग में फंसे बनारस के बहाने हिन्दी के कुछ सबक

किसी भी भाषा का मूल तो स्वर यानी ध्वनि ही है। हिंदी में यह अधिक है, तो यह उसकी शक्ति है, लेकिन इसे ही यह हटा रहे हैं। कई भाषाओं में कम ध्वनियां हैं तो उन्हें आयातित करना पड़ा है और यह बात अकादमिक स्तरों पर भी मानी गयी है। कामताप्रसाद गुरु ने भी अपनी किताब ‘हिंदी व्याकरण’ में इसी बात पर मुहर लगायी है कि हिंदी मूलत: ध्वनि का ही विज्ञान है।

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दक्षिणावर्त: जिसकी जितनी लहान, उसकी वैसी ज़बान!

पत्रकारिता और चुनौती- ये दो शब्द एक साथ सुनते ही कुछ हुड़कहुल्लू फासीवाद, मोदी, भगवा आतंक, आपातकाल इत्यादि का जाप करने लगते हैं, जैसे उन्हें दौरा पड़ गया हो। जरूरत उन असली चुनौतियों पर बात करने की है जो न्यूजरूम के अंदर और बाहर, किसी मीडिया कंपनी के कारिंदे के तौर पर या स्वतंत्र पत्रकार होने के नाते, युवा तुर्क और अनुभवी धैर्यवान पत्रकारों को झेलना पड़ता है।

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दक्षिणावर्त: थोपी गयी महानताएं और खंडित बचपन के अंतर्द्वंद्व

एक तरफ तो तालिबानी शासन से मुक्ति, जिस दौरान गुल-मकई के छद्म नाम से लिखकर मलाला प्रख्यात हुईं, दूसरी तरफ इंग्लैंड का खुलापन और तीसरी तरफ इस्लाम का शिकंजा, जहां तयशुदा नियमों और संहिता के अलावा कुछ भी बोलना शिर्क है, गुनाह-ए-अज़ीम है। हो सकता है कि मलाला ने शादी के विषय में खुलकर बोल दिया हो, वह पश्चिम के खुलेपन से प्रेरित रही हों, लेकिन वह अपने देश की ‘कल्चरल एंबैसडर’ भी तो हैं और इसीलिए हिजाब, इसीलिए उनके पिता की सफाई, आदि!

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दक्षिणावर्त: हिंदी का एक लेखक क्या, किसके लिए और क्यों लिखे? साल भर के कुछ निजी सबक

लेखन एक तपस्या है, जिसमें आपका हृदय और मस्तिष्क समिधा बनते हैं। यह कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है। न ही, यह अंशकालिक काम है। अगर आप लेखन को अपना सर्वस्व समर्पित नहीं कर चुके हैं, तो फिर वह लेखन भी आपको पूर्ण-काम नहीं बनाएगा। बहसें भले ही आप कितनी करते रहें।

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दक्षिणावर्त: शायद तुम्हारी उपस्थिति है वाहियात तुम्हारी अनुपस्थिति से…

होश का पैमाना किसे बनाओगे, कैसे बनाओगे और इन सबसे बढ़कर क्यों बनाओगे? क्या तुम जॉन नैश के उस होश को पैमाना बनाओगे, जिसने नोबल प्राइज जीत लेने लायक थियरी दी, लेकिन वह तो उस समय पागलपन के दौरे में था? क्या तुम गांधी के उस होश को पैमाना बनाओगे, जब देश जश्न-ए-आजादी मना रहा था और वह बूढ़ा नोआखाली घूम रहा था? तुम्हारा होश, मेरे होश का निकष क्यों हो, या वाइसे-वर्सा ही। मैं एक मनुष्य हूं, तुम एक मनुष्य तो हम-तुम एक-दूसरे को अपने हाल पर क्यों न छोड़ दें?

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दक्षिणावर्त: क़त्ल पर जिन को एतराज़ न था, दफ़्न होने को क्यूं नहीं तैयार…

दरक चुके अपने समाज की आलोचना हम कब करेंगे? अपने सामाजिक-सांस्‍कृतिक दायित्व का बोध हमारे भीतर कब होगा और हम संविधान में वर्णित अधिकारों को रटने के साथ सामाजिक ‘कर्त्तव्यों’ को भी कब जानेंगे?

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दक्षिणावर्त: भाजपा वो हाथी है जिसे अपनी पूंछ नहीं दिख रही… और मोदी ये बात जानते हैं!

मोदी को अपना रास्ता पता है और समय से वह बखूबी वैसा करेंगे भी, हालांकि हमारे यहां न तो मुफ्त और गजब की सलाह देनेवाले ‘स्वामियों’ की कमी है, न ही ‘कौआ कान ले गया’ सुनकर कौए के पीछे भागनेवाले ‘गुप्ताओं’ की।

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दक्षिणावर्त: कोविडकाल में एक विश्रृंखल डायरी के बेतरतीब पन्ने

वे दरअसल कठोरता की ऐसी कच्ची बर्फ पर खड़े हैं, जिसके नीचे अथाह समंदर है- दुःख और अवसाद का। उस कच्ची बर्फ को तड़कने से बचाने के लिए ही दोनों एक दूसरे के साथ खूब स्वांग करते हैं- वैराग्य और ‘केयर अ डैम’ वाले एटीट्यूड का। एक खेल है दोनों के बीच, जो चल रहा है।

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दक्षिणावर्त: मौत का समाचार, तथ्यों का अंतिम संस्कार और श्मशान में पत्रकार

तकनीक की अबाध और सुगम पहुंच ने घर-घर में इन 24 घंटे चलने वाली ‘थियेट्रिक्स’ की दुकानों को तो पहुंचा दिया, लेकिन पत्रकारिता के सबसे जरूरी आयाम ‘ख़बर’ की ही भ्रूण-हत्या कर दी गयी। अब कहीं भी कुछ भी बचा है, तो वो है प्रोपैगैंडा, फेक न्यूज़ और कम से कम ‘व्यूज़’। समाचार कहीं नहीं हैं, विचार के नाम पर कुछ भी गलीज़ परोसा जा रहा है।

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