कौन कर रहा है कोयले की दलाली में हाथ काले?


देश में इन दिनों कोयला संकट पर भारी कोहराम मचा है। ऐसा माना जा रहा है कि इसकी मुख्य वजह देश के ऊर्जा संयंत्रों के पास कम स्टॉक का होना है। कोयले की कमी से देश में बड़े बिजली संकट की बात भी कही जा रही है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार जून में पावर प्लांट्स में 17 दिनों का कोयले का स्टॉक मौजूद था जबकि अक्टूबर में कोयले से चलने वाले पावर प्लांट्स के पास सिर्फ 4 दिन का कोयले का स्टॉक है, लेकिन केंद्र सरकार कह रही है कि कोयले का कोई संकट नहीं है, देश में बिजली की कोई किल्लत नहीं आने वाली है।

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ने कहा है कि न तो देश में कोयले की कमी है और न ही बिजली संकट आने वाला है। ऊर्जा मंत्री ने 11 तारीख को बताया था कि 4 दिन से ज़्यादा का स्टॉक है, ”एक दिन पहले 1.8 मिलि‍यन टन की ज़रूरत थी उससे ज़्यादा का स्टॉक मिला, अभी 4 दिनों का स्टॉक है और धीरे-धीरे बढ़ रहा है। 4 दिन का मतलब नहीं है कि 4 दिन बाद खत्म हो जाएगा। 4 दिन में और स्टॉक आएगा और ये बढ़ जाएगा।” केंद्रीय ऊर्जा मंत्री के मुताबिक कुछ महीनों पहले तक स्टॉक 17 दिनों का था लेकिन मॉनसून के मौसम की वजह से कोयला खदानों में पानी भर गया और ट्रेनों की आवाजाही में दिक्कत हुई जिसकी वजह से स्टॉक में कमी आयी पर अब हालात सामान्य हो रहे हैं और जल्द ही स्थिति पहले जैसी होगी।

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर के सिंह भले ही दावा कर रहे हों कि न तो कोयले का संकट है न ही बिजली की दिक्कत होने वाली है, लेकिन कई राज्यों ने केंद्र सरकार से कोयले की कमी की अपनी चिंता जाहिर कर दी है। खासकर दिल्ली की तरफ से मुखरता से आवाज उठायी गयी है पर केंद्रीय उर्जा मंत्री के मुताबिक दिल्ली में बिजली की कोई किल्लत नहीं है। मंत्री ने कहा, ”दिल्ली को जितनी ज़रूरत है उतनी बिजली मिल रही है और आगे भी मिलती रहेगी, टाटा पावर ने मैसेज भेज कर पैनिक किया लिहाज़ा उनको चेतावनी दी गयी। अगर इस तरह से होगा तो उन पर कार्रवाई होगी। ये ग़ैर ज़िम्मेदाराना है।”

उर्जा मंत्री के इस बयान पर दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए यहां तक कह दिया कि संकट पर केंद्र आंख बंद कर लेती है। सिसोदिया ने कहा, ”ये कोल संकट सिर्फ कोल संकट नहीं है, ये पॉवर क्राइसिस है। कई मुख्यमंत्रियों ने चिट्ठी लिखी। दिल्ली, पंजाब, आंध्र प्रदेश, पंजाब इन सरकारों ने कहा कि कोल संकट है, लेकिन ये मानने को तैयार नही है, अगर कोल संकट है तो कम से कम स्वीकार तो कीजिए।”

ध्यातव्य है कि देश में पैदा होने वाली 70 फीसदी बिजली थर्मल पावर प्लांट से आती है, 135 पावर प्लांट कोयले से चलते हैं। ऊर्जा मंत्री की बातों को सही साबित करने के लिए उनके समर्थन में केंद्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी भी सामने आए। जोशी ने ट्वीट करके कोयला उत्पादन का हिसाब बताया। प्रह्लाद जोशी ने अपने ट्वीट में लिखा, ”कोल इंडिया ने अब तक सबसे अधिक कोयला उत्पादन एवं आपूर्ति की है, इस वर्ष 263 एमटी कोयला उत्पादन के साथ CIL ने पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 6.3% की वृद्धि दर्ज की है, साथ ही, 323 एमटी के साथ गत वर्ष से 9% अधिक कोल ऑफ-टेक किया है।” प्रश्न यह है कि अगर खनन और उत्पादन बढ़ा है तो कमी का संकट कैसे उत्पन्न हो गया? जो कारण बताये जा रहे हैं वे तुरंत प्रभाव डालने वाले नहीं है। हो सकता है भविष्य के लिए वे चिंता पैदा करने वाले हों। भारत की ऊर्जा प्लानिंग और नीतियां क्या इतनी लचर है कि कोयला उत्पादन अधिक हो रहा है पर आपूर्ति नहीं हो पा रही है? तो फिर दोषी कौन है? बीच में कोयला कहां गायब हो रहा है? कोयले की दलाली में हाथ कौन काले कर रहा है? कमर्शियल माइनिंग, अवैध बिक्री, निजी कंपनियों को कोयला भंडारण और बिक्री के मनचाही छूट या फिर नये कोल ब्लॉकों के आवंटन से पहले निजी कंपनियों का अतिरक्त छूट और लाभ का दबाव? भूमि अधिग्रहण में नरमी, पर्यावरण नियमों को कमजोर करना और घरेलू बिक्री के दामों और निर्यात पर ढील आदि? कोल इंडिया की अधिकार सीमा में कटौती और उसका विनिवेश आदि? कुल मिलाकर सरकारी नियंत्रण से मुक्ति!

