‘आपदा में अवसर’ को भांप लेने का तजुर्बा और मेघालय से आती एक आवाज़!

सत्यपाल मलिक अपने विवादास्पद बयानों के कारण चर्चा में आते रहे हैँ! जम्मू कश्मीर का राज्यपाल रहते हुए उन्होंने करगिल में एक सभा में विवादित बयान दे दिया था।

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…हिंदी साहित्य में हिंदू नाजीवाद का स्वीकरण: भाग-2

चित्रा मुद्गल ने अनामिका की खूब और जायज़ तारीफ़ की, लेकिन उन्होंने भी माना कि निशंक की किताब नहीं पढ़ी है. जिस किताब को ज्यूरी के मेंबरान ने भी पढ़ने लायक नहीं समझा, वो किताब हिंदी साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार के लिए चयनित अंतिम 13 किताबों के बीच कैसे पहुंच जाती है? क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं?

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यदि आप भगत सिंह के तीसरे रिश्तेदार हैं, तो उनसे सीखने का यह सही वक्त है!

भगत सिंह का तीसरे रिश्तेदार वो है, जो शोषणविहीन समाज का सपना देखते हैं। जिन्हें अन्याय पल भर के लिए बर्दाश्त नहीं। अपने समय को जीते हुए हम किसी बड़े परिर्वतन की जरूरत शिद्दत से महसूस तो कर रहे हैं, शोर और नारों की क्षणिक उत्तेजना के बीच भगतसिंह तक नहीं पहुंचा जा सकता। अवसरवाद और मतलबपरस्त राजनीति के उलट-फेर में फंसे हम लोगों के लिए भगत सिंह के विचार रोडमैप की तरह है। इंकलाब से परिवर्तन तक पहुंचने के लिए पहले भगत सिंह को समझना होगा, सीखना होगा।

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आज के दौर में भगत सिंह को देखने का संदर्भ और दृष्टि क्या हो?

भगत सिंह का यह आह्वान काफी मूल्यवान है- खासकर ऐसे समय में, जब आज भी क्रान्तिकारी ताकतें दलितों पर होने वाले जातीय व व्यवस्था जनित उत्पीड़न के खिलाफ कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हैं।

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स्थायी समिति की संस्तुति की रोशनी में ‘भाजपा हराओ’ का नारा कहीं गलत तो नहीं साबित हो गया?

किसान आंदोलन को अब यह भी महसूस करना होगा कि सरकार के अड़ियल रवैये के पीछे उसके सामने मौजूद यह तथ्य भी रहे होंगे कि कम या अधिक पूंजीपतियों की झूठन से अन्य राजनीतिक दलों के हाथ भी गंदे हैं।

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बढ़ता हुआ एकाधिकार लोकतांत्रिक सुधार नहीं, सत्ता के वर्चस्व को स्थायी बनाने का नुस्खा है!

वी डेम की रिपोर्ट में भारत पिछले वर्ष की तुलना में सात स्थानों की गिरावट के साथ कुल 180 देशों में 97वें स्थान पर है। ‘’ऑटोक्रेटाइजेशन टर्न्स वायरल’’ शीर्षक रिपोर्ट में यह संस्थान भारत को थर्ड वेव ऑफ ऑटोक्रेटाइजेशन के अंतर्गत आने वाले देशों में शामिल करता है।

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तस्करी के जाल से निकल के घर लौटी मुड़की को गरीबी के जंजाल से मुक्ति कौन दिलाएगा?

मैं मुड़की से दोबारा बात करने का प्रयास करने लगा। उससे एक अदभुत बात पता चली कि उसे गांव पसंद नहीं आ रहा है। उसे घर में रहना भी पसंद नहीं है। मुड़की बताती है कि दिल्ली में उसका जीवन बेहतर था, वहां उसे बेहतर खाना मिलता था और रहने के लिए भी अच्छी जगह थी।

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19 मार्च का मुजारा लहर संघर्ष: किसान आंदोलन के इतिहास में एक सुनहरा पन्ना

स्वतंत्रता के बाद भी जमींदारों ने सशस्त्र गिरोहों को रोजगार देना शुरू किया ताकि वे बटाईदारों को नियंत्रित कर सकें। इस अवधि के दौरान रेड पार्टी के नेतृत्व में संघर्षरत किसानों को संगठित किया गया और गाँव किशनगढ़ संघर्ष का मुख्य केंद्र बन गया।

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किसान आंदोलन: सिंघू बॉर्डर पर बनेगा शहीदों का स्मारक, कर्नाटक से आ रही है मिट्टी

संयुक्त किसान मोर्चा ने संज्ञान में लिया कि धरनास्थलों के आसपास अधिक बैरिकेडिंग की जा रही है। हम दिल्ली पुलिस के इस गैरकानूनी और तर्कहीन कार्य की निंदा करते है। एसकेएम मांग करता है कि पुलिस आंतरिक सड़कों सहित ऐसे बैरिकेडिंग को हटाए ताकि स्थानीय लोगों के जीवन को आसान रखा जा सके और उनकी आजीविका की रक्षा की जा सके।

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क्या मोदी के खिलाफ अंग्रेजी में लिखने के चलते मेहता को धोना पड़ा नौकरी से हाथ?

नरेन्द्र मोदी को लेकर थोड़ा बहुत शक तब भी देश के लिबरल लोगों में था। इस शुबहे को रामचंद्र गुहा, प्रताप भानु मेहता और आशुतोष वार्ष्णेय जैसे लोगों ने फासिस्ट न होने का सर्टिफिकेट देकर खारिज कर दिया। परिणामस्वरूप जिस नरेन्द्र मोदी की स्वीकृति पढ़े-लिखे जेनुइन लिबरल लोगों के घरों में नहीं थी, वहां भी हो गई।

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