देशान्तर: बोलीविया में वामपंथ की वापसी क्या सही मायनों में प्रगतिशील राजनीति की जीत है?

दुनिया के सामाजिक आन्दोलन अपनी ताकत बनाये रखने के लिए वामपंथी दलों के सिर्फ पिछलग्गू बन कर नहीं रह सकते। दक्षिणपंथी ताकतों ने न सिर्फ जनतांत्रिक अधिकारों और संगठनों को कमजोर किया है बल्कि एक जनतांत्रिक राजनीति की ज़मीन को बहुत हद तक सिकोड़ दिया है। वैसे में राजनैतिक विकल्पों के साथ साथ वैकल्पिक राजनीति की संभावनाओं को बचाने और बनाने की लड़ाई जारी रखनी होगी।

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देशान्तर: विश्व सामाजिक मंच की पुनर्कल्पना मुमकिन है, असंभव नहीं!

इस दौर में फोरम के समक्ष कई महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं, जिसके ऊपर इसकी अंतरराष्‍ट्रीय परिषद् में बहसें जारी हैं। इस मुद्दे को लेकर मंच की परिषद् ने गत 6 महीनों में कई छोटी समितियां बनायी हैं और साथ ही दुनिया भर के जन आंदोलनों के साथ जून, सितम्बर और अक्टूबर में गोष्ठियां की हैं।

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देशान्‍तर: थाई छात्रों का तीन उंगली का सलाम और एक सवाल- हमें राजा क्‍यों चाहिए?

आंदोलन पूर्ण तौर पर छात्रों के द्वारा लीड किया जा रहा है, उसमें राजनीति की नयी भाषा है, समझ है और समाज में मौजूदा राजनैतिक और वर्ग के भेदों से आगे बढ़कर वह तीन साफ़ मांगों से प्रेरित है।

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देशान्‍तर: यूरोप के आखिरी तानाशाह को एक शिक्षिका की चुनौती

बेलारूस की जनता डर के साये से निकलकर हज़ारों की संख्या में पहली बार सड़कों पर है। रोजाना हो रहे प्रदर्शनों के कारण हालात तेजी से बदल रहे हैं और पूर्व सोवियत संघ का सबसे मजबूत सोवियत, जहां राष्ट्रपति लुकाशेंको का एकक्षत्र राज पिछले 26 साल से कायम था, ख़त्म होने के कगार पर है।

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देशान्‍तर: बारूद के ढेर पर बैठे लेबनान में उगते इंक़लाब के फूल

इस बात का कोई जवाब नहीं है कि विस्फोट कैसे हुआ, किसने किया, यह बारूद का ढेर क्यों और कैसे इतने समय तक इकट्ठा हुआ और जहाज़ किसका था और वहां क्यों था? मलबे का ढ़ेर अभी पूरी तरह साफ़ भी नहीं हुआ है, लेकिन लेबनान हमेशा की तरह एक अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक अखाड़ा बना हुआ है। इस सप्ताह का देशांतर लेबनान के राजनैतिक हालात और अक्टूबर से चल रहे आंदोलन के ऊपर, जिसे अक्टूबर क्रांति भी कहा जा रहा है।

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देशान्‍तर: जी जिंपिंग का उदय और एक लोकतांत्रिक संवैधानिक सपने का अंत

चीन में मानवाधिकार की बात करना या फिर एकदलीय शासन के अंत और लोकतंत्र की स्थापना की बात करना जुर्म है, राजद्रोह है और इसलिए आज भी हज़ारों बुद्धिजीवी, पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील आदि वहां की जेलों में क़ैद हैं, यातना झेल रहे हैं या फिर अन्य देशों में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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देशान्तर: तानाशाही व्यवस्था में प्रतिरोध का स्वर है चीन की सिविल सोसाइटी

2008 के ओलिंपिक ने चीन को दुनिया के पटल पर आर्थिक और राजनैतिक दोनों क्षेत्रों में न सिर्फ सुपर पावर के तौर पर स्थापित किया बल्कि यह आत्मबल भी दिया किया कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय व्यापारिक और बाज़ारी व्यस्था के आगे मानवाधिकारों के हनन को मुद्दा नहीं बनाने वाला। इसलिए धीरे-धीरे उन्होंने एडवोकेसी संस्थाओं पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया जिसके कारण कुछ ही वर्षों में कई संस्थाएं बंद हो गयीं या फिर देश छोड़ कर चली गयीं।

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देशान्तर: सीरिया में हिंसा और भुखमरी के बीच उम्मीद के बीज बोता फ़िफ़्टीन्थ गार्डेन नेटवर्क

सीरिया अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। गृह युद्ध में अब तक 5 लाख से ज़्यादा मौतें हुई हैं, एक करोड़ से ज़्यादा शरणार्थी और विस्थापित हैं, जिसमें आधे बच्चे हैं। इन सबके बीच सीरिया की जनता अपने आत्मसम्मान और स्वशासन की लड़ाई लड़ने को तत्पर है। इसी से जुड़ी है फ़िफ़्टीन्थ गार्डेन नेटवर्क की कहानी- भूख और हिंसा के बीच आशा, इज्जत और आत्मनिर्भरता के बीज बोने की।

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देशान्तर: हिंसा और खंडित शांति समझौतों के बीच कोलंबिया में बदलाव की लहर

उम्मीद थी कि इस शांति समझौते के बाद इस लम्बे हिंसक संघर्ष का खात्मा होगा जिसमें लगभग 2,60,000 लोगों की जान गयी और क़रीब 7० लाख लोग विस्थापित हुए लेकिन आज भी कोलंबिया शांति से कोसों दूर है। आज यह पर्यावरण और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए सबसे खतरनाक स्थानों में से एक है।

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देशान्तर: क्या कोरोना-काल के बाद वामपंथ और ग्रीन पॉलिटिक्स का उदय तय है? फ्रांस से संकेत…

राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक उथल पुथल होगा यह तो तय था, लेकिन फ़्रान्स के लोकप्रिय राष्ट्रपति इमनुएल मैक्रोन क्या इतनी जल्दी मुश्किलों में पड़ जाएंगे? ताज़ा संपन्न हुए लोकल स्तर के चुनावों के नतीजों में फ़्रांस के हरित, समाजवादी और साम्यवादी दलों की भारी जीत किस नयी राजनीति का आग़ाज़ कर रही है?

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