फ़ैसल खान की गिरफ़्तारी साझा संस्कृति के नये नारे की जरूरत को रेखांकित करती है

भारत के अन्दर तेजी से बदलता यह घटनाक्रम दरअसल सदिच्छा रखने वाले तमाम लोगों- जो तहेदिल से सांप्रदायिक सद्भाव कायम करना चाहते हैं, जहां सभी धर्मों के तथा नास्तिकजन भी मेलजोल के भाव से रह सकें- के विश्वदृष्टिकोण की सीमाओं को भी उजागर करता है।

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बिहार: बनमनखी चीनी मिल के भव्य खंडहरों में छुपी है रोज़गार के चुनावी वादों की कड़वाहट

विडम्‍बना है कि जिस राज्‍य में कुछ दशक पहले तक सिर्फ चीनी से कई लाख लोगों को रोजगार मिलता था, आज वही रोजगार चुनावी वायदों और घोषणाओं में ढूंढा जा रहा है।

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COVID-19 से उपजे आर्थिक दबाव में पांच लाख से ज्यादा लड़कियां बाल विवाह के लिए मजबूर

सिविल सोसाइटी संगठनों की मदद से चलाये जा रहे वैश्विक प्रयासों द्वारा पिछले एक दशक में बाल विवाहों की संख्या में 15% तक की कमी अवश्य आयी है, लेकिन 2030 तक बाल विवाह को समाप्त करने के लक्ष्य को प्राप्त करने लिए एक लंबा रास्ता तय करना अभी बाकी है।

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कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ किसानों के सफल चक्का जाम का व्यापक असर

गुरुवार को 500 से अधिक किसान संगठनों द्वारा “कॉर्पोरेट भगाओ-खेती-किसानी बचाओ-देश बचाओ” के केंद्रीय नारे पर देशव्यापी चक्का जाम का आह्वान किया गया था। माकपा सहित प्रदेश की पांचों वामपंथी पार्टियों के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर उतरे।

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US चुनाव से ठीक पहले किया गया BECA समझौता कहीं हमारी स्वायत्तता से समझौता तो नहीं?

इस समझौते पर हस्ताक्षर तब हुए हैं जब अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में एक हफ्ते से भी कम समय रह गया है। क्या यह अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं होता कि हम इन चुनावों के परिणामों की प्रतीक्षा करते और इसके बाद इन समझौतों के लिए आगे बढ़ते? यह हड़बड़ी क्यों की गई?

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बदलाव के कगार पर बिहार: चुनाव के मुद्दे व संबंधित संदर्भ

आज के चुनावी परिदृश्य में एक तरफ जहां सुशासन बाबू अपने ही बनाये ताने-बाने में उलझे, अटके, फंसे पड़े दिख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एक 31 साल का नौजवान नये जोश और उमंग से लबरेज पूरे वातावरण में ताजगी और बदलाव का समां बांध रहा है। एक से एक चुनावी रणकौशल के उस्ताद से लेकर तथाकथित चुनावी चाणक्य तक इस नौजवान की हुंकार के सामने बौने नज़र आ रहे हैं।

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क्या लालू और उनकी पार्टी का राजनीतिक शुद्धिकरण कर रहे हैं तेजस्वी?

ऐसा पहली बार है जब बिहार के चुनाव में बात नौकरी और रोजी-रोटी की हो रही है और ये सब उस पार्टी से हो रही है जिसके सरकार पर बिहार में जंगलराज लाने का आरोप लगाया जाता रहा है. अचानक से चुनावी पोस्टर-बैनर और पर्चे से लालू का गायब हो जाना क्या सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है या फिर राजद में लालू युग का ‘द एंड’ हो गया है?

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‘जंगल का युवराज’ उर्फ दस साल बाद मुखिया का भोज-भंग प्रतिशोध

प्रधानमंत्री जी आप सचमुच महान हो. नीतीश कुमार की जड़ें इतने तरीके से काट सकोगे, मुझे उम्मीद नहीं थी. आप की होशियारी लाजवाब है.

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एक हम्माम में तब्दील हुई है दुनिया, सब ही नंगे हैं किसे देख के शरमाऊँ मैं!

बड़े नेता दिल्ली स्तर पर पार्टी बदलते हैं, उनसे छोटे नेता राज्य स्तर पर और सबसे निचले स्तर के जिला स्तर पर दल बदल करते हैं. मीडिया का सारा ध्यान केवल राष्ट्रीय स्तर पर रहता है. उधर जमीन पर बदलाव पर ध्यान ही नहीं जाता किसी का.

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दलित राजनीति की त्रासदी को इसका स्वर्णिम युग कहना मसखरापन है!

जिन दलित पार्टियों ने जाति की राजनीति को अपनाया था वे भाजपा के हाथों बुरी तरह से परास्त हो चुकी हैं क्योंकि उनकी जाति की राजनीति ने भाजपा फासीवादी हिन्दुत्व की राजनीति को ही मजबूत करने का काम किया है।

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