विश्व-गुरु बनने के दावों के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों का सैन्यकरण
राजनीतिक संस्थाओं ने संसद में मूल्यों के क्षरण पर तो कोई नियम या कानून नहीं बनाया, लेकिन उसने मान लिया कि शिक्षण संस्थानों में ही मूल्यों और संस्कारों की कमी हो गयी है।
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राजनीतिक संस्थाओं ने संसद में मूल्यों के क्षरण पर तो कोई नियम या कानून नहीं बनाया, लेकिन उसने मान लिया कि शिक्षण संस्थानों में ही मूल्यों और संस्कारों की कमी हो गयी है।
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कश्मीर में भारत विरोधी नारे लग रहे हैं और भारत में कश्मीर के खिलाफ नारेबाजी हो रही है। देश में कश्मीरियों को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, इधर कश्मीरी अपने हमवतन लोगों की नीयत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
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जिस प्रदेश में आज तक कमोबेश श्मशान-कब्रिस्तान, धर्म और जाति जैसे जहरीले मुद्दों पर चुनाव लड़ा गया वहां इस तरह की क़वायद एक बड़ी उम्मीद लेकर आती दिख रही है। ऐसा नहीं है कि इस फैसले से सब अच्छा हो गया है, लेकिन यह फैसला एक बुनियादी गैर-बराबरी को पाटने की तरफ बढ़ाया गया उम्मीद भरा कदम है जिसका चतुर्दिक स्वागत होना चाहिए।
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जब ऐतिहासिक तथ्यों का अध्ययन किया जाता है तब हमें यह ज्ञात होता है कि श्री सावरकर किसी विचारधारा विशेष के जनक अवश्य हो सकते हैं किंतु भारतीय स्वाधीनता संग्राम के किसी उज्ज्वल एवं निर्विवाद सितारे के रूप में उन्हें प्रस्तुत करने के लिए कल्पना, अर्धसत्यों तथा असत्यों का कोई ऐसा कॉकटेल ही बनाया जा सकता है जो नशीला भी होगा और नुकसानदेह भी।
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भारत के कोयला संकट को गहराने में जहां अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की भूमिका रही वहीं देश के भीतर मौजूद कारण भी इसकी वजह रहे जिसने खदानों से लेकर बिजली संयंत्रों तक सप्लाई की लय को गड़बड़ा दिया। कई राज्यों में कोयले की उपलब्धता में कमी आयी है।
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कोविड-19 में पुलिस व्यवस्था पर कॉमन कॉज नामक स्वयंसेवी संस्था द्वारा किये गए एक अध्ययन में सामने आया है कि हर तीन पुलिसकर्मियों में से केवल एक ने लॉकडाउन के दौरान कानून और व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों की जांच करते हुए कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन किया।
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टिकैत का उद्देश्य बीजेपी के खिलाफ चौतरफा युद्ध छेड़ने के बजाय कृषि कानूनों पर ध्यान केंद्रित रखना है, हालांकि इस बीच वह बीजेपी की क्षमता को कम करके आंकने की गलती कर सकते हैं तो दूसरी ओर वह लखीमपुर खीरी में हुई मौतों पर सिख किसानों के दुख को भी कम आंक सकते हैं।
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खुद प्रदेश सरकार अपने संसाधनों से इतना भी हासिल नहीं कर पाती कि वह अपने कर्माचारियों का वेतन दे सके। यहां तक कि आदिवासी व अनुसूचित जाति सब-प्लान, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मदों से भी बजट का पैसा बचाया जा रहा है। विकास कार्यों पर जितना पैसा खर्च किया जाता है लगभग उतना ही पैसा सरकार का ब्याज चुकाने में चला जाता है।
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आने वाला समय किसान आंदोलन के नेतृत्व के लिए कठिन परीक्षा का है। उकसाने वाली हर कार्रवाई के बाद भी उसे आंदोलन को अहिंसक बनाए रखना होगा। किसान नेताओं को जनता को यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि वे हर प्रकार की हिंसा के विरुद्ध हैं।
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वर्ष 1993 में वोहरा समिति की रिपोर्ट और वर्ष 2002 में संविधान के कामकाज की समीक्षा करने के लिये राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) की रिपोर्ट ने पुष्टि की है कि भारतीय राजनीति में गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है।
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