सरकार की तरफ से बतायी गयी वजहें भी ध्यान देने योग्य हैं और मौजूदा बिजली संकट का एक बड़ा कारण हैं, हालांकि इनमें विरोधाभास भी है। कहा जा रहा है कि जहां घरेलू कोयला उत्पादन में गिरावट आयी है, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले के दामों में तेजी भी आयी है। ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक कोयले के दाम बीते 6 महीनों के दौरान ही 60 से 160 डॉलर प्रति टन तक पहुंच चुके हैं। अब इतने महंगे कोयले का आयात तो संभव है नहीं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले के दामों में आये उछाल के लिए चीन की कारस्तानी भी है। चीन ने मई में 21 मिलियन टन और जून में 28 मिलियन टन कोयले का आयात किया। भारत के कोयला संकट के पीछे अंतरराष्ट्रीय समीकरण भी जिम्मेदार हैं। बिजली संकट की वजह से पहले चीन में हालात खराब हुए। लेबनान की राजधानी बेरूत में पूरी रात लोगों को अंधेरे में बितानी पड़ी। अब भारत के करोड़ों लोगों पर भी अंधेरे में रहने का संकट मंडरा रहा है। इंडोनेशिया का अधिकतर स्टॉक भी चीन ने ही खरीद लिया।

इतना ही नहीं, ऑस्ट्रेलिया के कोयले से लदे जहाजों को चीन ने अपने बंदरगाहों के करीब महीनों रोके रखा। माना जा रहा है कि चीन अपने फैक्ट्री उत्पादन और आर्थिक इंजन की रफ्तार बढ़ा रहा है। कोरोना संकट के दौरान दुनिया भर से चीनी फैक्ट्रियों में जरूरी सामानों के ऑर्डर की डिमांड आ रही है। चीन के बाद भारत कोयले की खपत वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। लिहाजा भारत की चुनौती बड़ी है। वैसे भारत के कोयला संकट को गहराने में जहां अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की भूमिका रही वहीं देश के भीतर मौजूद कारण भी इसकी वजह रहे जिसने खदानों से लेकर बिजली संयंत्रों तक सप्लाई की लय को गड़बड़ा दिया। कई राज्यों में कोयले की उपलब्धता में कमी आयी है। महाराष्ट्र में बिजली उत्पादन में हुई कमी की वजह से दूसरी ग्रिड से महंगी बिजली खरीदनी पड़ रही है। एक जानकारी के मुताबिक महाराष्ट्र पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ग्राहकों को 7 रुपया प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली बेच रही है लेकिन पैदा हुए संकट ने दूसरी ग्रिड से सरकार को 20 रुपया प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली खरीदने पर मजबूर कर दिया है। ये संकट इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि महाराष्ट्र में बिजली पैदा करने के लिए जितने कोयले की जरूरत है, उसका सिर्फ आधा कोयला ही मिल पा रहा है।

महाराष्ट्र में रोजाना 1.5 लाख मीट्रिक टन कोयले की जरूरत है। अभी सिर्फ 75 हजार मीट्रिक टन कोयला मिल रहा है, तीन पावर प्लांट की 14 यूनिट्स बंद हो चुकी हैं। बिहार में गया में पिछले एक हफ्ते से बिजली ज्यादा कट रही है, आम लोगों के साथ-साथ घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे छात्र भी परेशान हैं। बिहार के बेगूसराय का हाल भी देश से अलग नहीं है। बरौनी थर्मल पावर भी कोयले की किल्लत झेल रहा है। कुछ दिन पहले बेगूसराय में 22 घंटे बिजली रहती थी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से बड़ी मुश्किल से 12 से 14 घंटे ही बिजली मिल रही है और ये कटौती सिर्फ बिहार में ही नहीं हो रही है, बल्कि देश के कई राज्यों में इस वक्त बिजली काटी जा रही है। पंजाब में बिजली आपूर्ति की स्थिति गंभीर बनी हुई है और राज्य के स्वामित्व वाली पीएसपीसीएल ने रविवार को कहा कि राज्य में 13 अक्टूबर तक रोजाना तीन घंटे तक बिजली कटौती की जाएगी। पंजाब के कई इलाकों में 4-4 घंटे की कटौती हो रही है।

देश के विभिन्न राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी बिजली उत्पादन के लिए कोयले का संकट गहराता जा रहा है। राज्य सरकार के एक प्रवक्ता ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राज्य में कोयले की आपूर्ति सामान्य कराने और प्रदेश को अतिरिक्त बिजली उपलब्ध कराने का आग्रह किया है। एमपी के कई इलाकों में 4-5 घंटे की कटौती हो रही है। वहीं राजस्थान में राजधानी जयपुर सहित कई इलाकों में 4 घंटे की कटौती हो रही है। जाहिर है इससे जनता की परेशानी बढ़ेगी। बिजली कंपनियां भी दाम बढ़ाने के लिए मजबूर होंगी और मनमाने दाम बढ़ाने की कोशिश करेंगी।



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